फिलहाल ‘फ्लेवर ऑफ द सीजन’ विदेशी साजिश का है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक सेवक संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष के समापन समारोह में मोहन भागवत ने कहा कि विदेशी ताकतें भारत के खिलाफ साजिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया के कुछ देशों को भारत की तरक्की पसंद नहीं आ रही है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी बात को दोहराया। उन्होंने भी विजयादशमी के दिन ही यह बात कही। उसके बाद से हर नेता, मंत्री यह कहानी सुना रहा है। वैसे यह कहानी सुनाने की शुरुआत थोड़े दिन पहले हुई थी, जब घरेलू राजनीति में नैरेटिव का कंट्रोल भाजपा और सरकार के हाथ से निकल गया।
जब लगा कि जो वादे किए गए हैं वो पूरे नहीं हो रहे हैं और न हो सकते हैं तो फिर वादों के पूरा नहीं होने का या अच्छे दिन नहीं आने का या भारत के विश्वगुरू नहीं बन पाने का ठीकरा किसके ऊपर फोड़ा जाए तो विदेशी साजिश की बात शुरू हुई। कितनी हैरानी की बात है कि देश की सभी विपक्षी पार्टियों को विदेशी साजिश का मोहरा बना दिया गया। पता नहीं जॉर्ज सोरोस को भारत के बारे में कितनी जानकारी है या अमेरिका में उनको कितने लोग जानते हैं लेकिन भारत में सत्तारूढ़ दल और केंद्र सरकार के लोगों ने सोरोस का नाम घर घर पहुंचाया है। पता नहीं इस बार विजयादशमी पर भक्तों ने सोरोस का पुतला क्यों नहीं जलाया? जबकि कॉकरोच के पुतले जलाए गए!
बहरहाल, अगर दुनिया के देश भारत के खिलाफ साजिश कर रहे हैं तो भारत की क्या तैयारी है? और अगर तैयारी अच्छी है तो फिर इसकी चिंता क्या करनी है? अगर चिंता है तो इसका अर्थ है कि तैयारी पूरी नहीं है या मुकाबले की क्षमता नहीं है। सोचें, एक तरफ कहा जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बन गया है, दुनिया के देश भारत की बात अब पहले से ज्यादा गंभीरता से सुनते हैं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो एक बार कहा था कि दुनिया का कोई भी बड़ा फैसला बिना मोदीजी से पूछे नहीं होता है, फिर सवाल है कि इसके बावजूद क्यों दुनिया के देश भारत के खिलाफ साजिश कर रहे हैं? और भारत को पता भी है तो उसे रोकने के लिए मोदीजी ने क्या किया है?
क्या भारत सरकार को पता है कि कौन कौन से देश या कौन सी संस्थाएं या कौन सा व्यक्ति भारत के खिलाफ साजिश कर रहा है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि विदेशी साजिश हो रही है यह बहुत अस्पष्ट टर्म है। सरकार तो नहीं बताएगी कि कौन साजिश कर रहा है लेकिन अपनी तरफ से सोचा जाए तो भारत जितना बड़ा देश है और सरकार जितनी ब़डी ताकत बन जाने की बात कर रही है उसमें अफ्रीका या लैटिन अमेरिका का कोई देश तो साजिश सोच ही नहीं सकता। यूरोप के ज्यादातर देश अपनी मुश्किलों में फंसे हैं तो वे भी साजिश नहीं कर सकते हैं। रूस के साथ ऐतिहासिक दोस्ती की प्रधानमंत्री अक्सर मिसाल देते हैं। जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भी भारत की दोस्ती की कसमें खाई जाती हैं। फिर बचे चीन और अमेरिका या दक्षिण एशिया में पाकिस्तान। तो पाकिस्तान की साजिशों का आजादी के समय से ही पता है। सो, ले देकर दो देश बचते हैं, जिनके बारे में माना जा सकता है कि ये या इनके यहां की संस्थाएं या इनके यहां के कारोबारी भारत के खिलाफ साजिश कर सकते हैं।
चीन की साजिश चोरी छिपे वाली नहीं है। वह भारत की जमीन कब्जा कर रहा है। भारत की संप्रुभता को चुनौती दे रहा है। अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख को अपना क्षेत्र घोषित करता है। इन दो क्षेत्रों में गांवों, कस्बों, नदियों, पहाड़ों के नाम तिब्बती में रख कर उस पर दावा करता है। उसके सैनिक सीमा पर सैन्य बुनियादी ढांचा तैयार कर रहे हैं। वह सीमा पर सैन्य गांव बसा रहा है। अभी सीमा पर तैनात अर्धसैनिक बल आईटीबीपी के प्रमुख शत्रुजीत कपूर ने कहा है कि हाल के दिनों में भारत और चीन के सैनिकों के बीच कई बार फेसऑफ हुआ है। चीन भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल को अपनी कॉलोनी बना रहा है और वहां के जरिए भारत की जासूसी भी करवा रहा है। ऊपर से भारत को आर्थिक गुलाम बनाने के तमाम प्रयास कर रहा है। लेकिन क्या भारत इनमें से किसी एक भी (हां एक भी) चीज का मुकाबला कर पा रहा है?
