वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता, हिंदी इंडिया टूडे आदि के लंबे पत्रकारिता अनुभव के बाद फिलहाल एक साप्ताहित पत्रिका का संपादन और लेखन।
  • अटल को भी पूरा नहीं दिखाती ‘मैं अटल हूं’

    पंकज त्रिपाठी ने अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका की है। बोलते हुए कहां कितना पॉज़ देना है, कहां सिर झटकना है, क्या पोस्चर रखना है और बोलने का लहजा, यह सब पंकज ने पकड़ा है। लेकिन वे आवाज़ का क्या करते? आवाज बता देती है कि ये तो पंकज त्रिपाठी बोल रहे हैं। फ़िल्म काफ़ी कुछ संवादों पर निर्भर है, मगर कई मौकों पर वे उपदेश जैसे लगते हैं। ...वास्तव में, इस फ़िल्म में कहानी कहने की कला ही गायब है। यह तो बस घटनाओं का एक सिलसिला भर है।   परदे से उलझती ज़िंदगी वरिष्ठ पत्रकार टीआर रामचंद्रन ने एक...

  • फ़िल्मी विमर्श में पिछले साल की छाया

    श्रीराम राघवन का कमाल देखिए कि कटरीना कैफ़ जो अब तक केवल हीरोइन हुआ करती थीं, पहली बार एक अच्छी अभिनेत्री लगी हैं। ध्यान रहे, छह साल पहले ‘अंधाधुन’ ने बॉक्स ऑफ़िस पर साढ़े चार सौ करोड़ की कमाई की थी और लगभग सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में उसके रीमेक बने थे। फ्रेंच लेखक फ़्रेडरिक दा के उपन्यास ‘ला मोंटे चार्ज’ पर बनी ‘मैरी क्रिसमस’ उतनी चले या नहीं, लेकिन श्रीराम राघवन इससे अपनी निर्देशकीय यात्रा में एक कदम आगे बढ़ने वाले हैं। परदे से उलझती ज़िंदगी बेहतर होता कि ‘मैरी क्रिसमस’ 25 दिसंबर के आसपास रिलीज़ की जाती। वैसे...

  • ज़रूरत ‘कस्तूरी’ को पहचानने की

    रिलीज़ के पहले हफ्ते में, यानी पूरे सात दिन में, ‘कस्तूरी’ केवल सत्रह लाख रुपए कमा सकी है। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह कितने थिएटरों में लगी होगी। और वह भी इतनी मशक्कत के बाद। हमारे सिनेमा की जो व्यवस्था है या उसका जो इन्फ़्रास्ट्रक्चर है, उसके रवैये अथवा मनमानी के सामने छोटी फिल्मों को हमेशा इसी दुर्गति का सामना करना पड़ता है। क्या यह स्थिति किसी दुर्गन्ध से कम है? कितने लोगों को इसकी चिंता है? इसके लिए कस्तूरी कौन लाएगा?   इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि फ़िल्म का प्रकार क्या है। वह कॉमेडी है, सस्पेंस है,...

  • हमें कैसा हीरो चाहिए?

    कुछ लोग संदीप रेड्डी वांगा के सिनेमा को समस्याजनक कह रहे हैं। ज़हरीली मर्दानगी का प्रचार बता रहे हैं। मगर वे सब ‘एनीमल’ के बंपर हिट होने से हतप्रभ हैं। गीतकार-अभिनेता स्वानंद किरकिरे कहते हैं कि 'औरत’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘अनुपमा’, ‘अंकुर’, ‘भूमिका’, ‘मिर्च मसाला’, ‘इंग्लिश विंग्लिश’, ‘क्वीन’ आदि फ़िल्मों ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना सिखाया था। लेकिन ‘एनीमल’ देख कर मुझे आज की महिलाओं पर दया आई। …. किरकिरे मानते हैं कि ‘एनीमल’ हमारे सिनेमा का भविष्य नए सिरे से तय करेगी। परदे से उलझती ज़िंदगी मनोज बाजपेयी के अभिनय की एक और...

  • रेलवे के वे लोग

    नेटफ़्लिक्स पर यशराज फ़िल्म्स की मिनी सीरीज़ ‘द रेलवे मेन’ में स्टेशन मास्टर का नाम इफ्तिख़ार सिद्दीकी बताया गया है, लेकिन वास्तव में वह डिप्टी स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर थे। उन्होंने ही ट्रेनों का भोपाल आना रुकवाया था, स्टेशन पर जुटे लोगों के लिए मेडिकल सहायता मंगवाई थी और बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस को आते ही रवाना कर दिया था। दस्तगीर साहब की अपनी हालत खराब हो रही थी, फिर भी वे लगातार भाग-दौड़ करते रहे। उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी बचाव अभियान में लगे रहे। उस रात भोपाल जंक्शन पर रेलवे के तेईस कर्मचारियों की जान गई।.... चार एपीसोड की यह...

