राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

सत्तर साल जिया, मगर जाना क्या?

अपनी सत्तर वर्ष की उम्र में बुजुर्गों के जिए हुए जीवन और उनकी स्मृतियों में मैंने अपना बचपन तलाशा तो अपने ही समय को लेकर कई सवाल उठे। पचास वर्षों की पत्रकारिता में जिस भारत को देखा, जाना, समझा और लिखा, क्या वह इन लोगों के जिए हुए भारत से अलग था? या एक ही देश और समय को हम अपनी-अपनी दुनिया से अलग-अलग देखते रहे? लंबा जीना और जीवन को बड़ा जीना क्या एक ही बात है? और अब, जब मशीनें भी सोचने-लिखने लगी हैं, तब अपने जिए हुए जीवन, अपनी स्मृतियों और अनुभवों का अर्थ क्या रह जाता है? आखिर जो मैंने जिया, वह कितना समझा? जो समझा, वह कितना लिखा? और जो अब तक नहीं समझ पाया, उसे लिखने को क्या बचा है?

लिखने का बचा क्या?–1

मैं सत्तर वर्ष का हुआ।

न असाधारण बात है, न साधारण।

बावजूद इसके समय को लेकर मन में विचार खदबदा रहे हैं। क्यों न हों? देखते-देखते हाल के वर्षों में कितने ही हमउम्र और अपने से छोटे परिवारजन, सहपाठी और पत्रकार साथी दिवंगत हो गए। किशन मानसिंहका, जगदीप बैंस, जगदीश जोशी, जगदीप, कृष्ण चोपड़ा, शेख रियाजुद्दीन… छोटे भाई-बहन, बचपन की स्मृतियों में बसे चेहरे…। और संसद भवन के सेंट्रल हॉल में एलएंडडी श्रेणी के कई वरिष्ठ सहपत्रकारों की मृत्यु के समाचार भी मिलते हुए….। किसी के जाने का समाचार अचानक आया, किसी के बारे में पहले से बीमारी की खबर थी। कभी जिन लोगों के साथ मन मिला, काम किया, गपशप की और जिनका होना रोजमर्रा की दुनिया की हलचल थी, वे अब नहीं हैं। इन दिनों भी ‘नया इंडिया’ की रिपोर्टर डायरी के विवेक सक्सेना की सेहत, उसका आईसीयू में जाना-आना व्यथित किए हुए है।

यों जीवन और मृत्यु के बारे में सोचने के लिए सत्तर वर्ष का होना जरूरी नहीं है। लेकिन इस उम्र में किसी के जाने का समाचार केवल उसके न रहने का समाचार नहीं होता। उसमें अपनी उम्र का बोध भी शामिल होता है। एक-एक कर वे लोग जा रहे हैं, जिनके साथ जीवन का कोई समय बीता था। किसी के साथ बचपन, किसी के साथ जवानी, किसी के साथ पत्रकारिता के दशकों का साथ। उनके जाने से केवल उनका साथ नहीं छूटता, अपने बीते हुए समय का भी कुछ हिस्सा मानो छूट जाता है।

शायद इसलिए इस विजयादशमी को, जब मेरे सत्तर वर्ष पूरे हुए, तो मुझे पहली सुध उन लोगों की हुई, जिन्होंने मेरा बचपन देखा, जाना और समझा था। आखिर मैं अपने बचपन को कितना जानता हूं? उसकी कितनी यादें मेरी अपनी हैं और कितना वह समय दूसरों की स्मृतियों में बचा हुआ है? जो मैं नहीं जानता, उस मेरे बचपन को वे जानते हैं। तब क्यों न अपने जन्मस्थान लौटूं? उन लोगों के बीच बैठूं जो मुझसे उम्र में बड़े हैं, जिन्होंने मेरे माता-पिता को जाना, घर-परिवार को देखा और उस समय को जिया, जिसमें मेरा जन्म हुआ था।

पर अब ऐसे लोग कितने बचे होंगे? और जो बचे हैं, उनकी स्मृतियों में क्या-क्या बचा होगा? क्या उन्हें वे बातें याद होंगी, जिनका मुझे कोई भान नहीं? क्या उनके बताए किस्सों में मुझे अपना ही कोई अनजाना चेहरा दिखाई देगा?

मन में यह भी सवाल है कि जिन लोगों ने अस्सी, नब्बे या उससे अधिक वर्ष जिए हैं, उन्होंने जीवन को कैसे जाना? क्या लंबा जीना और जीवन को भरपूर जीना एक ही बात है? क्या उम्र बढ़ने के साथ बीता हुआ समय अधिक साफ दिखाई देता है या स्मृतियां भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाती हैं?

