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नितिन की नियति है ‘मोशा’ का ठप्पा-धारक होना

मुझे लगता है कि नितिन के अध्यक्षीय कार्यकाल की कामयाबी मूलतः इस पर निर्भर करेगी कि यह सब करते हुए वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अपने संबंधों को कितना मजबूत बना कर रख पाते हैं। तोते के असली प्राण रायसीना पर्वत की मीनार में नहीं, अंततः नागपुर के गुंबद में बंद रहेंगे।

45 साल के नितिन नवीन 75 साल के नरेंद्र भाई मोदी के बॉस बन गए। बारहवीं तक की शिक्षा प्राप्त नितिन, समग्र राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की तालीम हासिल कर चुके, नरेंद्र भाई के बॉस बन गए। 20 बरस से राजनीति की दुनिया में विचर रहे नितिन, 40 बरस से सियासी संसार के तहखानों की सैर कर रहे और 26 साल से शासन प्रमुख का सिंहासन संभालने का खांटी तजु़र्बा रखने वाले, नरेंद्र भाई के बॉस बन गए। नीति-स्वामी यानी नितिन, मनुष्यों के राजा यानी नरेंद्र के, बॉस बन गए। अगर सरकार संगठन की होती है तो नितिन सचमुच नरेंद्र भाई के सांगठनिक बॉस बन गए हैं और अगर संगठन सरकार का होता है तो वे महज़ ‘मोशा’ के ठप्पा-धारक हैं।

कहने में यह अच्छा लगता है कि प्रधानमंत्री होते हुए भी नरेंद्र भाई खुद को नितिन का कार्यकर्ता बताएं। सुनने में भी कानों को नरेंद्र भाई की यह विनम्रता सुहाती है कि वे नितिन से कहें कि ‘तुम दीपक, हम बाती’। सो, जब भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में नरेंद्र भाई के मुखारविंद से इन उद्गारों की फुहार बरसी तो मौजूद लोगों ने थिरक-थिरक कर तालियां-थालियां बजाईं। लेकिन सुनने-सुनाने से ज़रा-सा भी अप्रभावित रह कर समझने वाले सब समझते हैं। देशवासी जानते हैं कि सब बातें हैं, बातों का क्या?

नितिन सेवक थे, सेवक हैं और सेवक ही रहेंगे। यही उन की नियति है। उन का जन्म ही सेवक योनि में हुआ है। अगर ऐसा न होता तो आज वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन ही नहीं पाते। वे जानते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी भी एक समय नरेंद्र भाई के बॉस थे और फिर अपने इस शिल्पकार का नरेंद्र भाई ने क्या हाल किया? अटल बिहारी वाजपेयी भी नरेंद्र भाई के बॉस थे और राजधर्म का पालन करने के उन के मशवरे को कैसे नरेंद्र भाई ने ठेंगा दिखाया था? मुरली मनोहर जोशी भी नरेंद्र भाई के बॉस थे और कैसे उन्हें मुमुक्षु-मंडल के हवाले किया गया? जगत प्रकाश नड्डा भी नरेंद्र भाई के बॉस थे और उन की बॉसगिरी कितनी चलती थी, छह साल में किस ने नहीं देखा है? सो, नितिन अच्छी तरह जानते हैं कि वे तभी तक बॉस हैं, जब तक नरेंद्र भाई और अमित भाई शाह को ‘यस बॉस-यस बॉस’ कहते रहेंगे।

भाजपा के नए अध्यक्ष की चुनाव-लीला का मंचन देख कर भी जिन की समझ में यह नहीं आ रहा है कि अपने आंतरिक लोकतंत्र पर नाज़ करने का कितना हक़ संसार के इस सब से बड़े राजनीतिक दल को है, वे अपनी ओढ़ी हुई मासूमियत का ज़श्न मनाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के बीच की खींचतान के चलते जगत प्रकाश नड्डा की जगह नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई। नड्डा का कार्यकाल 20 जनवरी 2023 को ख़त्म हो गया था। मगर ऐलान कर दिया गया कि 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए उन्हें एक कार्यकाल और दिया जा रहा है।

नए अध्यक्ष के नाम पर संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के बीच टप्पेबाज़ी का तनाव कई बार चरम तक पहुंचा। दोनों के बीच भाजपा-अध्यक्ष को ले कर किसी एक नाम पर सहमति तो आख़ीर तक नहीं बन पाई, लेकिन ‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय’ का आवरण पहना कर नितिन नवीन को पहले तो कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया गया और फिर 37 वें दिन उन के अध्यक्ष पद पर ‘चुनाव’ का कर्मकांड संपन्न हो गया। इन 37 दिनों में कम-से-कम दो बार संघ-प्रमुख ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भाजपा के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। भाजपा जो कहती-करती है, उस से संघ के बारे में कोई धारणा बनाना ठीक नहीं है।

इसलिए मुझे लगता है कि खटास के जिस गर्भ से नितिन का सी-सेक्शन जन्म हुआ है, वह उन की राह को गुदगुदा नहीं बने रहने देगा। इस बरस होने वाले पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनाव उन का सूचकांक तय करेंगे। तमिलनाडु और केरल में भाजपा के पास पाने-खोने को कुछ नहीं है और पुदुचेरी के ऊंट की करवट आमतौर पर अन्यान्य कारणों से तय होती रहती है, लेकिन असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा की साख सब से बड़े दांव पर लगी है। असम में इसलिए कि वहां की भाजपा सरकार इस बार बहुत डांवाडोल हालत में है और बंगाल में इसलिए कि वहां भाजपा ने अपनी मूंछ पर इतना ताव दे रखा है कि अगर वह सौ सीटों का आंकड़ा पार नहीं करेगी तो उस की बहुत भद्द पिट जाएगी।

बंगाल में भाजपा की अभी 65 सीटें हैं और ममता बनर्जी के 223 विधायक हैं। सरकार बनाने के लिए 148 विधायकों की ज़रूरत होती है। इस लिहाज़ से भाजपा को सत्तासीन होने के लिए 83 और सीटों की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच 59 लाख वोट का फ़र्क़ था और मतदाता सूचियों के गहन परीक्षण के बहाने हर तरह की चालें चलने की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन तब भी 83 अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की जीत की संभावनाएं नामुमक़िन-सी हैं।

असम हिमंता बिस्वा सर्मा की उछलकूद से गहरी उकताहट महसूस कर रहा है। अकेली भाजपा के पास वहां सरकार बनाने लायक बहुमत से सिर्फ़ तीन ही विधायक ज़्यादा हैं। भाजपा के भीतर भी इस बात को ले कर ऊहापोह है कि इस बार एनडीए के अपने बाकी सहयोगी दलों के साथ हिमंता 64 के आंकड़े तक पहुंच पाएंगे या नहीं? ठीक है कि नरेंद्र भाई अपनी वक्तृत्व-कला और अमित भाई अपनी करतब-कला का सब से बेहतरीन प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे, मगर अगर इस के बावजूद असम और बंगाल में भाजपा का मनोकामनाएं पूरी नहीं हुईं तो उस के काले साए का रुख तो भाजपा के नए अध्यक्ष की तरफ़ भी मोड़ा जाएगा।

केरल में तो भाजपा नदारद ही है। उस का वहां एक भी विधायक नहीं है। हालांकि तिरुअनंतपुरम की महानगरपरिषद के नतीजों ने उसे उत्साहित किया है, लेकिन इस से विधानसभा चुनाव के नतीजों की ज़मीनी हालत में कोई आमूलचूल बदलाव तो आने से रहा। वहां इस बार कांग्रेस के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की बढ़त अभी से दिखाई दे रही है। तमिल समागम के होहल्लों के बावजूद तमिलनाडु में भी भाजपा के आसार कोई बहुत उजले नहीं हैं। वहां भाजपा के चार विधायक हैं ज़रूर, मगर उन की जीत की परिस्थितियां अलग थीं। पिछले चुनाव में भाजपा को पूरे प्रदेश में महज़ ढाई प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस ने अगर द्रमुक के साथ संबंधों का प्रवाह बनाए रखा तो भाजपा को पिछली बार मिले 12 लाख वोट हासिल करने में भी मुश्क़िल होगी।

सो, नितिन नवीन की ताजपोशी सिर पर ओले पड़ने के माहौल में हुई है। उन के राज्याभिषेक समारोह के उद्बोधन में नरेंद्र भाई ने कहा कि भाजपा को मज़बूती से आगे बढ़ाने के साथ ही उन पर सब से बड़ी ज़िम्मेदारी यह भी है कि वे एनडीए के अपने सहयोगी दलों के साथ तालमेल की मजबूती को बनाए रखें। मगर मुझे लगता है कि नितिन के अध्यक्षीय कार्यकाल की कामयाबी मूलतः इस पर निर्भर करेगी कि यह सब करते हुए वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अपने संबंधों को कितना मजबूत बना कर रख पाते हैं। तोते के असली प्राण रायसीना पर्वत की मीनार में नहीं, अंततः नागपुर के गुंबद में बंद रहेंगे।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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