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हमें कैसा हीरो चाहिए?

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कुछ लोग संदीप रेड्डी वांगा के सिनेमा को समस्याजनक कह रहे हैं। ज़हरीली मर्दानगी का प्रचार बता रहे हैं। मगर वे सब ‘एनीमल’ के बंपर हिट होने से हतप्रभ हैं। गीतकार-अभिनेता स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि ‘औरत’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘अनुपमा’, ‘अंकुर’, ‘भूमिका’, ‘मिर्च मसाला’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’, ‘क्वीन’ आदि फ़िल्मों ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना सिखाया था। लेकिन ‘एनीमल’ देख कर मुझे आज की महिलाओं पर दया आई। …. किरकिरे मानते हैं कि ‘एनीमल’ हमारे सिनेमा का भविष्य नए सिरे से तय करेगी।

परदे से उलझती ज़िंदगी

मनोज बाजपेयी के अभिनय की एक और मिसाल ‘जोरम’ के रूप में सामने आई है। देवाशीष मखीजा की इस फ़िल्म में वे पर्यावरण को बिगाड़ रहे विकास की राजनीति में पिसते एक आदिवासी बने हैं, जिसके एक तरफ़ माओवादी हैं और दूसरी तरफ़ अपना सिस्टम। जान बचाने के लिए वह मुंबई भाग जाता है, मगर वहां भी पहचान लिया जाता है और उसे अपनी बच्ची जोरम के साथ फिर भागना पड़ता है। नेटफ़्लिक्स पर ज़ोया अख़्तर की ‘द आर्चीज़’ भी आ चुकी है जो कि आर्ची कॉमिक्स पर आधारित है और जिसका अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा, शाहरुख की बेटी सुहाना खान और बोनी कपूर की बेटी खुशी कपूर की लॉन्चिंग की वजह से इंतज़ार किया जा रहा था। ये तीनों ही आपको चकित करते हैं। इनके अलावा चार और नए कलाकार वेदांग रैना, मिहिर आहूजा, अदिति डॉट सहगल और युवराज मेंडा भी इसमें लॉन्च हुए हैं। रीमा कागती और ज़ोया की सात नए कलाकारों को लेकर बनाई गई इस फ़िल्म में ऐंग्लो-इंडियन लोगों की एक काल्पनिक बस्ती है, पैसे वालों की मनमानी है, बस्ती को उस मनमानी से बचाने की लड़ाई है, दशकों पुराना फ़ैशन है और उस समय़ के मूल्य भी हैं। पंकज त्रिपाठी की थ्रिलर ‘कड़क सिंह’ और जैकी श्रॉफ़ व नीना गुप्ता की एकाकी बुज़ुर्गों के जीवन पर बनी ‘मस्त में रहने का’ भी ओटीटी पर रिलीज़ हो चुकी हैं जबकि मेघना गुलज़ार के निर्देशन और विकी कौशल के चुस्त अभिनय वाली देश के पहले फ़ील्ड मार्शल सैम मानेक्शॉ की बायोपिक ‘सैम बहादुर’ अभी भी तारीफ़ें बटोर रही है।

एक साथ कई स्तरीय और विविध फ़िल्मों के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चा ‘एनीमल’ का है। चर्चा की बजाय इसे विवाद कहना चाहिए जो कि संसद तक जा पहुंचा। राज्यसभा में कांग्रेस की रंजीत रंजन ने कहा कि इस फ़िल्म में महिलाओं का अपमान दिखाया गया है और फिर उसे जस्टीफ़ाई भी किया गया है। सांसद ने इसकी हिंसा की भी शिकायत की। उनका कहना था कि मेरी बेटी अपनी सहेलियों के साथ यह फ़िल्म देखने गई, लेकिन इसमें इतनी ज़्यादा हिंसा है कि वह रोने लगी और फ़िल्म को बीच में ही छोड़ कर चली आई। उन्होंने पूछा कि सेंसर बोर्ड इस तरह की फ़िल्मों को पास कैसे करता है?

मगर वास्तविकता यह है कि दर्शक इस फ़िल्म पर टूटे पड़ रहे हैं और बॉक्स ऑफ़िस के बहुत से रिकॉर्ड ख़तरे में हैं। जहां तक सेंसर बोर्ड की बात है तो उसकी तो बहुत सी जिम्मेदारियां हैं। अगर उन्हें गिनाया जाए तो बात बहुत दूर तलक चली जाएगी। वह अत्यधिक हिंसा वाले कुछ दृश्य घटाने या हटाने को कह सकता है, लेकिन किसी काल्पनिक कहानी में वह यह नहीं कह सकता कि अमुक पात्र का अपमान मत करो। और अभी तक कहीं से ऐसी कोई खबर नहीं आई है कि दर्शक इस फ़िल्म से बीच में ही उठ कर जाने लगे।

