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रेलवे के वे लोग

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नेटफ़्लिक्स पर यशराज फ़िल्म्स की मिनी सीरीज़ द रेलवे मेनमें स्टेशन मास्टर का नाम इफ्तिख़ार सिद्दीकी बताया गया है, लेकिन वास्तव में वह डिप्टी स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर थे। उन्होंने ही ट्रेनों का भोपाल आना रुकवाया था, स्टेशन पर जुटे लोगों के लिए मेडिकल सहायता मंगवाई थी और बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस को आते ही रवाना कर दिया था। दस्तगीर साहब की अपनी हालत खराब हो रही थी, फिर भी वे लगातार भाग-दौड़ करते रहे। उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी बचाव अभियान में लगे रहे। उस रात भोपाल जंक्शन पर रेलवे के तेईस कर्मचारियों की जान गई।…. चार एपीसोड की यह सीरीज़ उस रात का भोपाल भी दिखाती है और इन लोगों का जुझारूपन भी।

परदे से उलझती ज़िंदगी

वह सन् 1984 की दिसंबर 2 और 3 के बीच की रात थी। भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक बनाने वाले कारखाने से जहरीली गैस मिक यानी मिथाइल आइसोसाइनेट लीक हुई। वह भी दर्जनों टन, यानी बड़ी मात्रा में। धीरे-धीरे वह शहर में पसरने लगी। बस्ती दर बस्ती। सांसों में घुस कर लोगों को मारने लगी। बहुतों को मौत ने पकड़ लिया और बहुत से बचने को भागे। वहां की सड़कों पर हजारों लोग भागते दिखे। परिवार के परिवार भाग रहे थे। कितने ही लोग अपनों से बिछड़ गए। और कितने ही भागते-भागते जहां-तहां गिर पड़े और फिर उठ नहीं सके। इंसानों की तरह जानवरों की भी लाशें सड़कों पर पड़ी थीं। नर्क से टूट कर एक मंज़र उस रात भोपाल में आ गिरा था।

ऐसी भयावह, कहर की रात में भी कुछ लोग खुद अपने घरवालों के पास जाने या किसी सुरक्षित जगह पहुंचने की बजाय, दूसरों को बचाने की जद्दोजहद में लगे थे। वे सब साधारण से लोग थे, जो चाहते थे कि लोगों की जान बचाने के लिए जो भी अपनी पहुंच में है वह किया जाए। कहना मुश्किल था कि जुनून उन पर सवार था या वे जुनून पर। नेटफ़्लिक्स पर दिखाई जा रही यशराज फ़िल्म्स की मिनी सीरीज़ ‘द रेलवे मेन’ उन्हीं कुछ लोगों की कहानी है। चार एपीसोड की यह सीरीज़ उस रात का भोपाल भी दिखाती है और इन लोगों का जुझारूपन भी। मगर यह सीरीज़ आपको एक तरह के अपराध बोध से भी गुज़ारती है। एक ऐसी मुसीबत की यादों से रूबरू करा कर, जो नहीं आनी चाहिए थी, मगर उसे आने दिया गया। इस मुसीबत का पहले से अंदेशा था, पर यह देश उसे रोक नहीं पाया।

यूनियन कार्बाइड के कारखाने में धांधली की हद तक जो लापरवाही बरती जा रही थी, इसके लिए वह कंपनी जितनी जिम्मेदार थी, उतना ही हमारा सिस्टम भी था। कार्बाइड के कर्ता-धर्ता लोगों को बचाने के बाकायदा ऊपर से आदेश दिए गए। यानी न्याय के प्रति सरकार में अनिच्छा थी। उलटे, अन्याय के पक्ष में भारी-भरकम तर्क दिए गए। यहां तक कि एक जर्मन वैज्ञानिक गैस पीड़ितों की जान बचाने के लिए दवा लेकर आया तो उसे तत्काल देश से बाहर जाने का आदेश दिया गया। उसे देश से निकालने के पक्ष में भी तर्क मौजूद थे।

