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एआई का भारत में मजाक चल रहा है

वह तो भला हो गलगोटिया वालों का कि उन्होंने भारत में हुए एआई समिट में चीन का रोबोटिक कुत्ता अपना आविष्कार बता कर पेश कर दिया, जिस पर पूरी दुनिया में हंसी उड़ी अन्य़था उस सम्मेलन के बाद तो भारत को एआई में विश्वगुरू घोषित किए जाने की तैयारी थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भारत का एआई समिट दो कारणों से चर्चा में रहा। एक चीन के रोबोटिक कुत्ते को भारत की एक यूनिवर्सिटी द्वारा अपना कह कर बताने। दूसरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एआई के दिग्गजों के हाथ उठा कर चुनावी रैली जैसा प्रदर्शन करने के कारण।

वह तस्वीर दुनिया भर में वायरल हुई थी। ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो आमोदेई दोनों को मोदी के जोर देने पर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उठाना पड़ा, जबकि दोनों एक दूसरे से बात करना तक पसंद नहीं करते। दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उठाते समय बहुत असहज दिख भी रहे थे। लेकिन मोदी को उसकी परवाह नहीं थी। उन्हें तो दिखाना था कि वे दुनिया के एआई दिग्गजों के साथ मिल कर भारत में एआई क्रांति का ऐलान कर रहे हैं।

खैर, उसके बाद भारत में एआई की चर्चा दूसरे ही संदर्भों में होने लगी। उस समय जो मजाक बना उसके बाद मान लिया गया कि एआई से मजाक ही बन सकता है। तभी भारत में एआई का इस्तेमाल राजनीतिक दल एक दूसरे का मजाक बनाने, एक दूसरे को कमजोर बताने और एक दूसरे को अपमानित करने के लिए कर रहे हैं। हालांकि अमेरिका में भी भले प्रौद्योगिकी के दिग्गज एआई के क्षेत्र में बड़े काम कर रहे हैं और इसकी प्रगति को लेकर चिंतित भी हैं। लेकिन वहां भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता एआई का इस्तेमाल अपना मजाक बनवाने और दूसरे का मजाक बनाने के लिए कर रहे हैं। ट्रंप ने एआई से बना कर दर्जनों मीम्स सोशल मीडिया में शेयर किए। किसी में वे ग्रीनलैंड पर कब्जा कर रहे होते हैं तो किसी में कनाडा को अमेरिका का हिस्सा बना रहे होते हैं तो किसी में ईरान को नष्ट कर रहे दिखते हैं। एआई का जैसा इस्तेमाल राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं वैसी ही इस्तेमाल भारत के नेता भी कर रहे हैं। सिर्फ एआई का ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भारत में ऐसे ही कामों के लिए किया जा रहा है।

भारत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स का भी ऐसा ही इस्तेमाल है तो फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन आदि का भी इसी तरह का इस्तेमाल हो रहा है। सभी पार्टियों ने सैकड़ों या हजारों फर्जी अकाउंट बना रखे हैं। भाजपा के तो ‘भाजपा इजराइल’ और ‘भाजपा फिलस्तीन’ के नाम से भी अकाउंट बने हैं। हालांकि पार्टी कहेगी कि इससे उनका कोई लेना देना नहीं है। लेकिन असल में वहां से वह काम सारे काम हो रहे हैं, जो पार्टी अपने आधिकारिक हैंडल से नहीं कर सकती है। वहां जिस तरह का ऑफेंसिव कंटेंट डाला जाता है, उसकी इजाजत किसी भी सभ्य समाज में नहीं हो सकती है। बात बात में कंटेंट हटाने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश देने वाली सरकार इन मामलों में चुप रहती है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भाजपा ऐसा कर रही है। भाजपा का स्केल थोड़ा बड़ा है। वैसे भी आजकल प्रधानमंत्री अपने लगभग हर भाषण में स्केल और स्पीड की बात कर रहे हैं। तो विपक्षी पार्टियों के लिए अपमानजनक कंटेंट तैयार करके सोशल मीडिया में उसे शेयर करने के मामले में भी भाजपा की स्पीड और स्केल बड़ा है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। अगर भाजपा समर्थकों के हैंडल से सोनिया गांधी से मिलती जुलती शक्ल वाली महिला की तस्वीर और वीडिया बना कर बार बाला नाम से पोस्ट किया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर से नरेंद्र मोदी से मिलते जुलते शक्ल वाले व्यक्ति को वडनगर रेलवे स्टेशन पर जेबतराशी करते दिखाया जा रहा है। भाजपा समर्थकों की ओर से अखिलेश यादव को टोंटी चोरी के रूप में दिखाया जा रहा है तो सपा समर्थक अखिलेश को हीरो और योगी आदित्यनाथ को विलेन बता कर फिल्मी अंदाज में पेश कर रहे हैं।

भारत के नेताओं के लिए एआई का कोई सार्थक या सकारात्मक इस्तेमाल नहीं है। यह प्रचार सामग्री तैयार करने और विपक्ष के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा अपमानजनक कंटेंट तैयार करने में इस्तेमाल हो रहा है। पहले पार्टियों के कार्यकर्ता हाथ से पोस्टर और बैनर तैयार करते थे। तब उनमें सार्थक और समय की वास्तविकताओं को बताने वाले नारे लिखे होते थे। बाद में प्रिटिंग प्रेस में पोस्टर, बैनर छपने लगे। तब पोस्टर के साथ प्रेस का नाम लिखना होता था। इसलिए कोई प्रेस वाला अपमानजनक सामग्री नहीं छापता था। बाद में कंप्यूटर ने इस काम को बहुत आसान बना दिया। कंप्यूटर से तैयार करके बिना प्रिटिंग प्रेस गए अपने प्रिंटर से पोस्टर, पैम्फलेट आदि बनाए जाने लगे। तब नेताओं के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालना बहुत आसान हो गया। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और एआई ने मिल कर इस काम को बहुत बड़े स्तर पर पहुंचा दिया है। अब आइडिया भी एआई जेनरेट कर रहा है, तस्वीरें और वीडियो भी वही तैयार कर रहा है और उससे कंटेंट भी वही बना रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी अकाउंट बना कर उस पर एआई से तैयार कंटेंट शेयर करना और उसे वायरल कराना आज की राजनीति का और प्रचार का भी सबसे बड़ा सत्य है। भारत में कम से कम नेता और पार्टियां एआई का इस्तेमाल इसके लिए ही कर रही हैं।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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