इस फ़िल्म का हीरो और विलेन इस हद तक जानवर हैं कि दर्शक विचलित हो उठें। संदीप रेड्डी वांगा यही चाहते थे। यही उनका यूनीवर्स है, जो छह साल पहले तेलुगु की ‘अर्जुन रेड्डी’ से शुरू हुआ। तीन करोड़ की उस फ़िल्म ने पचास करोड़ कमाई की। फिर 2019 में इसी की हिंदी रीमेक ‘कबीर सिंह’ आई। उससे हिंदी वालों को पता लगा कि वांगा कर क्या रहे हैं। इसमें शाहिद कपूर ने मुख्य पात्र निभाया था जो कि अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता। वह अपनी प्रेमिका को थप्पड़ मारता है और इसे भी अपने प्रेम का हिस्सा मानता है। रणवीर सिंह ने ज़्यादा डार्क बताते हुए यह रोल करने से मना कर दिया था, तब वांगा ने शाहिद कपूर से संपर्क किया था। हैरानी की बात यह कि 36 करोड़ में बनी ‘कबीर सिंह’ ने साढ़े तीन सौ करोड़ से ऊपर कमाए। इसकी रिलीज़ के समय हिंसा को लेकर पूछे गए एक सवाल पर वांगा ने कहा था कि असली हिंसा तो मैं अगली फिल्म में दिखाउंगा। वह अगली फ़िल्म ‘एनिमल’ है।

बिजनेस में बिज़ी पिता ने बचपन में बेटे को समय नहीं दिया। इस टीस के साथ बड़े हुए बेटे का पिता से लगाव भी है और वह उसे अपमानित भी करता है। वह अपनी पत्नी और बहन, सभी का अपमान करता है और इसे अपना अधिकार मानता है। फ़िल्म में डराने वाली हिंसा है तो विचलित करने वाला अपमान भी है। और लोग इस पसंद कर रहे हैं। इस हद तक कि रणबीर कपूर की स्टार वैल्यू कई गुना बढ़ गई है। इस हिंसक, क्रूर और खूंखार भूमिका ने उनकी सामान्य रोमांटिक हीरो की पूरी छवि ही उलट दी है। इस फ़िल्म का लाभ अनिल कपूर, रश्मिका मंदाना और तृप्ति डिमरी को भी मिलना है, लेकिन सबसे ज़्यादा फ़ायदा बॉबी देओल को हुआ है। फ़िल्म में वे कुछ बोलते नहीं, मगर उनकी उपस्थिति पूरा माहौल बदल डालती है। इसके एक शो के बीच वे मुंबई के एक थिएटर में पहुंचे तो जिस तरह दर्शकों ने उनका स्वागत किया उससे उनकी आँखें भर आईं। इतनी लोकप्रियता उन्हें हीरो बन कर नहीं मिली थी जो विलेन के रूप में मिली है। हालांकि बॉबी देओल खुद बताते हैं कि उनकी मां प्रकाश कौर जिस तरह ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में धर्मेंद्र के मरने का सीन नहीं देख सकी थीं उसी तरह ‘एनीमल’ में बेटे का हिंसक रूप भी नहीं झेल पाईं। उन्होंने बॉबी से कहा, ‘ऐसी फ़िल्में मत किया कर तू, मुझसे देखा नहीं जाता।‘ मगर आजकल मां का कहा कौन मानता है। बॉबी भी नहीं मान पाएंगे। बरसों लंबे इंतज़ार के बाद तो उनके काम को लोगों ने इतना पसंद किया है। वे कैसे कहें कि अब ऐसी भूमिकाएं नहीं करूंगा। ‘एनीमल’ के कारण उन्हें ऐसी और फ़िल्में मिलना तय हैं क्योंकि हमारे ज़्यादातर फ़िल्मकार और कलाकार इसकी तारीफ़ कर रहे हैं।

कई बार आपने देखा होगा कि किसी फ़िल्म या किसी कलाकार के नाम की स्पेलिंग अजीब सी है। ज्योतिषियों और खास कर अंक ज्योतिष वालों की सलाह पर ऐसा किया जाता है। एक कलाकार हैं नकुल मेहता। उनके नाम में डबल यू हैं, यानी दो यू। अब आप दिमाग़ खपाते रहिये कि डबल यू होने पर नकुल को कैसे उच्चारित किया जाएगा। ये नकुल मेहता फ़िल्मों मे कम और टीवी सीरियलों में ज़्यादा दिखते हैं। मगर पिछले दिनों उन्होंने एक बड़ी पते की बात कही। एक इंटरव्यू में नकुल ने कहा कि हमारी फ़िल्मों ने दर्शकों के मन में पुरुषत्व की गलत परिभाषा गढ़ दी है, जिसकी शुरूआत सलीम-जावेद के एंग्री यंग मैन से हुई। नकुल का कहना था कि ‘दीवार’ में शशि कपूर वाले पात्र में जो गरिमा, सच्चाई औऱ ईमानदारी थी, उसके विपरीत अमिताभ बच्चन वाली भूमिका को प्रमुखता दी गई। पुरुषत्व या पौरुष या मर्दानगी या बहादुरी, उसे जो कहिए, वह तो शशि कपूर दिखा रहे थे। लेकिन दर्शकों के मन में अमिताभ वाला पात्र पुरुषत्व का ध्वजवाहक बना, जबकि वह गलत रास्ते पर जा रहा था।

यानी यह गड़बड़ी तो बहुत पहले से चली आ रही है। आज जावेद अख्तर कहते हैं कि हम तो केवल यह सोच कर कहानियां और डायलॉग लिख रहे थे कि यह लोगों को अच्छा लगेगा। हमें नहीं पता था कि इससे इतनी बड़ी बात होने वाली है या कोई नया ट्रेंड सेट होने वाला है। शायद जावेद यह भूल जाते हैं कि जब कोई लेखक कुछ लिखता है तो वह अपने समय की देश और सामाज की परिस्थितियों से और उस लहर से बचा नहीं रह सकता जो उस दौर के लोगों के मन में चल रही होती है। एंग्री यंग मैन के पैदा होने के कुछ ही साल बाद, समाजशास्त्री सुधीर कक्कड़ ने कहा था कि हमारे शहरों के स्लमों में रहने वाले नौजवानों में जो गुस्सा भरा हुआ था उसे सबसे पहले सलीम-जावेद ने पकड़ा।

यह पिछली सदी का आठवां दशक था, जब इस गुस्से की झलक समानांतर सिनेमा में गोविंद निहलानी और श्याम बेनेगल जैसे फ़िल्मकारों की फ़िल्मों में भी दिखी। मुख्यधारा के तमाम फिल्मकार गुस्से से भरा और बदला लेने वाला हीरो दिखाने लगे। यानी मारधाड़ करने वाला हीरो स्थापित हो गया। तब से अब तक इस हीरो में कई बदलाव आए हैं। जैसे उसने वह धूर्तता और चालबाज़ी अपना ली जो कभी विलेन में ही संभव थी। गैंग वॉर का भी दौर आया। फिर हीरो के बदला लेने का आधार बड़ा होने लगा। जैसे वह आतंकवादियों से लड़ने लगा या ऐसे लोगों का नाश करने लगा जिन्होंने पूरे शहर या क़स्बे को परेशान कर रखा था। और अब हमारे हीरो देश के अपराधियों को विदेश में जाकर भी मारने लगे हैं। एक्शन के नाम पर हिंसा को नए आयाम मिले हैं जिसे तकनीक ने और वीभत्स बना दिया है। हीरो के इसी विकास-क्रम का नवीनतम रूप ‘एनीमल’ है। ऐसा हीरो जो महिलाओं के प्रति द्वेष-भाव रखता है। उन्हें अपमानित कर सकता है, अपने पिता को भी दुत्कार सकता है। वह जानवर हो गया है, और उसे इसका कोई पछतावा भी नहीं है। और यह यहीं नहीं रुकेगा। खुद ‘एनीमल’ के अंत में इसके सीक्वल ‘एनीमल पार्क’ का संकेत दिया गया है जिसमें रणबीर कपूर दोहरी भूमिका में होंगे। और दोनों ‘एनीमल’ होंगे।

कुछ लोग संदीप रेड्डी वांगा के सिनेमा को समस्याजनक कह रहे हैं। ज़हरीली मर्दानगी का प्रचार बता रहे हैं। मगर वे सब ‘एनीमल’ के बंपर हिट होने से हतप्रभ हैं। गीतकार-अभिनेता स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि ‘औरत’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘अनुपमा’, ‘अंकुर’, ‘भूमिका’, ‘मिर्च मसाला’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’, ‘क्वीन’ आदि फ़िल्मों ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना सिखाया था। लेकिन ‘एनीमल’ देख कर मुझे आज की महिलाओं पर दया आई। अब एक नया पुरुष तैयार हो गया है, जो डरावना है, जो महिलाओं की इज्ज़त नहीं करता और जो उन पर नियंत्रण चाहता है। किरकिरे मानते हैं कि ‘एनीमल’ हमारे सिनेमा का भविष्य नए सिरे से तय करेगी।

मगर कवि-हृदय किरकिरे साहब को समझना चाहिए कि दर्शकों के संस्कारों का बिगाड़ तो हमने दशकों पहले शुरू कर दिया था। अब जो हम देख रहे हैं वह उसी का नया संस्करण है। और भविष्य के ऐसे संस्करणों को रोक पाने का कोई तरीका भी हमारे पास नहीं है। उसकी तो हमने कभी कोई तैयारी ही नहीं की।

 

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By सुशील कुमार सिंह

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता, हिंदी इंडिया टूडे आदि के लंबे पत्रकारिता अनुभव के बाद फिलहाल एक साप्ताहित पत्रिका का संपादन और लेखन।

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