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शहर आबाद नहीं हुए, गांव लापता हो गए

देश में सबसे कम शहरीकरण वाला राज्य हिमाचल प्रदेश है और उसके बाद बिहार का नंबर आता है। इसके बाद असम, ओडिशा आदि राज्य आते हैं। इन राज्यों में शहरीकरण नहीं हुआ है लेकिन गांव लापता हो गए हैं। सवाल है कि कहां चले गए हैं गांव के लोग? वह भी इस समय जब खेती किसानी का समय है? पिछले दिनों एक रील सोशल मीडिया में वायरल हुई, जिसमें पंजाब में धान की रोपनी कर रहे बिहार के किसान अपनी पीड़ा बता रहे थे। वे बिहार के नौजवानों से कह रहे थे कि पंजाब में उनका जीवन कितना मुश्किल है। वे अपील भी कर रहे थे कि अगर पढ़ सकते हो तो पढ़ो और कुछ करो। इस रील में सवाल है कि जवाब है। देश के तमाम पिछड़े इलाकों, जिनमें बिहार, झारखंड, ओडिशा, बंगाल का नाम खास तौर पर लिया जा सकता है, से गांव उठ कर दिल्ली, पंजाब, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, वडोदरा, बेंगलुरू और हैदराबाद चले गए हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है कि गांव लापता हुए हैं और वहां के लोग देश के बड़े शहरों में चले गए हैं। गांवों से निकल कर ज्यादातर लोग अपने आसपास के शहरों मे गए हैं। अच्छे जीवन की तलाश में, बच्चों की अच्छी शिक्षा व बुजुर्गों के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधा की तलाश में, शहर में मिलने वाली सुविधाओं की मृग मरीचिका में लोग गांव से निकल कर शहर में आ गए हैं या शहर के नजदीक आ गए हैं। ‘राग दरबारी’ में पहले ही पन्ने पर श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है कि ‘शहर का वह छोर, जहां से देहात का महासागर शुरू होता है’। लेकिन अब शहर की सीमा के बाद देहात का महासागर नहीं दिखता है, बल्कि बेहद बदरंग रूप में शहर ही देहात तक पहुंच गया है या शहर ही देहात बन गया है।

लोग गांवों से निकल कर शहरों की ओर भागे तो शहर का भौगोलिक विस्तार तेजी से हुआ। शहर का विकास नहीं हुआ, सुविधाएं नहीं बढ़ीं सिर्फ भौगोलिक विस्तार हुआ। जैसे दिल्ली में भीड़ बढ़ती गई तो एनसीआर का दायरा बढ़ता गया वैसे ही बिहार के किसी शहर का विस्तार हुआ तो नगर निगम या नगरपालिका की सीमा बढ़ती गई। लोग इस बात से खुश हुए कि उनका गांव, टोला या मोहल्ल नगरपालिका की सीमा में आ गया। लेकिन नगरपालिका ने वैसी सुविधाएं भी विकसित नहीं की, जैसी पंचायत में उनको मिलती थी। राष्ट्रपति रहते एपीजे अब्दुल कलाम ने पुरा (पीयूआरए) यानी प्रोविजन ऑफ अर्बन एमेनिटीज टू रूरल एरियाज का जिक्र किया था, जिसे 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने शुरू किया था। इसके तहत ग्रामीण इलाकों में शहरी सुविधाएं यानी सीवेज, पीने के पानी, अच्छी सड़क आदि की सुविधा देनी थी। दुर्भाग्य से उसके 23 साल बाद गांव उजाड़ पड़े हैं और शहरों में भी ये सुविधाएं पूरी तरह से नहीं मिल रही हैं।

गांव के लोग जिन चीजों की तलाश में शहर आए थे वो उनको मिली नहीं और वे गांव से उजड़ गए। शहरों में अच्छी शिक्षा के नाम पर कचरा ज्ञान फैलाने वाले निजी स्कूल और कोचिंग हैं। सरकारी स्कूलों की हालत बदतर है। सरकारी अस्पताल दिन ब दिन खराब हुए हैं तो निजी अस्पताल इतने महंगे हैं कि लोग उसे अफोर्ड नहीं कर सकते हैं। नौकरी और रोजगार की संभावना नगण्य है। लेकिन अब वापस गांव लौटना शर्म की बात मानी जाएगी। इसलिए संघर्ष कर रहे हैं। उधर गांवों में छोटी जोत वाले किसान भी खेत मजदूरों की तलाश में भटक रहे हैं। उनके घर के नौजवान भी अच्छे जीवन की उम्मीद लिए गांव से निकल गए हैं। वे भी कहीं किसी शहर या महानगर में भटक रहे हैं। थोड़े समय पहले तक गांवों में जहां चौपाल पर, मंदिर या मस्जिदों के चबूतरे पर या पेड़ की छांव में लोग बैठे दिखते थे वहां अब सन्नाटा है। सड़क पर कुछ महिलाएं तो दिखती हैं लेकिन कामकाजी उम्र के लोग लापता हैं।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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