राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

सिर्फ असेंबलिंग का सेंटर

जैसे ही यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापार संधि फाइनल होने की बात आई वैसे ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत की और नरेंद्र मोदी की खूब तारीफ की। कहा कि जल्दी ही दोनों देशों के बीच एक अच्छी व्यापार संधि होगी। यह भारत के लिए आदर्श स्थित है कि  वह भयंकर व्यापार घाटे वाले देश से व्यापार मुनाफे वाले देश में अपने को बदले। लेकिन इसके लिए ऐतिहासिक रूप से भारत ने तैयारी नहीं की। हमारे यहां इस बात पर पीठ थपथपाई जा रही है कि भारत सबसे ज्यादा मोबाइल हैंडसेट निर्यात करने वाला देश बन गया है।

सोचें, यह क्या उपलब्धि हुई? भारत अपना एक भी हैंडसेट नहीं बनाता था। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय भारत की घरेलू हैंडसेट कंपनियां लावा और माइक्रोमैक्स का भारत के बाजार पर कब्जा था। लेकिन दो साल के भीतर ये कंपनियां गायब हो गई हैं और चीन की मोबाइल कंपनियों ने भारत के बाजार पर कब्जा कर लिया। भारत आज अमेरिका कंपनी एपल के आईफोन और दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग के हैंडसेट असेंबल करता है और उन्हें दुनिया के देशों में बेचा जाता है। सोचें, इसमें भारत के कुछ लोगों को नौकरी मिली है, इसके अलावा भारत को क्या हासिल हो रहा है!

असल में भारत असेंबलिंग का सेंटर बनता जा रहा है। दुनिया की कंपनी भारत में सस्ता श्रम और दूसरी चीजें हासिल कर रही हैं और अपना उत्पाद असेंबल करके दुनिया में बेच रही हैं। भारत के पास न तो अपनी तकनीक है और न अपना कोई उत्पाद है। तभी इस बात की आशंका है कि दुनिया के देशों के साथ मुक्त व्यापार की संधि होने के बाद भारत का व्यापार घाटा कहीं और न बढ़ जाए। अभी अकेले चीन के साथ एक सौ अरब डॉलर यानी करीब नौ लाख करोड़ रुपए का व्यापार घाटा है।

दुनिया के चुनिंदा देशों के साथ ही भारत व्यापार में मुनाफा कमाता है। अमेरिका उनमें से एक है। अगर भारत अपने यहां विनिर्माण सेक्टर को मजबूत नहीं करेगा, उत्पादन नहीं शुरू करेगा, शोध व विकास पर खर्च करके नई चीजें बनाना नहीं शुरू करेगा तो क्या बेचेगा? दुनिया के देशों के पास तो बेचने के लिए बहुत सारी चीजें हैं। भारत तो दूसरे देशों से खरीद कर बेचने वाला देश बन गया है। यहां बनना कैसे शुरू होगा? पहले जो लघु व कुटीर उद्योग भारत में चलते थे उनमें से ज्यादातर बंद हो गए। छोटी छोटी फैक्टरी चलाने वाले सारे लोग व्यापारी बन गए। वे चीन या दूसरे देशों में जाकर सामान लाते हैं और भारत में बेचते हैं।

जब तक निर्माण का काम शुरू नहीं होगा, तब तक व्यापार संधियों का बहुत लाभ भारत को नहीं मिलेगा। इसके लिए भारत को पहले अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर होना होगा। जैसे हरित क्रांति से अनाज के मामले में और श्वेत क्रांति से दूध के मामले में भारत आत्मनिर्भर हुआ वैसे ही किसी क्रांति के जरिए चीन के ऊपर से निर्भरता हटानी होगी और तब दुनिया को निर्यात करने के बारे में सोचना होगा।

Tags :

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

five × 1 =