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दुनिया में साजिशें चलती रहती हैं

भारत में विदेशी साजिश की बात को ऐसे बताया जा रहा है, जैसे यह कोई अभूतपूर्व बात हो यानी ऐसी बात हो, जो पहले कभी नहीं हुई है। संघ प्रमुख हों या प्रधानमंत्री दोनों ऐसे बता रहे हैं, जैसे नरेंद्र मोदी के आने के बाद दुनिया में विदेशी साजिशें चालू हुई हैं और इन साजिशों के कारण ही भारत आगे नहीं बढ़ पा रहा है। हकीकत यह है कि मोदी से पहले के सारे प्रधानमंती भी विदेशी साजिश के आरोप लगाते थे। हर प्रधानमंत्री और हर सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए विफलताओं का ठीकरा विदेशी साजिश पर फोड़ती रही हैं। हकीकत यह है कि एक देश के खिलाफ दूसरे देश की साजिश का मामला सनातन है। जो मजबूत होते हैं वे इन साजिशों का मुकाबला करते हैं और जो कमजोर होते हैं वे इसका रोना रोते हैं।

इसकी सबसे बड़ी मिसाल इजराइल है। अपने निर्माण के दिन से वह दुनिया के 50 से ज्यादा इस्लामिक देशों की साजिशों के निशाने पर है। इस्लामिक देश उसके वजूद को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इसका रोना रोने की बजाय इजराइल ने अपने को इन साजिशों का मुकाबला करने के लिए तैयार किया। उसने लिए अंतरराष्ट्रीय अलायंस बनाए और अपने को आर्थिक व सामरिक रूप से मजबूत किया। एक समय था, जब सोवियत संघ और अमेरिका एक दूसरे के खिलाफ साजिश करते थे। अंततः उस साजिश में अमेरिका कामयाब हुआ और उसने सोवियत संघ के टुकड़े कर दिए। आज चीन और अमेरिका एक दूसरे से बात भी कर रहे हैं और एक दूसरे के खिलाफ साजिश भी कर रहे हैं। ईरान करीब पांच दशक से इजराइल और अमेरिका के खिलाफ साजिश कर रहा है। पश्चिम एशिया के अनेक देश एक दूसरे के खिलाफ साजिशों में शामिल हैं।

इसलिए अगर भारत के खिलाफ कोई साजिश हो रही है तो यह एक सामान्य प्रक्रिया है। जरुरत इससे निपटने के उपाय करने की है। समस्या यह है कि भारत किसी भी वैश्विक खेल में शामिल ही नहीं है। वैश्विक साजिशें हर विश्व व्यवस्था का हिस्सा रही हैं। वर्ल्ड ऑर्डर कोई भी रहा हो, साजिशें हर समय चलती हैं। यह भी किसी भी वर्ल्ड ऑर्डर में भारत कोई बड़ा प्लेयर नहीं रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री जो बार बार कह रहे हैं कि नया वर्ल्ड ऑर्डर बन रहा है तो उसमें भी भारत कोई महत्वपूर्ण खिलाड़ी नहीं होगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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