अजीब है कि एक ओर अपने से छोटे और हमउम्र लोगों के जाने के समाचार हैं, तो दूसरी ओर अपने से बड़े, अभी जीवित लोगों के बीच बैठने की इच्छा! जिनके साथ जीवन का बड़ा हिस्सा बीता, वे जा रहे हैं और जिन्होंने मेरे जीवन की शुरुआत देखी थी, उनसे मिलने का समय भी अब कितना बचा है?

शायद सत्तर वर्ष का होना मेरे लिए फिलहाल यही है। अपने आसपास से विदा होते लोगों की याद और अपने जन्मस्थान में बचे हुए लोगों से मिलने की बेचैनी। आखिर अपने जीवन के बारे में कितना कुछ है जो मुझे स्वयं नहीं मालूम। और फिर जो जानते हैं, वे भी कब तक रहेंगे?

इसीलिए इस विजयादशमी को, अपने जन्मदिन से पहले मन में खयाल आया कि जन्मदिन पर दिल्ली में क्यों रहा जाए? क्यों न उस जगह लौटूं जहां जन्म लिया था? जहां अभी भी 94-95 वर्ष की बुआ हैं। उनसे कुछ कम उम्र की मौसी हैं, मामी हैं और मुझसे पांच, दस, पंद्रह वर्ष बड़े भाईबंद हैं। वे लोग हैं, जिन्होंने मुझे बचपन से देखा, स्कूली दिनों से जाना और समझा। कुछ मेरे अध्यापक भी रहे। किसी ने तब अध्यापक बनने की सलाह दी थी तो किसी ने सेशन कोर्ट में क्लर्क की सरकारी नौकरी का रास्ता सुझाया था। पर तब बच्चे हों या अभिभावक, करियर और भविष्य की चिंता में दिमाग नहीं खपाते थे। बच्चे बचपन जीते थे। और मेरे अनुभव व विचार में जीवन के सबसे मस्त, मजेदार और बेफिक्र दिनों को अपनी पूरी मस्ती में जीते थे!

मैं उम्रदराज भाईबंदों के आगे आज भी छोटा हूं। उम्र में भी और अनुभव में भी। आखिर जीवन के उतार-चढ़ाव, कुनबे और समाज के सुख-दुख, हंसी-गमी तथा बदलते देशकाल को उन्होंने मुझसे अधिक देखा, भोगा और समझा है।

सो, क्यों न उनके बीच कुछ समय गुजारूं? बैठूं, बातें करूं। जानूं कि वे अपने इतने लंबे जीवन को कैसे देखते हैं? क्या याद रह गया है और क्या पीछे छूट गया? कितने कष्ट झेले? अपने ही कुल, वंश की तीन-चार पीढ़ियों में आए परिवर्तनों को वे कैसे देखते हैं? समय का यह सफर उन्हें कैसा लगता है? वे कितना हंसे, कितना मन ही मन रोए? और अब जीवन को लेकर कितना संतोष है या संताप? क्या उम्र बढ़ने के साथ जीवन का अर्थ भी बदलता है या केवल उसे देखने का ढंग बदल जाता है?

दिल्ली में रहते हुए उम्र का बोध कुछ और होता है। अपने काम, अखबार, खबरों और देश-दुनिया की घटनाओं के बीच दिन निकल जाते हैं। वहां उन साथियों की कमी महसूस होती है जो अब नहीं रहे। जन्मस्थान में अपने से बड़े लोगों के बीच शायद उम्र का दूसरा अर्थ है। वहां मैं उन लोगों के बीच होऊंगा, जिन्होंने मुझसे अधिक जीवन देखा है, लेकिन जिनके जीवन का हिसाब मेरे जीवन से निश्चित ही अलग, बिल्कुल अलग होगा।

मूल सवाल है, लंबे समय तक जीना ही क्या बड़ी बात है? या जीवन को बड़ा जीना कुछ और है? यह सवाल मेरे अंतर्मन की उस खदबदाहट से भी जुड़ा है कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत का जन्म एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हुआ, आधुनिकता के राष्ट्र-राज्य के खांचे में, तो उसके साथ हिंदू सभ्यता की चिरंतनता, निरंतरता की दास्तान भी जुड़ी हुई थी। बावजूद इसके आज 145 करोड़ लोगों के सामने यह यक्ष प्रश्न है कि हमारी इस अमिटता में मानव सभ्यता की दृष्टि से बड़ा जीने जैसा क्या है? हजारों वर्षों से बने रहना एक बात है, लेकिन उन हजारों वर्षों में हमने जीवन को कितना बड़ा बनाया?