यह खुलेआम भारत के खिलाफ साजिश है और इसके पीछे कोई विपक्षी पार्टी नहीं है या किसी विपक्षी पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है। मगर याद करें, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से सबसे ज्यादा मिलने वाले भारतीय नेताओं में प्रधानमंत्री मोदी अव्वल हैं। मुख्यमंत्री रहते भी उन्होंने कम से कम चार बार चीन का दौरा किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद शी जिनपिंग को साबरमती के तट पर झूला झुलाया तो मामलापुरम में भी उनके साथ खूब दोस्ती दिखाई। वुहान स्पिरिट के लिए खुद चीन गए। चीन की कंपनियों का बेहिसाब पैसा गुजरात में और गुजरात के कारोबारियों की कंपनी में लगा है। सोचें, भारत के खिलाफ जो सबसे बड़ी साजिश रच रहा है वही सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी भी मोदी के समय में बना है। फिर उससे कैसे लड़ेंगे? वह साजिश कर रहा है और हम उसके साथ व्यापार बढ़ाते जा रहे हैं और मजा देखिए जो विदेशी साजिश का आरोप विपक्ष की पार्टियों पर लगा रहे हैं!
ऐसे ही अमेरिका खुलेआम साजिश कर रहा है और भारत के किसी विपक्षी नेता ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘माई फ्रेंड डोनाल्ड’ कह कर संबोधित नहीं किया है। ट्रंप खुलेआम पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसीम मुनीर को अपना पसंदीदा फील्ड मार्शल बताते हैं। वे पाकिस्तान को ईरान के मामले में मध्यस्थ बनाते हैं। भारत और पाकिस्तान के सैन्य टकराव में मध्यस्थ बनते हैं। पाकिस्तान को आईएमएफ और विश्व बैंक से पैसा दिलाते हैं। पाकिस्तान की सेना को हथियार सप्लाई करते हैं। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को हर दिन अपमानित करता है। वीजा के नियम बदलता है, उन्हें हथक़ड़ी बेडी पहना कर वापस भारत भेजता है, भारत के ऊपर एकतरफा टैरिफ लगाता है, सस्ता तेल खरीदने से रोकता है और अपना महंगा तेल खरीदने के लिए बाध्य करता है। पर क्या अमेरिका से यह सब काम भारत का विपक्ष करवा रहा है? क्या ट्रंप राहुल गांधी के पप्पू है या मोदी के ‘माई फ्रेंड डोनाल्ड’!
शी जिन पिंग, माई फ्रेंड डोनाल्ड ट्रंप की साजिशें स्पष्ट सामने हैं। मगर उनसे भारत को बचाने के लिए मोदीजी ने क्या किया है? क्या भारत आर्थिक रूप से इतना मजबूत और आत्मनिर्भर हो रहा है कि वह वैश्विक साजिशों का मुकाबला कर सके? भारत की अर्थव्यवस्था आज उपभोग, बाजार आधारित है, आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और अर्थव्यवस्था का आकार चार ट्रिलियन डॉलर से भी कम है। इसलिए सात फीसदी की विकास दर का कोई मतलब नहीं है। कहा जा रहा है कि भारत का निर्यात बढ़ रहा है। लेकिन निर्यात के लिए जो सामान तैयार हो रहे हैं उनका कच्चा माल तो चीन से आ रहा है। भारत में बना आईफोन दुनिया में सबसे ज्यादा बिक रहा है। लेकिन वह भारत में बना नहीं है। भारत में असेंबल हुआ है और उसका राजस्व अमेरिका ही जा रहा है या चिप बनाने वाले दूसरे देशों को जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं कि वे भारत को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में लगे हैं। जब वे पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तब चारों तरफ पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का हल्ला था। अभी 12 साल बाद भारत 3.6 ट्रिलियन पर अटका है। जिस दिन भारत पांच ट्रिलियन डॉलर पहुंच जाएगा उसी दिन तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन उससे जमीन पर रत्ती भर बदलाव नहीं होगा। तब भी 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज मिलता रहेगा। हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर भी चीन के एक चौथाई और अमेरिका के छठे हिस्से के बराबर नहीं पहुंचेंगे।
सो साजिश करने वाले पहचाने हुए हैं और उनका मुकाबला कैसे हो सकता है, यह भी सब जानते हैं। लेकिन उसकी कोई तैयारी नहीं है। देश में ‘बैड बिलिएनेयर’ यानी सरकार माई बाप की कृपा से बनने वाले अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है। इससे न तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और न देश के नागरिक आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट का कोई इकोसिस्टम नहीं है। न ही भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की रेस में कहीं है।
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