  • बाहरी और भीतरी का द्वंद्व

    कृति सेनन कहती हैं कि अगर कोई फ़िल्मकार इंडस्ट्री से जुड़े किसी व्यक्ति (यानी अपने बेटे-बेटी या किन्हीं रिश्तेदारों या दोस्तों या किसी स्थापित फ़िल्मी हस्ती के परिजनों) को लॉन्च करता है, तो उसे ऐसे व्यक्ति को भी काम देना चाहिए जो बाहरी है, मगर टेलेंटेड है। वे कहती हैं कि अगर हम सभी को समान मौके देने लगें तो यह इंडस्ट्री बाहरी लोगों के लिए आसान हो जाएगी। असल में, यह विवाद काफ़ी समय से चल रहा है कि फ़िल्मों में प्रवेश के लिए बाहरी कलाकारों को भारी स्ट्रगल करना पड़ता है जबकि इंडस्ट्री के स्थापित लोगों के बच्चों...

  • कहानी अपने-अपने यूनिवर्स की

    यूनिवर्स का उद्देश्य दर्शकों के वास्तविक सरोकारों पर आधारित कथ्य और मनोरंजन देना नहीं है। ये तो दर्शकों को एक फ़र्ज़ी और उत्तेजक दुनिया में ले जाने के लिए गढ़े गए हैं। कमाई बढ़ाने के एक और तरीके के तौर पर। जिस तरह का मनोरंजन हमारे बड़े फिल्मकार पहले से चला रहे थे, उसी को इन यूनिवर्स ने एक संगठित शक्ल और दिशा दी है।  दूसरी ओर, दर्शकों को कुछ नया, कुछ रचनात्मक या उनके सुख-दुख से जुड़ा मनोरंजन देने वाली फ़िल्मों का हश्र देखिए। परदे से उलझती ज़िंदगी सलमान खान ‘राधे’, ‘अंतिम’ और ‘किसी का भाई किसी की जान’...

  • सबसे पीछे फ़िल्मी ख़बर

    सोशल मीडिया के हल्ले में आजकल फ़िल्मी लोगों के ढेरों इंटरव्यू होने लगे हैं। लगभग हर दिन ऐसे इंटरव्यू ख़बरें दे रहे हैं। अगर उनमें ख़बर नहीं मिली तो कोई पुराना इंटरव्यू निकाल लिया जाता है। जैसे संजय मिश्रा का यह इंटरव्यू तीन साल पुराना था, फिर भी इसकी ख़बर सब जगह आई। कोई कलाकार या फ़िल्मकार किसी शो में जाते हैं और वहां दो-चार बातें कह देते हैं तो वह भी ख़बर बन जाती है और हर कहीं छपती है, एक साथ। परदे से उलझती ज़िंदगी अभिनेता संजय मिश्रा का कहना है कि पढ़ाई में उनका मन बिलकुल नहीं...

  • हर मन के पिछवाड़े बहती एक उदास नदी

    आमिर ‘तारे ज़मीन पर’ से मिलते-जुलते विषय पर एक कॉमेडी फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ बना रहे हैं। अपने बेटे जुनैद की बनाई ‘प्रीतम प्यारे’ में और फिर एक यूरोपियन फ़िल्म की रीमेक ‘चैंपियन्स’ में भी वे परदे पर आएंगे। आमिर यह तो नहीं बताते कि महीनों लंबे इस ब्रेक में उन्होंने खुद को दोबारा कैसे ऊर्जायित किया, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार किया है कि वे कई साल से मानसिक परेशानियों से उबरने के लिए मनोचिकित्सकों की मदद लेते रहे हैं।  परदे से उलझती ज़िंदगी सनी देओल की तो ‘गदर 2’ के बाद जैसे लॉट’री निकल पड़ी है। ‘दंगल’ वाले नितेश...

  • क्या व्यर्थ गए ‘जवान’ के संदेश?

    परदे से उलझती ज़िंदगी आखिरकार शाहरुख खान की ‘जवान’ दुनिया भर में बॉक्स ऑफ़िस पर ग्यारह सौ करोड़ से ऊपर जुटा कर ‘पठान’ से आगे निकल गई। वह देश में छह सौ करोड़ को पार करने वाली पहली हिंदी फिल्म बन गई है और अमेरिका व मध्य-पूर्व में भी उसने हिंदी फिल्मों के पिछले तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। कोरोना के बाद ‘ब्रह्मास्त्र’ से दर्शकों के थिएटरों पर लौटने की जो शुरूआत हुई थी वह अब आगे बढ़ कर बॉलीवुड के हौसलों और उसकी आशावादिता को सहलाती लग रही है। यह खास कर तीन फ़िल्मों की बदौलत हुआ। किसी ने...