आखिर बड़ा जीना किसे कहें? यह सवाल व्यक्ति के लिए है, कुनबे के लिए है, तो नस्ल, देश और समूची मानवता के लिए भी है। क्या नहीं? खासकर अब, जब एआई के आने वाले समय में मनुष्य और मानवता के अर्थ ही बदलने की संभावना है?

बहरहाल, फिलहाल खदबदाहट व्यक्तिगत है। सो, व्यक्ति के मायनों में ही लंबे जीने और बड़ा जीने के बीच का फर्क समझने की इच्छा है।

और मैंने सचमुच विजयादशमी के दिन ओमजी, सुरेशजी, केपी, गोपाल, मामीजी और मौसी के जिए हुए जीवन से जो जाना, वह अजीब सा था। अपने सत्तर वर्षों में, खासकर कॉलेज की पढ़ाई के बाद नई दिल्ली के जेएनयू हॉस्टल से शुरू हुए पिछले पचास वर्षों में मैंने जो सोचा, जाना और लिखा, वह सब उनकी बातें सुनकर कुछ बेतुका सा लगा। वे कह रहे थे, ‘हमने समय देखा है, समय को जिया है। इसमें नेहरू हों या कोई दूसरी सरकार, म्हांकी जिंदगी, लोगों की जिंदगी जसी चाल री थी, वसी ही चालती आई है’। पर हां, अब ईर्ष्या है, भूख है, दिखावा है। और घर-परिवारों का ऐसा बिखराव है कि ‘अबाणू सुरेशजी की बहन की मृत्यु हुई तो वाके उठावणे में चार लोग नी आया’। जबकि रायला में ही चालीस लोगों के हजारों में फैले परिवारों में लोगों की कोई कमी नहीं। इतने लोग हैं, इतने रिश्ते हैं, मगर किसी के जाने पर चार लोग भी नहीं जुटते!

और फिर अनुभवों की जुगाली करते उन चेहरों से बदलते समय के वे रंग भी जाने, जो खूब चटकीले हैं, मगर जिनमें इंद्रधनुषी छटा नहीं है। मेरा मानना है कि 1947 से कुछ वर्ष पहले जन्मे ये भाईबंद, रिश्तेदार और स्वतंत्रता के बाद जन्मे मैं तथा मेरे हमउम्र लोग, यानी स्वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी (मैं जिसकी कालावधि अपने पैमाने पर अगस्त 1947 से मई 1964 में नेहरू की मृत्यु तक मानता हूं), शायद एक ऐसे समय के गवाह हैं, जिसमें भारत ने चटकीलापन तो खूब पाया, मगर परिवार, समाज, धर्म, लोकव्यवहार और लोक-संवेदनाओं के इंद्रधनुषी रंग गंवाकर। पर क्या सचमुच ऐसा हुआ है?

और इतनी जल्दी ऐसा निष्कर्ष भला क्यों निकालना!

निश्चित ही बचपन की स्मृतियां सुनते हुए साफ लगा कि जीवन का लोक-अर्थ शायद वह नहीं है, जो बतौर पत्रकार मैंने सरकारों, नेताओं, विचारधाराओं और राजनीतिक परिवर्तनों में खोजा और समझा है। इन दिनों पुस्तक लेखन में भी, मैं जिन विषयों को प्राथमिकता दिए हुए हूं, वे भला इन लोगों की स्मृतियों में कहां हैं? इनके लिए अटपटी सी बात है कि देश, यानी भारत के बीते हुए समय में क्या अच्छा था और क्या बुरा? ऐसा क्या कुछ है जो 1947 से पहले जन्मे बुजुर्गों और स्वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी के जिए हुए जीवन का सारतत्त्व हो? उनके अनुभवों में समय की ऐसी कोई मीमांसा नहीं है, जिसे मैं अपनी पत्रकारिता और लेखन के पचास वर्षों में समझ पाया!

मैंने पत्रकारिता के अपने पूरे पचास वर्षों में भारत को बहुत कवर किया। सरकारें बनते-बिगड़ते देखीं। सत्ता के बदलते चेहरों में अर्थ खोजे। देश की राजनीति, समाज और धर्म के बदलते रंगों पर सोचा, लिखा और कई बार अपने निष्कर्षों में ही खोया रहा। मगर बड़े-बुजुर्गों और पहली पीढ़ी के अनुभवों का हिसाब तो अलग ही है। उनकी स्मृतियों में सरकारों से पहले परिवार था। समाज की सांसें थीं। समय के साथ परिवारों और समाज के बनने-बिखरने की कहानियां थीं। सुख-दुख, रिश्ते-नाते, भूख, अभाव और बदलते व्यवहार, संवेदनाओं तथा मनोभावों की बातें थीं और आज भी वही हैं।

