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महंगाई दर भी आंकड़ों की बाजीगरी

भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर यानी रेपो रेट करीब 44 महीने के बाद की है। बीते 44 महीनों में ब्याज दर या तो स्थिर रही या उसमें कमी की गई। लंबे समय से रेपो रेट 5.25 फीसदी पर स्थिर था, जिसे बढ़ा कर 5.50 फीसदी कर दिया गया है। मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की दोमासिक बैठक के बाद जब रेपो रेट बढ़ाने की घोषणा हुई तो मामला सिर्फ 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी पर रुक नहीं गया, बल्कि सूत्रों के हवाले से और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर दावा किया गया कि रेपो रेट में अभी और बढ़ोतरी होगी। यहां तक कहा गया कि इसमें एक फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। अगली बैठक दिसंबर में है और उस समय 0.50 फीसदी बढ़ोतरी की बात कही जा रही है।

रेपो रेट बढ़ने और आगे बढ़ते रहने की खबरों का बहुत बड़ा असर गुरुवार, आठ अक्टूबर को शेयर बाजार पर पड़ा। बीएसई का संवेदी सूचकांक एक हजार अंक से ज्यादा गिर गया। निवेशकों के लाखों करोड़ रुपए एक दिन में डूब गए वैसे पिछले नौ हफ्ते से लगातार शेयर बाजार गिर रहा है और करीब 20 लाख रुपए की बाजार पूंजी स्वाहा होने की खबर है।

बहरहाल, रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में जो बढ़ोतरी की उसका आधार यह था कि महंगाई बढ़ रही है। सवाल है कि महंगाई कितनी बढ़ रही है? सरकार के आंकड़ों में तो महंगाई इतनी नहीं बढ़ी है कि उसे नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट बढ़ाना पड़े!

खुदरा महंगाई का सबसे ताजा आंकड़ा अगस्त है। अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही, जो जुलाई में 4.45 फीसदी थी। यह सरकारी आंकड़ा है। सोचें, रिजर्व बैंक ने खुद चार फीसदी की औसत महंगाई दर बनाए रखने का लक्ष्य तय किया। उसके दो से छह फीसदी का लक्ष्य बनाया है। यानी अधिकतम छह फीसदी तक महंगाई होती है तो काम चल सकता है। उससे ज्यादा होने पर मुश्किल होगी। उसके हिसाब से औसत महंगाई चार फीसदी तक रहे तो ठीक है। फिर 4.45 फीसदी या 4.82 फीसदी की महंगाई दर को पैनिक होने की स्थिति नहीं मान सकते हैं। इसका अर्थ है कि इन आंकड़ों से अलग असली आंकड़ा कुछ और है। महंगाई के सरकारी आंकड़ों से अलग असली महंगाई वह है, जिसे लोग महसूस कर रहे हैं पर सरकार बता नहीं रही है।

असली महंगाई की बात करें तो वह सरकार के आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। बरसात खत्म हो गई है फिर प्याज की कीमतें 70 रुपए किलो से कम नहीं हैं। यह स्थिति तब है, जब सरकार सस्ता प्याज बिकवाने की बात कर रही है। इसी तरह 31 अक्टूबर तक सरकार ने शुल्क मुक्त चीनी के आयात की अनुमति दी थी फिर भी चीनी की कीमत 70 रुपए किलो से कम नहीं हो रही है। ईंधन की महंगाई चरम पर है। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें बेहिसाब बढ़ी हैं, जिससे माल ढुलाई बहुत महंगा हुआ है और खाने पीने की सारी चीजों की कीमत बढ़ गई है। इसके बावजूद महंगाई का आंकड़ा 4.82 फीसदी बताते है। यह हाथी के दिखाने के दांत हैं। असली महंगाई इससे कहीं ज्यादा है। यह वैसे ही है जैसे गर्मियों में बताया जाता है कि तापमान 45 डिग्री है, लेकिन महसूस होने वाला तापमान 52 डिग्री या उससे ज्यादा है। असल में महसूस होने वाली गर्मी कई दूसरे फैक्टर पर निर्भर करती है। वैसे ही महसूस होने वाली महंगाई अलग है और सरकार का आंकड़ा अलग है।

यह इसलिए भी हुआ क्योंकि सरकार ने महंगाई के आकलन का तरीका भी बदल दिया है। अब 2024 की नई सीरीज के आधार पर महंगाई का आकलन हो रहा है। सरकार ने बड़ी होशियारी से खुदरा महंगाई के बास्केट में खाने पीने की चीजों का वजन कम कर दिया। खुदरा महंगाई का आकलन करने वाली पुरानी सीरीज में खाने और पीने की चीजों का वजन 45.86 फीसदी होता था। नई सीरीज में इसे घटा कर 35.75 फीसदी कर दिया है। यानी 11 फीसदी से ज्यादा की कमी की गई है।

सोचें, जिन वस्तुओं का सबसे ज्यादा उपभोग है और जिन वस्तुओं की कीमतें अलग अलग सीजन में अलग अलग कारणों से बहुत बढ़ती रहती है उनके वजन में इतनी बडी कटौती कर दी गई। जाहिर है इससे महंगाई की दर पहले के मुकाबले कम दिखाई देगी। लेकिन लोगों को ज्यादा महसूस होगी क्योंकि खाने पीने की चीजों की कीमतें तो बेतहाशा बढ़ रही हैं। हालांकि भले सरकार इस महसूस होने वाली महंगाई का आंकड़ा नहीं बता रही है लेकिन उसको पता है और इसलिए रेपो रेट में बढ़ोतरी हुई है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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