  • वहीदा- संवाद कम, अभिव्यक्ति ज़्यादा

    वहीदा की लगभग नब्बे फ़िल्मों में ‘प्यासा’, ‘कागज़ के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ भी हैं जिनमें उन्होंने गुरुदत्त के साथ काम किया। ये हिंदी सिनेमा की बेहद अहम फ़िल्में हैं। ‘प्यासा’ और ‘कागज़ के फूल’ तो अपने यथार्थपरक कथ्य के कारण देश की अग्रणी फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। लेकिन वहीदा को अपनी फिल्मों में सबसे ज्यादा ‘गाइड’ पसंद है।…वहीदा रहमान को ‘रेशमा और शेरा’ के लिए 1971 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिर 1972 में उन्हें पद्मश्री और 2011 में पद्मभूषण दिया गया। दादा साहब फाल्के पुरस्कार जो 1969 में शुरू हुआ, अब तक...

  • ‘जवान’ के संदेश – राजनीतिक या व्यावसायिक?

    ‘पठान’ से भी लोगों को कुछ नहीं मिला था, फिर भी वह हिट रही थी। सेलीब्रेशनों के इस दौर में लोग ‘जवान’ को देखने इसलिए जा रहे हैं कि शाहरुख की फिल्म को सेलीब्रेट कर सकें। वे कोई इसके राजनीतिक संदेशों के कारण सिनेमाघरों में डांस नहीं कर रहे। उन्हें इन संदेशों की उम्मीद भी नहीं थी। ये तो उनके लिए अतिरिक्त मनोरंजन की तरह आए हैं। इन्हें वे कभी वास्तविक जीवन में नहीं उतारने वाले। यह बात शाहरुख भी जानते हैं। ….यह ज़रूर है कि जिस दीवानगी और तादाद में लोग ‘जवान’ को देखने उमड़े हैं वह शाहरुख को...

  • एक और घोटाले की यादें

    ‘स्कैम 2003’ की स्क्रिप्ट लिखने में भी संजय सिंह से मदद ली गई है और निर्देशन तुषार हीरानंदानी का है जिन्होंने ‘सांड की आंख’ निर्देशित की थी।सना अमीन शेख, मुकेश तिवारी, भरत जाधव और शाद रंधावा को इस सीरीज़ से कुछ पहचान मिलेगी। ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़ को भी फायदा होगा जो अब अभिनय को गंभीरता से लेते दिखते हैं। मगर सबसे ज़्यादा लाभ तेल्गी बने गगन देव रियार को होगा। जितनी सहजता से उन्होंने इसे निभाया है उसके लिए हमारे जाने-माने कलाकारों को भी बहुत मेहनत करनी पड़ती। परदे से उलझती ज़िंदगी ख़्वाबों की कीमत क्या होनी चाहिए? ‘मेरे...

  • आतंकियों से लड़ता ‘द फ्रीलांसर’

    हमारे बहुत से फिल्मकार अब यह कहने से बचते हैं कि बाबरी मसजिद को गिराया गया था। हंसल मेहता की ‘स्कैम 2003’ में भी उसे ‘हादसा’ कहा गया है। बेहतर होता कि इसकी जगह ‘ध्वंस’ अथवा ‘कांड’ का प्रयोग किया जाता। इन दोनों शब्दों से भी यह जाहिर नहीं होता कि ऐसा किसने किया, मगर लेखन के स्तर पर ‘हादसा’ के मुकाबले ये कम निरपेक्ष हैं। इसी तरह डिज़्नी हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई नीरज पांडे की वेब सीरीज़ ‘द फ्रीलांसर’ बताती है कि अफ़गानिस्तान को तालिबान के हवाले कर जब अमेरिका वहां से लौट रहा है, तमाम विदेशी और हजारों...

  • राष्ट्रीय पुरस्कारों में ‘रॉकेट्री’ नंबर वन

    देशद्रोह और जासूसी के आरोपों का सामना करने के बाद भी इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन ने पीएसएलवी का इंजन तैयार किया था। आर माधवन की फिल्म ‘रॉकेट्री: द नंबी इफ़ेक्ट’ इन्हीं नंबी नारायणन के जीवन पर बनी थी। इसमें आर माधवन ने अभिनय ही नहीं किया, इसे लिखा भी और निर्देशन भी दिया। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है जो कि चंद्रयान-3 की सफलता के मौजूदा माहौल में पूरी तरह फिट होता है। ‘पुष्पा: द राइज़’ में अल्लू अर्जुन को श्रेष्ठ अभिनेता के लिए चुना गया है। यह...