तो क्या मैंने जिस भारत को देखा, जाना और लिखा, वह इनकी देश-अनुभूति, इनकी दीन-दुनिया से अलग था? या दोनों एक ही भारत थे, जिन्हें हम अपनी-अपनी जगह से देखते और समझते रहे? एक और सवाल उठता है। पचास वर्षों तक लिखने के बाद क्या मैं सचमुच अपने समय को समझ पाया हूं? और यदि नहीं, तो अब क्या लिखना चाहिए? या जो लिखा है, वही राग-रोना बहुत है? लिखने में और क्या शेष है? जीवन और उसके समय को दोबारा परखने का भी अब क्या मतलब, जब जीवन, समय, सोचने, लिखने और मनुष्य के ज्ञान-संसार में मशीन का प्रवेश हो चुका है!

मेरे सत्तर के बाद के वर्षों में तो न जाने क्या-क्या होना है! क्या वह समय भी आएगा जब मनुष्य के पास अपनी स्मृति और अनुभव से लिखने को कुछ भी बचेगा नहीं? सब मशीन लिखेगी! मशीन में होगा!

ओमजी, सुरेशजी, केपी, गोपाल, मामीजी, मौसी और बुआ के चेहरों के साथ उनके समवर्ती लोगों की स्मृतियों, बातों और जिए हुए यथार्थ में एक बात तो साझा है। देखते-देखते जमाना बदल गया, मगर जीवन? वह तो मानो ‘राम रचि राखा’ है। और कुल मिलाकर ‘कोऊ नृप होउ हमहिं का हानी’ के मनोविश्व में समय को शब्दों की जुगाली की रामनामी ओढ़े हुए जीते रहना है!

विजयादशमी को ओमजी अधिक व्यथित थे, तो सुरेशजी अत्यधिक गमी और क्षतियों के बावजूद स्थितप्रज्ञ थे। दोनों की बातें सुनकर लगा कि शायद ही कोई मनख (मनुष्य) हो जो अब अपने अर्जित विश्वास में जीता हो। अधिकांश लोगों का, परिवारों और समाज का जीना या तो अंधविश्वासों में है, या असुरक्षाओं, भूख और दिखावे के चक्रव्यूह में उलझकर समय बिताना है।

तभी बातों में पुराना समय आया। “भाया! म्हारा दा सा, थारा दादा सा, मालवा का गांवों में जाण कथा बाँचता था”। ज्ञान नहीं बघारते थे। वे अपना नित्य धर्म निभाते थे। कथा बांचकर अनाज, पैसा लाते थे। और मालवा से लौटकर लाया हुआ पैसा महाजन के यहां रख देते थे। न पैसे के लिए कथा थी, न पैसे की भूख थी। न टोने-टोटके करते थे, न शनि-मंगल के उपाय और न लोगों को ऐसे उपाय सुझाते थे।

अरे, बात तो सही! मैं खुद अपने बचपन के उस मोहल्ले, उस गली, उस कस्बे के समय को याद करने लगा जब चिल्लरों में परिवार चलते थे। बिना शनि-मंगल के उपायों के जीवन था। एक भी शनि मंदिर नहीं था। जबकि सत्तर साल बाद आज दिल्ली की मेरी पॉश वसंत कुंज कॉलोनी में भी शनि मंदिर है और घर-घर नजर न लगने के लिए नजरबट्टू के उपाय हैं!

और इसी बात से मेरे सामने अपने ही परिवार का वह समय खुलने लगा, जिसे मैंने जिया नहीं था। जिसे जानने का कभी खयाल भी नहीं आया था। सत्तर वर्ष की उम्र में अपने बचपन को जानने आया था, मगर बातें उस समय की होने लगी थीं जब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था।

सोचता हूं, पचास वर्षों में देश-दुनिया के कितने लोगों से मिला, कितनी घटनाएं देखीं, कितनी खबरें लिखीं और कितने निष्कर्ष निकाले। मगर अपने ही परिवार, अपने ही कस्बे और अपने जन्म से पहले के समय के बारे में कितना कम जानता हूं! अब सत्तर वर्ष का होकर यह सब जानने की इच्छा हुई है। वह भी तब, जब दुनिया में मशीनें मनुष्य से अधिक जानने, सोचने और लिखने का दावा करती हुई सामने हैं। क्या अजीब समय है! जो मैंने जिया, वह कितना समझा? जो नहीं जिया, उसे कितना जान सकता हूं? और जो समझा, जाना, लिखा, उसमें अब कितना बचा है?

हां, तभी तो लिखने का बचा क्या? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment