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तुर्किए का मॉडल, भारत सीखे

भारत के सामने एक मॉडल तुर्किए का है, जिसने न सिर्फ अपने को अपनी हथियार जरुरतों में आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि दुनिया के अनेक देशों को ड्रोन सहित अपने हथियार बेच रहा है। उसने पिछले 40 साल में इतने सुनियोजित तरीके से यह काम किया है कि भारत को उससे सीखना चाहिए। भारत ने भी देखा कि कैसे ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्किए से मिले ड्रोन से पाकिस्तान लड़ रहा था। अब भी उसी के ड्रोन गाहे बगाहे पाकिस्तान सीमा पर दिखते हैं। उसने सातवें दशक में साइप्रस संकट के समय अमेरिका और यूरोप ने उसको हथियार देने पर पाबंदी लगा दी थी। उसके बाद ही उसने अपने को आत्मनिर्भर बनाने का फैसला किया और 1985 में प्रेसिडेंसी ऑफ डिफेंस इंडस्ट्रीज के नाम से एक केंद्रीय संस्था बनाई। उसके बाद पिछले चार दशक में तुर्किए ने अलग ही पहचान बना ली है। भारत भी इस मॉडल पर काम कर सकता है।

इस मॉडल की कुछ खास बातें हैं। जैसे तुर्किए ने दूसरे देशों के साथ जो भी हथियार सौदा किया उसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की अनिवार्य शर्त रखी। उसने अमेरिका, जर्मनी, इटली आदि से हथियारों का सौदा किया तो उसके लोकल प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की शर्त रखी। उसने स्थानीय इंजीनियरों द्वारा उत्पादन की भी शर्त रखी। सोर्स कोड और डिजाइन पर अधिकार किया और लडाकू विमान से लेकर हेलीकॉप्टर और गाइडेड मिसाइल जैसी कई चीजों के उत्पादन का लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद उसने ड्रोन क्रांति की, जिसमें निजी कंपनियों को शामिल किया। रक्षा उत्पादन में भी तुर्किए ने पब्लिक और प्राइवेट पार्टनरशिप में काम किया। लेकिन ड्रोन का पूरा क्षेत्र निजी कंपनियों को दिया और यह सुनिश्चित किया कि वे उत्पादन करें, बिकवाने की गारंटी उसकी होगी। यानी तुर्किए उनके लिए बाजार और ग्राहक जुटाएगा। आज स्थिति यह है कि अपनी रक्षा जरुरतों के मामले में तुर्किए 80 फीसदी आत्मनिर्भर है। इतना ही नहीं तुर्किए आज 180 देशों को अपने हथियार बेचता है। पूरा अफ्रीका उसका बाजार है। वह मध्य एशिया, खाड़ी देशों के साथ साथ यूरोप को भी हथियार बेचता है। उसने देश के कई हिस्सों में डिफेंस प्रोडक्शन के कलस्टर बनाए हैं, जहां उत्पादन होता है।

भारत अगर आज इस मॉडल पर चलना शुरू होता है तो अब तकनीक और उत्पादन की रफ्तार दोनों इतनी तेज हो गई है कि उसे तुर्किए की तरह 40 साल नहीं इंतजार करना होगा। वह सिर्फ 10 साल में अपनी जरुरतों के लिए आत्मनिर्भर हो जाएगा और दुनिया के रक्षा से जुड़े उत्पाद बेचने लगेगा। भारत के पास पहले से डीआरडीओ और अन्य पीएसयू हैं, जो रक्षा उपकरण बना रहे हैं। भारत जो व्यापारिक संधियां कर रहा है उसमें प्रौद्योगिक हस्तांतरण, लाइसेंस्ड प्रोडक्शन, लोकल इंजीनियर और लोकल प्रोडक्शन, सोर्स कोड व डिजाइन पर कंट्रोल आदि की शर्तें रखवाता है और निजी व सरकारी कंपनियों को इस काम में शामिल करता है तो बहुत जल्दी भारत में भी एक बड़ा मिलिट्री डिफेंस कॉम्प्लेक्स विकसित हो सकता है। इसके अलावा भारत के पास इसरो के रूप में एक ऐसी संस्था है, जिसने पहले से पूरी दुनिया में अपना बाजार बनाया है। उसको राजनीति में घसीटने की बजाय उसे और मजबूत बनाया जाए तो वहां से दुनिया भर के सेटेलाइट लॉन्च होंगे, जिनसे भारत को आय होगी।

भारत की बड़ी समस्या यह है कि यहां के अरबपति, खरबपति सब यही के 140 करोड़ लोगों की जेब से पैसे निकालने और सरकारी व प्राकृतिक संपदा का दोहन करके अपना खजाना भरने में लगे हैं। वे शोध व विकास यानी आरएंडडी पर धेला खर्च नहीं करते हैं। वे कोई जोखिम नहीं लेते हैं। उनकी सारी कमाई दुनिया की बड़ी कंपनियों का माल बेच कर है या सरकारी ठेके हासिल करने से है। सरकार खुद भी आरएंडडी पर बहुत कम खर्च करती है। सरकार रिसर्च पर अपना खर्च बढ़ाए, शिक्षण संस्थाओं को बेहतर करे और निजी सेक्टर को निवेश करने के लिए प्रेरित करे तब भी भारत की निर्भरता दूसरे देशों पर कम होगी और उसके बाद भारत अपना सामान बाहर बेचने लायक बनेगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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