  • प्रतिभा और व्यक्तित्व का ‘घूमर’

    ‘घूमर’ जितनी सैयामी खेर की फिल्म है उतनी ही अभिषेक बच्चन की भी है। संभव है कि ‘गदर 2’ और ‘ओएमजी 2’ के हल्ले में यह फिल्म थिएटरों में दब जाए, लेकिन सैयामी और अभिषेक दोनों के लिए यह अभूतपूर्व फिल्म है। सैयामी खुद एक क्रिकेटर रही हैं। क्रिकेट की समझ ने इस भूमिका को प्रभावी बनाने में उनकी मदद की है। और इस समझ ने ही उनके एक दायें हाथ के बल्लेबाज से एक बाएं हाथ की स्पिनर बनने की प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाया है।  प्रतिभा और व्यक्तित्व का ‘घूमर’ सैयामी खेर उन कलाकारों में हैं जो मौका मिले...

  • देश भर में गांधी का भूत

    राजकुमार संतोषी ने कुछ समय पहले ‘गांधी-गोड़से, एक युद्ध’ नामक फिल्म बनाई थी। संतोषी करीब दस साल बाद इस उत्तेजक विचार के साथ काम पर लौटे थे कि गांधी और गोड़से की बहस करवा दी जाए। वे अपने समय में जो कुछ नहीं कह पाए उसे कह डालें। इसे लिखने में असगर वज़ाहत भी शामिल थे और संगीत एआर रहमान का था। संतोषी ने इसमें अपनी बेटी तनीषा संतोषी को भी पेश किया था, मगर जब तक लोगों को इस फिल्म के बारे में पता चलता तब तक तो यह उतर भी गई। संतोषी को इससे ऐसा झटका लगा कि...

  • सनी देओल और पाकिस्तान की जोड़ी

    गदर 2’ एक ऐसी अजीब फिल्म है जिसमें कुछ नया, कुछ अनोखा नहीं है। लेकिन इसमें भावनाओं का अतिरेक है, पाकिस्तान है, उसकी किरकिरी है और दर्शकों को मज़ा आता है। अनिल शर्मा की हमेशा यह शिकायत रही कि पहली ‘गदर’ को समीक्षकों ने बेकार फिल्म बताया था और उसके साथ रिलीज़ हुई ‘लगान’ के कसीदे पढ़े थे, जबकि बॉक्स ऑफिस पर ‘गदर’ कहीं ज़्यादा चली थी। संयोग देखिए कि इस बार भी समीक्षक लोग ‘गदर 2’ के मुकाबले ‘ओएमजी 2’ की ज्यादा तारीफ कर रहे हैं। परदे से उलझती ज़िंदगी पहली ‘गदर’ के बाद मास्टर तारा सिंह और सकीना...

  • रजनीकांत से बड़ा कोई नहीं

    फ़िल्मी स्टारडम में रजनीकांत को शायद कोई नहीं छू सकता। उनकी नई फिल्म ‘जेलर’ की पहले दिन की कमाई 48 करोड़ रुपए थी। यह तमिल फिल्म के इतिहास का सबसे बड़ा आंकड़ा है। आप कह सकते हैं कि शाहरुख खान की ‘पठान’ ने पहले दिन 55 करोड़ रुपए कमाए थे जो इससे ज़्यादा थे। मगर रजनीकांत के लिए उनके चाहने वालों में जैसा क्रेज़ है उसके सामने शाहरुख वाला क्रेज़ कुछ भी नहीं। नेल्सन दिलीपकुमार के निर्देशन की ‘जेलर’ को वैसी ही मसालों से परिपूर्ण फिल्म माना जा रहा है जैसी कमल हासन की ‘विक्रम’ थी। मगर कमल हासन के...

  • शिवभक्ति और देशभक्ति का मुक़ाबला

    शिवभक्ति की इस फ़िल्म को देशभक्ति से ओतप्रोत ‘गदर 2’ से मुकाबला करना है। यानी इस मुक़ाबले में कोई भी आगे निकले, जीतेंगे भक्त ही। ‘गदर: एक प्रेम कथा’ के इस सीक्वल का पूरा नाम है ‘गदर 2: द कथा कंटीन्यूज़’। निर्माता-निर्देशक अनिल शर्मा की इस फिल्म में पाकिस्तान से निपटते सनी देओल और अमीषा पटेल तो हैं ही, एक प्रमुख भूमिका में उत्कर्ष शर्मा भी हैं जो अनिल शर्मा के बेटे हैं। लगभग 100 करोड़ में बनी यह फिल्म पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध की पृष्ठभूमि पर है। रणवीर सिंह ने एक के बाद एक अपनी कई फ़िल्मों...

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