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गपशप

राजनीति क्या सधेगी?

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याद करें लोकसभा के पिछले चुनाव को। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तब56 इंच का सीना ठोक कर चुनाव लड़ा था। पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादी हमला हुआ था और भारतीय सेना ने बालाकोट में स्ट्राइक किया था। मतलब चुनाव से ठीक पहले एक के बाद एक कई घटनाएं हुई। उरी में सर्जिकल स्ट्राइक और कैप्टेन अभिनंदन वर्धमान की रिहाई जैसी घटनाओं ने हिंदू जनमानस में मोदी को हीरो बनाया। लेकिन इस बार मोदी के 56 इंची सीने पर का जिक्र नहीं सुनाई दे रहा है। असल में लद्दाख में चीन की घुसपैठ और जून 2020 में गलवान में भारतीय जवानों की शहादत के बाद से ही 56 इंच सीने का नैरेटिव कमजोर पड़ा है। उसे छोड़ ही दिया गया। अब गाहेबगाहे कोई अनजान नेता ही इसका जिक्र करता है। तभी इस बार मोदी भगवा पर वोट लेने की तैयारी में हैं।

वे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बहाने पूरे देश को राममय, भगवामय किए हुए है। राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर गांवों में घरों पर, दुकानों पर, गाड़ियों पर भगवा झंडा लगाया गया है। याद करे आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर 2022 में जिस तरह घरों पर तिरंगा लगाने और सेल्फी अपलोड करने का अभियान था उस तरह इस समय भगवा का है। हालांकि प्राण प्रतिष्ठा के चार दिन बाद ही गणतंत्र दिवस भी है लेकिन तिरंगे की चर्चा नहीं है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर देश के हिंदुओं को बताया है कि 22 जनवरी को उन्हें क्या क्या करना चाहिए। मंदिरों की सफाई से लेकर, घरों को दीये से सजाने और श्रीराम का झंडा लगाने की अपील की गई है। हिंदू घरों में अक्षत बांटे जा रहे हैं, रामंदिर का मॉडल सजाया जा रहा है और आतिशबाजी की तैयारी हो रही है। पूरे देश में शीतलहर चल रही है लेकिन सोशल मीडिया में अभियान चला है कि डोलो लेकर नहाएंगे लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के दिन जरूर नहाएंगे, पूजा करेंगे और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा देखेंगे। राज्यों में छुट्टी घोषित करने की होड़ मची है। केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए आधे दिन की छुट्टी का ऐलान किया है।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा से पहले खुद मोदी देश का चक्कर लगा रहे हैं और रामकथा से जुड़े तमाम जगहों पर जाकर पूजा कर रहे हैं। वे रामकथा के चरित्रों से जुड़ी जगहों पर भी जा रहे हैं और दक्षिण से पश्चिम तक रामलहर पहुंचाने के अभियान में जुटे हैं। इस साल के अभी 19 दिन बीते हैं और प्रधानमंत्री के तीसरे दक्षिण दौरे की तैयारी हो गई है। वे अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा से पहले दो दिन की तमिलनाडु यात्रा पर जा रहे हैं। वे 20 और 21 जनवरी को तमिलनाडु में रहेंगे। प्रधानमंत्री तिरूचिरापल्ली के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में पूजा अर्चना करेंगे। इसके बाद वे धनुषकोडी में श्रीअरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर सहित दो मंदिरों में जाएंगे। सोचें, प्रधानमंत्री कब दक्षिण भारत में इस तरह मंदिर मंदिर पूजा अर्चना करने जाते थे? कहने की जरुरत नहीं है कि हर जगह वे दक्षिण के पारंपरिक पहनावे में होंगे, माथे पर तिलक लगा होगा, हाथों में पूजा सामग्री होगी और चेहरे पर भक्ति का भाव होगा। प्रधानमंत्री एक तीर से दो शिकार कर रहे हैं। एक तरफ उत्तर भारत में चल रही रामलहर को दक्षिण ले जाने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर डीएमके नेताओं की ओर से सनातन पर दिए गए बयानों के बरक्स भाजपा का सनातन बचाओ नैरेटिव स्थापित कर रहे हैं।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा से पहले प्रधानमंत्री रामकथा से स्थानों की यात्रा से वे भगवान राम और हिंदू धर्म के प्रति अपनी आस्था और प्रतिबद्धता का संदेश भी बनवा रहे हैं। तभी पिछले 10 दिन में प्रधानमंत्री ने कई राममंदिरों की यात्रा की है। वे महाराष्ट्र में नासिक के कालाराम मंदिर में गए, जहां के बारे में कहा जाता है कि वनवास के समय भगवान राम उस जगह पर रूके थे। मोदी ने वहां मंदिर में झाड़ू लगाई, पूजा पाठ किया और झाल-मंजीरा बजाया। इसी तरह वे आंध्र प्रदेश के वीरभद्र मंदिर में गए और वहां भी रामभक्त के स्वरूप वाली उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया में खूब वायरल हुईं। करीब पांच सौ साल पुराने वीरभद्र मंदिर के बारे में मान्यता है कि सीता को बचाने के लिए रावण से लड़ते हुए जटायु वहीं पर घायल होकर गिरे थे और वहीं पर भगवान राम ने जटायु को मोक्ष दिलाया था। इसके बाद प्रधानमंत्री इस साल केरल के दूसरे दौरे पर पहुंचे तो करूवन्नूर नदी के तट पर भगवान राम को समर्पित त्रिप्रयार श्रीरामास्वामी मंदिर में पूजा अर्चना की।

प्रधानमंत्री मोदी भले श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्रधान यजमान के तौर पर पूजा नहीं कर रहे हैं लेकिन सारे काम उनके नाम से संपन्न हो रहे हैं। उन्होंने 11 दिन का विशेष अनुष्ठान शुरू किया है। बताया जा रहा है कि वे एक तरह की तपस्या कर रहे हैं। कई जगहों खबरों में यहां तक बताया जा रहा है कि वे उपवास कर रहे हैं और जमीन पर सो रहे हैं। इस तरह के अनुष्ठान और मंदिर दौरे से भाजपा जो नैरेटिव बना रही है उसके जरिए वह पूरे देश में हिंदू पुनरूत्थान या हिंदू पुनर्जागरण के विचार को स्थापित करना चाह रही है। गांव गांव में यह प्रचार हो रहा है कि अयोध्या में पांच सौ साल बाद रामलला का भव्य मंदिर बन रहा है तो वह सिर्फ नरेंद्र मोदी के कारण संभव हो पाया है। यह भी कहा जा रहा है कि सड़कों, पुल और नाले-नालियां तो बनती रहती हैं लेकिन जो अयोध्या में हो रहा है वह कोई और नहीं कर सकता था। वह सिर्फ मोदी के कारण मुमकिन हुआ है। भाजपा और केंद्र व राज्यों की भाजपा सरकारों के साथ साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद भी सारे वह काम कर रहे हैं, जिससे मंदिर का श्रेय नरेंद्र मोदी को मिले और वे कलियुग के सबसे बड़े रामभक्त साबित हों।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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