लोगों को बचाने की मुहिम की शुरूआत भोपाल जंक्शन के स्टेशन मास्टर ने की। यह पात्र केके मेनन ने निभाया है जिसे निश्चित ही उनकी सर्वोत्तम भूमिकाओं में गिना जाएगा। वे अपने अभियान की धुरी बनते हैं। रात को जैसे ही पता लगता है कि हवा में कुछ गड़बड़ी है तो वे ट्रेनों को भोपाल पहुंचने से रोकने में जुट जाते हैं। मगर बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस का क्या करते जो कि पिछले स्टेशन से चल भी चुकी थी। एक ही तरीका था कि उसे भोपाल स्टेशन पर रुकने नहीं दिया जाए ताकि उसमें सवार लोगों की जान बचे। इधर शहर से भागने के लिए सैकड़ों लोग स्टेशन पहुंच गए हैं। उन्हें वेटिंग रूम में इकट्ठा किया जाता है ताकि वे बाहर फैली गैस से बचे रह सकें। कार्बाइड का एक पूर्व ट्रक ड्राइवर जो रेलवे में नया भर्ती हुआ था और अभी काम सीख ही रहा था, उसे एक इंजन में कुछ डिब्बे जोड़ स्टेशन पर आ पहुंचे लोगों को शहर से बाहर ले जाने का काम दिया जाता है। यात्री डिब्बे नहीं मिले तो मालगाड़ी वाले डिब्बे ही लगा लिए गए और उनमें लोगों को भर दिया गया। दिवंगत इरफ़ान खान के बेटे बाबिल खान यह ड्राइवर बने हैं जिनका अभिनय भरोसा जगाता लगता है। स्टेशन मास्टर की सहायता के लिए बहुत कम कर्मचारी जीवित बचे थे। ऐसे में एक पुलिस कांस्टेबल से उन्हें मदद मिलती है जो कि असल में एक चोर था और स्टेशन की तिजोरी साफ़ करने की जुगत में वहां आया था। स्टेशन मास्टर ने उसे भी लोगों की जान बचाने के काम पर लगा दिया। दिव्येंदु इस भूमिका में उतने ही सहज दिखे हैं जितने कि कार्बाइड कारखाने में सुपरवाइजर के रूप में दिब्येंदु भट्टाचार्य लगते हैं। आर माधवन रेलवे के जनरल मैनेजर हैं और गड़बड़ी की खबर मिलने पर, अपने सीनियरों के मना करने के बावजूद खुद जीएम स्पेशल इंजिन में भोपाल चल देते हैं। मगर माधवन और उनकी मदद करने वाली एक ब्यूरोक्रेट की भूमिका में जूही चावला इस कहानी में पूरी तरह घुल नहीं पाते। उनका स्टार वाला मैनेरिज़्म उन्हें कुछ इलीट बनाए रखता है। जिस बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस को भोपाल में रुकने नहीं देने की कोशिश हो रही थी उसमें अपने बेटे के साथ एक सिख महिला भी यात्रा कर रही थी। इंदिरा गांधी की हत्या से नाराज़ कुछ लोग उन्हें मारने के लिए उनके पीछे पड़े हैं। गार्ड रघुबीर यादव उन्हें बचाता चाहता है तो वे लोग उसी पर हमला कर देते हैं। इस सिख महिला की भूमिका मंदिरा बेदी ने की है जो अपने बेटे को बचाने के लिए उसे लड़की बनाए हुए है।

भोपाल गैस कांड वास्तव में इंदिरा गांधी की हत्या के एक महीने से भी ज्यादा समय बाद हुआ था। तब तक तो दिल्ली में, जहां सबसे ज्यादा सिख विरोधी हिंसा हुई थी, वहां भी सेना को हटाने की बातचीत होने लगी थी। इसलिए यह अजीब लगता है कि एक महीने बाद भी मध्य प्रदेश में दौड़ती एक ट्रेन में कुछ लोग सिखों की तलाश में घूम रहे हैं। मगर क्योंकि सीरीज़ में ‘कोई ब़ड़ा पेड़ गिरता है तो ज़मीन हिलती है’ कहते राजीव गांधी को दिखाया जा चुका था इसलिए लेखक आयुष गुप्ता के लिए उससे जुड़ी हिंसा को शामिल करने में आसानी हो गई। वैसे भी सीरीज़ को वास्तविक घटनाओं से प्रेरित काल्पनिक कहानी बताया गया है जिससे निर्देशक शिव रवेल को भी कुछ ऐसी चीजों को रखने की छूट मिल गई जिनसे यशराज फ़िल्म्स का मोह रहा है।

दिवंगत पत्रकार राजकुमार केसवानी ने पहले ही बता दिया था कि यूनियन कार्बाइड के इस कारखाने से कोई बड़ा हादसा हो सकता है और वह हो गया। और जब हुआ तब भी वे इसे कवर करते रहे। वे न केवल इसके लिए पुरस्कृत हुए बल्कि आज भी इस कांड को याद करें तो केसवानी याद आते हैं। सीरीज़ में उनकी भूमिका पूरी सहजता के साथ सन्नी हिंदुजा ने की है। इस पत्रकार से ही सीरीज़ शुरू होती है और ख़त्म भी उसी पर होती है। यानी यशराज फ़िल्म्स को इस कहानी में स्वत: एक पत्रकार मिल गया जबकि चासनाला खदान हादसे पर बनाई अपनी फ़िल्म ‘काला पत्थर’ में उसे पत्रकार की भूमिका गढ़नी पड़ी थी। परवीन बॉबी यह पत्रकार बनी थीं जो कि खदानों के हालात कवर करने आती हैं। उनके आने से ही फ़िल्म शुरू होती है और फ़िल्म के अंत में उनका प्लेन जाता दिखाई देता है। मतलब, एक पत्रकार एक स्टोरी लेकर जा रही है।

कुछ ऐसा ही मामला चोर वाला भी है। इस सीरीज़ के निर्माता आदित्य व उदय चोपड़ा के पिता यश चोपड़ा के बड़े भाई बीआर चोपड़ा ने एक फिल्म बनाई थी – ‘द बर्निंग ट्रेन’। उसमें भी जितेंद्र जो ट्रेन में आग लगने पर धर्मेंद्र और विनोद खन्ना इत्यादि का हाथ बंटाते हैं, असल में एक चोर बने थे और चोरी के मक़सद से ही उस ट्रेन में सवार हुए थे। यानी चोरी के इरादे से आए किसी व्यक्ति का किसी बचाव अभियान में शामिल होना, यह भी चोपड़ा परिवार का एक फैसीनेशन है। ध्यान रहे, ‘काला पत्थर’ में शत्रुघ्न सिन्हा भी एक भागे हुए अपराधी थे, जिसने खदान में पानी भरने पर उसमें फंसे मजदूरों को बचाते हुए अपनी जान गंवा दी।

बहरहाल, वर्ष 2014 में यानी गैस कांड की तीसवीं बरसी पर भोपाल में अंतरराष्ट्रीय मीडिया जमा हुआ था। अगले साल इस कांड को चालीस साल हो जाएंगे। शायद तब भी भोपाल में कुछ कार्यक्रम आयोजित किए जाएं और फिर वैश्विक मीडिया जुटे। लेकिन इस कांड के बाद सज़ा और मुआवज़े के नाम पर जो कुछ घटा, उसे देखते हुए बाहरी मीडिया का यह जुटाव बेमानी है। यहां तक कि इस कांड में मरने वालों की और उससे स्थायी तौर पर बीमार हुए लोगों की संख्या भी हमेशा संदिग्ध रही है। ‘द रेलवे मेन’ में स्टेशन मास्टर का नाम इफ्तिख़ार सिद्दीकी बताया गया है, लेकिन वास्तव में वह डिप्टी स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तगीर थे। उन्होंने ही ट्रेनों का भोपाल आना रुकवाया था, स्टेशन पर जुटे लोगों के लिए मेडिकल सहायता मंगवाई थी और बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस को आते ही रवाना कर दिया था। दस्तगीर साहब की अपनी हालत खराब हो रही थी, फिर भी वे लगातार भाग-दौड़ करते रहे। उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी बचाव अभियान में लगे रहे। उस रात भोपाल जंक्शन पर रेलवे के तेईस कर्मचारियों की जान गई। दस्तगीर साहब के घर पर उनका एक बेटा मारा गया और दूसरा हमेशा के लिए रोगी हो गया। खुद उनके गले में गैस ने एक गांठ बना दी जिसके चलते वे हमेशा अस्पताल के चक्कर लगाते रहे। सन 2003 में उनका निधन हुआ। गैस कांड की रात ड्यूटी करते मारे गए रेलवे कर्मचारियों की याद में भोपाल स्टेशन के बाहर एक स्मारक बनाया गया। इन सबके नाम वहां लिखे गए। मगर क्योंकि गुलाम दस्तगीर बहुत बाद में मरे, इसलिए उनका नाम उस सूची में नहीं था। आज कितने लोग इस स्मारक में जाते होंगे? भोपाल में इस कांड के दूसरे स्मारक भी उपेक्षित ही हैं। शायद यह सीरीज़ उनकी महत्ता भी याद दिलाए।

By सुशील कुमार सिंह

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता, हिंदी इंडिया टूडे आदि के लंबे पत्रकारिता अनुभव के बाद फिलहाल एक साप्ताहित पत्रिका का संपादन और लेखन।

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