राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

एसआईआर में गलती तो चुनाव कैसे सही?

अब साफ है कि मुख्य चुनाव आयुत ज्ञानेश कुमार के कार्यालय से सब कुछ संचालित हो रहा था। पूरे देश के मतदाताओं की कुंजी दिल्ली में उनके कार्यालय में थी। सब कुछ इतना सेंट्रलाइज्ड था कि बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को भी भनक नहीं थी। ऐसा लग रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यालय चुनिंदा लोगों के नाम काटने के लिए कृत संकल्प था। तभी दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर हैरानी जताई है कि पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों से मंजूरी के बाद जो नाम जोड़े गए उनके खिलाफ अपील का फैसला किसने किया? ऐसे अनेक सवाल ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट से उठे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एसआईआर में गड़बडी है तो फिर चुनाव कैसे सही होंगे? इस सवाल की गंभीरता को दिल्ली विधानसभा के चुनाव और उसके बाद एसआईआर में कटे नामों के आंकड़ों से समझा जा सकता है। पिछले दिनों चुनाव आयोग ने दिल्ली में एसआईआऱ के बाद मसौदा मतदाता सूची जारी की है। इसमें 47 लाख से कुछ ज्यादा नाम काट दिए गए हैं। एसआईआर से पहले दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाता थे और मसौदा सूची में 97 लाख मतदाता रह गए हैं। हालांकि इनमें से भी लाखों लोगों को नाम की स्पेलिंग, उम्र आदि के आधार पर नोटिस भेजा गया है। लेकिन नोटिस छोड़ दें तब भी दिल्ली में एक तिहाई मतदाताओं के नाम कट गए हैं।

अब दिल्ली में पिछले साल जनवरी में हुए चुनाव का आंकड़ा देखें। दिल्ली में एक करोड़ 45 लाख मतदाता थे, जिनमें से करीब 61 फीसदी ने मतदान किया। यानी 90 लाख के करीब लोगों ने वोट डाला। इसमें से 44 लाख वोट भाजपा को और 41 लाख वोट आम आदमी पार्टी को मिला। बाकी अन्य को मिले। अगर चुनाव आयोग की एसआईआर सही है और 47 लाख मतदाता मृत हैं, फर्जी हैं, स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए हैं तो इसका अर्थ है कि पिछले चुनाव के समय कुल 97 लाख के करीब ही असली मतदाता थे, और उनमें से 90 लाख ने वोट डाल दिया! यानी दिल्ली में 90 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था! सबको पता है कि दिल्ली में असली मतदान 50 से 60 फीसदी के करीब होता है। तभी या तो पिछली बार हुए मतदान का आंकड़ा गलत है या अभी हुए एसआईआर में इतने लोगों के नाम काटना गलत है। दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते।

एसआईआर की दूसरी गड़बड़ी यह है कि जो नाम काटे जा रहे हैं उनमें सबसे ज्यादा नाम स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए लोगों की श्रेणी में कट रहे हैं। दिल्ली में इस श्रेणी में 43 लाख से ज्यादा नाम कटे हैं। बिहार में पिछले साल जून में 63 लाख लोगों के नाम कटे थे उसमें भी सबसे ज्यादा 36 लाख वोट शिफ्ट कर लोगों के ही कटे थे। बिहार से जब 36 लाख लोगों के शिफ्ट होने का आंकड़ा आय़ा तो लगा कि बिहार से लोग दिल्ली गए होंगे या एनसीआर में होंगे या कोलकाता, मुंबई आदि गए होंगे। लेकिन बिहार के बाद जब इन जगहों पर एसआईआर का आंकड़ा आया तो पता चला कि वहां से भी बड़ी संख्या में लोग शिफ्ट हुए हैं। अब सवाल है कि इतनी बड़ी संख्या में शिफ्ट होकर लोग कहां जा रहे हैं? बिहार या दूसरे पिछड़े इलाकों से शिफ्ट करके तो लोग बड़े शहरों और महानगरों में जा सकते हैं लेकिन महानगरों से शिफ्ट होकर लोग कहां जा रहे हैं? अगर वे उसी महानगर में एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं तो उनका नाम क्यों कट रहा है? उनका नाम दूसरी जगह मतदाता सूची में आना चाहिए। इन गड़बड़ियों पर पहले संदेह होता था लेकिन अब उनकी पुष्टि हो गई है।

जाहिर है कि ‘एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट’ यानी ‘एएसडीडी’ श्रेणी में जो नाम कट रहे हैं वह आंकड़ा भी भरोसे के लायक नहीं है। उसमें भी मनमाने तरीके से नाम काटे गए हैं। बिहार के तो कई लोगों को पार्टियों ने मीडिया के सामने भी पेश किया, जिनको मृत बता कर नाम काट दिया गया था। दिल्ली का आंकड़ा इस मामले में आंख खोलने वाला है। यह किसी भी पैमाने पर संभव ही नहीं है कि दिल्ली में 90 फीसदी या उससे ज्यादा मतदान हो जाए, जबकि चुनाव आयोग 47 लाख लोगों का नाम काट कर कह रहा है कि दिल्ली में 97 लाख ही असली मतदाता हैं और चुनाव आयोग ही कह रहा है कि पिछले साल जनवरी में करीब 90 लाख ने वोट डाला है। इसको कैसे जस्टिफाई किया जाएगा? ऊपर बताई गई चार श्रेणियों में चुनाव आयोग ने 13 करोड़ नाम काटे हैं। दिल्ली का आंकड़ा दिखाता है कि इसमें जेनुइन मतदाता हो सकते हैं और इसका असर निश्चित रूप से चुनाव नतीजों पर पड़ा होगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment