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राहुल के बारह साल: बार-बार बदला शब्दकोश

Rahul Gandhi

वामपंथियों की फितूरी राजनीति का प्रमाण 2014 से अब राहुल गांधी और कांग्रेस के स्टैंड हैं। सोचें, राहुल गांधी पिछले बारह वर्षों से क्या कर रहे हैं, क्या कहा है? सबसे पहले उन्होंने आर्थिक गैरबराबरी का चश्मा पहना। भूमि अधिग्रहण, किसान, कॉरपोरेट सत्ता और अंततः “सूट-बूट की सरकार”। मोदी सरकार विरोधी इस पहली राजनीतिक फ्रेम के तुरंत बाद उन्होंने 2016 में रोहित वेमुला और दलित अन्याय पकड़ा। फिर जेएनयू गए। कन्हैया कुमार और सीपीएम के कॉमरेडों के नारों में बहे। उन दिनों उन्होंने सीताराम यचूरी को बॉस भी कहा। मतलब वह दलित-सामाजिक न्याय आग्रह और वामपंथी एंटी-आरएसएस विमर्श का फेज था।

कांग्रेस (राहुल) की दीमक है लेफ्ट4

गौर करें, यहां राहुल गांधी का पहला राजनीतिक फ्रेम अपेक्षाकृत सीधा था- ऊपर अमीर, नीचे गरीब; एक तरफ बड़े कॉरपोरेट, दूसरी तरफ किसान-मजदूर। “सूट-बूट की सरकार” जुमला इसलिए चला क्योंकि उसे समझने के लिए किसी वैचारिक शब्दकोश की जरूरत नहीं थी। गांव का किसान भी समझता था और शहर का बेरोजगार नौजवान भी। मोदी के विकास मॉडल पर यह आर्थिक चोट थी, पहचान की नहीं।

अचानक दिमाग बदला। 2017 में अहमद पटेल के साथ गुजरात में घूमते-घूमते राहुल गांधी सोमनाथ मंदिर में दिखाई दिए। स्वयं को शिवभक्त बताया। सोमनाथ, जनेऊ विवाद, फिर कैलाश मानसरोवर। 2021 में तो उन्होंने जयपुर में कहा- मैं हिंदू हूं, हिंदुत्ववादी नहीं। गांधी बनाम गोडसे, सत्य बनाम सत्ता और हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी का फर्क उनकी राजनीति का संभावित नया रास्ता था।

इसमें पहली बार संभावना थी कि कांग्रेस भाजपा के हिंदुत्व की नकल किए बिना हिंदू से उसकी अपनी भाषा में संवाद बनाए। राहुल कह सकते थे- मेरा हिंदू होना मोदी-योगी के हिंदुत्व से अलग है; मेरा धर्म मुझे निर्भय बनाता है, दूसरे से नफरत करना नहीं सिखाता; राम मेरे लिए मर्यादा हैं, चुनावी हथियार नहीं। यानी गांधी के पुराने सभ्यतागत आत्मविश्वास को इक्कीसवीं सदी की भाषा मिल सकती थी।

लेकिन उस रास्ते राहुल टिके नहीं। भारत जोड़ो यात्रा में भारत जोड़ो का पसीना बहाया। फिर उनके आसपास योगेंद्र यादव, एनजीओ, किसान चेहरों का रेला लगा। कांग्रेस के भीतर के राजू, जयराम रमेश का ज्ञान देना बढ़ गया। कन्हैया कुमार और उनकी कम्युनिस्ट छात्र टोली कांग्रेस में आई। जिग्नेश मेवाणी अंबेडकरवादी-दलित आइडिया अलग पके। जुबान पर नई शब्दावली। मतलब वाम, अंबेडकरवादी, बहुजन, लोहियावादी, अधिकारवादी नागरिक समाज की राहुल गांधी खिचड़ी पकाते हुए थे।

और यहीं राहुल गांधी को समझने का असली सवाल बनता है- राहुल स्वयं बदलते गए या उनके आसपास विचार देने वाला घेरा बदलता गया? क्योंकि केवल दस वर्षों की उनकी शब्दावली सामने रखिए तो मानो अलग-अलग राजनीतिक राहुल दिखाई देते हैं। कभी आर्थिक गैरबराबरी के राहुल। फिर शिवभक्त राहुल। फिर हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी राहुल। और उसके बाद जाति, हिस्सेदारी, प्रतिनिधित्व और संविधान के राहुल।

क्या इनमें कोई एक अंतःसूत्र है? या हर दो-तीन वर्ष में नया सलाहकार घेरा राहुल गांधी को भारत समझने का नया चश्मा देता रहा है?

राहुल गांधी को 2024 के लोकसभा चुनाव में बल मिला। सो, माना कि यह तो पिछड़ों के आरक्षण, भारत सरकार के कितने पिछड़े-दलित जुमलेबाजी के वोट हैं। ध्यान रहे उदयपुर के सामाजिक न्याय विमर्श से रायपुर अधिवेशन तक जाति जनगणना, संगठन में पचास प्रतिशत प्रतिनिधित्व, ओबीसी, दलित और आदिवासी हिस्सेदारी के कांग्रेस ने केंद्र में रखे थे। सितंबर 2023 में राहुल ने “नब्बे सचिवों में केवल तीन ओबीसी” का जुमला बोला। जाति जनगणना को भारत का “एक्स रे” बताया। फिर लोहिया के समय की जितनी आबादी, उतना हक का फार्मूला दोहराया।

सोचें, सन् 2014 से 2024 में मध्य राहुल गांधी की शब्दावली कैसी पलटियां मारती हुई थी।

2015 में उन्होंने अमीर कॉरपोरेट बनाम नीचे के किसान-गरीब की बात की थी। अडानी-अंबानी, क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ खूब बोला। हिसाब से अडानी-अंबानी, “सूट-बूट”, आर्थिक गैरबराबरी का नारा सर्वजनीय नारा था लेकिन आखिर में असमानता, अमीर-गरीब को छोड़, कौन-सी जाति के पास कितना धन, कितनी नौकरियां, कितनी नौकरशाही, कितना मीडिया, कितने कॉरपोरेट पद- की बातें राहुल ने की। 2024 के चुनाव में संविधान की लाल किताब दिखा कर प्रचार किया। आरक्षण, संविधान बदलने का भय, अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति, बेरोजगारी, पेपर लीक और जातिगत गठजोड़ संबंधी जुमले, भाषण।

मतलब दस वर्षों में प्रश्न “भारत में धन किसके पास है?” से बदलकर “किस जाति के पास कितना है?” हो गया। गरीब पहले आर्थिक नागरिक था, फिर सामाजिक पहचान का प्रतिनिधि बना। बेरोजगार नौजवान पहले नौकरी मांगता था; अब राजनीति उससे उसकी जाति भी पूछने लगी। यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी की आर्थिक आलोचना पहचान की राजनीति में घुलती दिखाई देती है।

और 2024 के नतीजों ने इस प्रयोग को बल दिया। संविधान और आरक्षण का भय, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की पीडीए गणित, दलित-पिछड़ा समीकरण, इनसे भाजपा को चोट लगी। मगर चुनावी सफलता से निकला निष्कर्ष क्या था? यह कि मोदी के खिलाफ आर्थिक असंतोष, बेरोजगारी और सत्ता-विरोध को और बड़ा बनाया जाए? या यह कि जाति और हिस्सेदारी की मात्रा और बढ़ाई जाए? राहुल गांधी के आसपास के वैचारिक घेरे ने दूसरी दिशा पकड़ी।

और जंतर मंतर में जनरेशन जेड का स्वंयस्फूर्त जन आंदोलन हुआ तो मोदी सरकार हिली मगर राहुल गांधी ने क्या सीखा? कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एमएल) के छात्र संगठन के चंद एक्टिविस्टों से यह सीखा कि हिंदू धर्म की मनुस्मृति, पितृसत्ता और नारी की हिस्सेदारी, बहुसंख्यकवाद के खिलाफ झंडा उठाओ, इससे आगे मोदी-शाह-संघ-योगी से हिंदू भागेंगे और उत्तर प्रदेश आदि के आगामी विधानसभा चुनावों में पीडीए, माई (मुस्लिम-यादव), चंद्रशेखर के दलित लखनऊ में प्रगतिशील अखिलेश सरकार बना देंगे। और यदि भाजपा उत्तर प्रदेश में हार गई तो 2029 में दिल्ली वापिस धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, प्रगतिशील सरकार का वैसे ही झंडा लहराएगा जैसे संयुक्त मोर्च के देवगौड़ा, आईके गुजराल का लहराया था। डॉ. मनमोहनसिंह, नेहरू, इंदिरा का लहरा था।

पर यहीं इतिहास फिर राहुल गांधी के सामने खड़ा है। क्या मोदी से नाराज हिंदू अपने आप वामपंथी हो जाता है? क्या बेरोजगार नौजवान अपनी नौकरी की चिंता छोड़ कर पहले मनुस्मृति और पितृसत्ता की वैचारिक बहस में वोट खोजेगा? क्या भाजपा से मोहभंग का अर्थ कांग्रेस के नए वैचारिक शब्दकोश की स्वीकृति है? यही वह छलांग है जिसे दिल्ली का प्रगतिशील घेरा आजादी के बाद से ही लगातार लगाता रहा है और बार-बार जमीन को गलत पढ़ता रहा। नतीजा क्या निकला? देश का बहुसंख्यक वोट क्या और कौन सी जुबान बोल रहा है या 2014 से बोलता आ रहा है?

जबकि राहुल गांधी के सामने अवसर असली है। मोदी-संघ-भाजपा के 12 वर्षों के शासन ने अपने खिलाफ असंतोष स्वयं पैदा किया है। लेकिन उस असंतोष को कांग्रेस का वोट बनाने के लिए पहले उस मतदाता को कांग्रेस नहीं समझ रही है। राहुल गांधी और उनके सलाहकार या मंडली यह भी नहीं देख, समझ पा रही है कि मोदी से नाराज होते हुए भी उनका वोट हिंदू है; बेरोजगार होते हुए भी वह   धार्मिक है; जाति रखता है मगर केवल जाति नहीं है; संविधान चाहता है मगर अपनी सभ्यता, धर्म, संस्कृति से शर्मिंदा होना नहीं चाहता।

ऐसे ही नेहरू के आसपास भी उनकी और उनके घेरे की समस्या थी। इसलिए मूल, मोतीलाल नेहरू-गांधी की कांग्रेस के पतन की गाथा है। तभी 1967 में कांग्रेस को चुनाव जीतने के लाले पड़े थे।

वही घेरा इंदिरा के आसपास भी था।

राजीव के आसपास भी।

सोनिया के आसपास भी।

अब राहुल के आसपास तो और भी अधिक है।

नेहरू-गांधी परिवार की पुरानी बीमारी है कि वह बार-बार अपने समाज को सीधे पढ़ने के बजाय विचार देने वालों के चश्मे से पढ़ने लगती है। और चश्मा चाहे कितना बुद्धिमान हो, भारत उससे बड़ा, जटिल और धर्मपरायण, रामायण, हनुमान चालीसा पढ़ने वाला है। कोई वक्त हो ब्राह्मण, पंडित याकि फॉरवर्ड जाति के अलावा दूसरी कोई, किसी की भी सलाह नहीं चल सकती।

भारत का आदमी एक समय में कई चीजें है। वह गरीब है और हिंदू भी। ओबीसी है और बेरोजगार भी। दलित है और धार्मिक भी। महिला है, लेकिन केवल पितृसत्ता की पीड़ित इकाई नहीं। मुसलमान है, लेकिन केवल अल्पसंख्यक नहीं। ब्राह्मण है तो केवल विशेषाधिकार का सांख्यिकीय प्रतिनिधि नहीं। नौजवान जाति भी रखता है, मोबाइल भी, भगवान भी, नौकरी की आकांक्षा भी और सरकार से गुस्सा भी।

यही भारतीय समाज की वह उलझी हुई जीवित वास्तविकता है जिसे कोई एक वैचारिक खांचा पकड़ नहीं सकता।

और यहीं जंतर-मंतर, परीक्षा की ठगी, पेपर लीक, बेरोजगारी, भर्ती में देरी, महंगी शिक्षा और सोशल मीडिया की जनरेशन जेड राजनीति राहुल गांधी की अगली परीक्षा है।

समझना होगा कि यदि नौजवान नौकरी के लिए सड़क पर है तो उस क्षण उसकी पहली राजनीतिक पहचान क्या है?

बेरोजगार या ब्राह्मण?

छात्र या ओबीसी?

नौकरी खोजती लड़की या पहले पितृसत्ता की शिकार?

वह ये सब एक साथ हो सकती है। मगर राजनीति की बुद्धि यह पहचानने में है कि उस क्षण उसकी सबसे जलती हुई चिंता क्या है।

और यहीं बार-बार कांग्रेस लगातार गलती करती रहती है।

फिलहाल बिहार-पूर्वांचल का ब्राह्मण या राजपूत नौजवान नरेंद्र मोदी से नाराज हो सकता है। ओबीसी नौजवान योगी आदित्यनाथ से नाराज हो सकता है। दलित छात्र भाजपा से टूट सकता है। किसान सरकार से नाराज हो सकता है। बेरोजगार युवक व्यवस्था से खिन्न हो सकता है।

मगर मोदी से नाराज आदमी अपने आप राहुल गांधी का मतदाता नहीं बनता।

और मोदी से नाराज हिंदू अपने आप वामपंथी भी नहीं हो जाता। कतई नहीं।

कोई माने या न माने मेरा मानना है कि यही आज कांग्रेस के लिए सबसे जरूरी वाक्य है। समझदारी के लिए एकमेव सूत्र है।

भाजपा से नाराज हिंदू अपनी धार्मिक स्मृति मतदान केंद्र के बाहर रखकर अंदर नहीं जाता। जाति रखने वाला आदमी केवल जाति नहीं है। संविधान चाहने वाला आदमी अपनी सभ्यता से शर्मिंदा होना जरूरी नहीं समझता। बेरोजगार युवक राम को भूल नहीं जाता और रामभक्त होने से उसकी नौकरी की जरूरत खत्म नहीं होती। उलटे बेरोजगारी, बदहाली उसे मंदिर, पूजा-पाठ की ओर ही ले जाती है।

सो, मनुष्य विचारधारा की फाइल नहीं है। लेकिन लुटियन दिल्ली उसे बार-बार फाइल बना उसे लेफ्ट बनाने, रेवड़ी देने, गुलाम बनाने की धुन में रहती है।

इसी में राजीव गांधी उलझे थे। शाहबानो में उन्होंने मुसलमान को समुदाय के रूप में पढ़ा और अयोध्या में हिंदू को प्रतिक्रिया के रूप में। नागरिक दोनों जगह पीछे छूट गया।

सो, राहुल गांधी के सामने आज उसी गलती का नया संस्करण या दोहराव है। यदि वे हिंदू को केवल जातियों में तोड़कर, मनुस्मृति और पितृसत्ता के विमर्श में समझेंगे तो संभव है कुछ चुनावी समीकरण बन जाएं। मगर क्या उससे कांग्रेस फिर वह अखिल भारतीय पार्टी बनेगी, जिसमें ब्राह्मण, दलित, ओबीसी, आदिवासी, मुसलमान, व्यापारी, किसान, महिला और नौजवान अपनी-अपनी पहचान के बावजूद एक बड़े राष्ट्रीय भाव में साथ खड़े हों?

यही असली कसौटी है।

कांग्रेस की समस्या यह नहीं कि उसके पास मुद्दे नहीं हैं। मोदी सरकार और भाजपा स्वयं उसके लिए मुद्दे पैदा कर रहे हैं- बेरोजगारी, पेपर लीक, शासन की ठसता, संस्थाओं की गिरावट, रोजमर्रा की बदहाली, सत्ता का अहंकार। कांग्रेस की समस्या यह है कि वह इन मुद्दों को नागरिक की भाषा में नहीं पकड़ रही। वह सिर्फ हर आदमी को पहले उसकी जाति, लिंग, समुदाय और हिस्सेदारी में बांटकर संबोधित करती है

राजीव गांधी के समय कांग्रेस ने दो समुदायों के बीच संतुलन साधना चाहा और दोनों का विश्वास खोया। राहुल गांधी के समय खतरा दूसरा है, भारत को जोड़ने निकली कांग्रेस कहीं भारत को लगातार सामाजिक खांचों में पढ़ते-पढ़ते अपना पुराना जोड़ने वाला चरित्र खो दे रही है।

तभी सवाल राहुल गांधी के बदलने भर का नहीं है। सवाल है राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी 2014 से पहले और बाद में आज तक नरेंद्र मोदी के फिनोमीना और आम हिंदुओं की लुटियन दिल्ली के बाहर के दिलो-दिमाग को पढ़ने में समर्थ क्यों नहीं हो पा रही है?  उनकें आसपास विचार देने वाले, सलाह देने वाले, एक्सेस पर कंट्रोल करने कैसे, क्या चेहरे है?

कांग्रेस के जानकारों की बात मानें तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी समस्या है कि वे खांटी जमीनी कांग्रेसी नेताओं से बात करना, उन्हें सुनना तो दूर उनसे मिलते भी नहीं। केरल के एक वेणुगोपाल ने एआईसीसी, राहुल गांधी के संगठनात्मक रोल पर एकाधिकार बनाया है। वही राहुल गांधी की दिमागी एक्सेस, मीडिया पर वही पुराने कनिष्क सिंह, जयराम रमेश, सचिन राव, मीनाक्षी नटराजन, कौशल विद्याथी, अलंकार सवाई, अमिताभ दुबे जैसे चेहरे हैं, जिसमें कोई एक्सेस कंट्रोलर है तो कोई दलित, कोई ओबीसी,  कोई एनजीओ, कोई मीडिया और अब जनरेशन जेड संभालने की भी ठेकेदारी लिए हुए है। कन्हैया, योगेंद्र यादव आदि के प्रभाव अपनी जगह, समय अनुसार है। जैसे जंतर-मंतर के बाद बताया जा रहा है कि सीपीआई-एमएल की छात्र संगठन आईसा की प्रमुख नेहा बोरा की क्रांतिकारिता से राहुल गांधी में ऐसा भभका बना जो मनुस्मृति पर टूट पड़े और पित्तृसतात्मक सत्ता का वह ज्ञान बताया जो लुटियन दिल्ली में भले हिट हो लेकिन यूपी के चुनाव में योगी-भाजपा घर-घर राहुल-अखिलेश के खिलाफ अभियान बना दे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

इस सबमें राहुल गांधी का निज ज्ञान-विचार शायद ही कभी रहा? मनुस्मृति पढ़ने, उसके तर्क-कुतर्कों की गहराई में खोने, समझने का तो खैर सवाल नहीं उठता। लेकिन उससे नरेंद्र मोदी, संघ, भाजपा को निरूत्तर किया जा सकता है, इसकी उन्हें घेरे से ब्रीफ वैसी ही मिली होगी जो वे यूरेका, यूरेका करते दौड़ पड़े।

राहुल गांधी और कांग्रेस का नंबर संकट ही यह है कि वे हिंदू सामूहिकता की मौजूदा वास्तविकताओं को देखने-समझने की आंख नहीं लिए हुए हैं? भला क्यों कथित कांग्रेस हाईकमान (राहुल गांधी, प्रियंका, सोनिया गांधी, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी) हमेशा चंद चहेरों की आंखों से भारत के लोगों की गणित बनाकर, सर्वेयरों की टीमें दौड़ाकर, घिसीपिटी शब्दावली के एक्शन, फैसले करके क्या उत्तर भारत के बहुसंख्यकों में वह राहुल गांधी का वह रैला बन सकता है जो गांधी के गुजरात में मोदी ने बनाया या गंगा-यमुना दोआब में रामराज्य, वैष्णव भजनों से गांधी ने अपना बनाया था।

कह सकते हैं जंतर-मंतर से लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी से नौजवानों, लोगों का मोहभंग दिख रहा है तो राहुल गांधी जो बोलेंगे तो मोदी भक्त अपने आप कांग्रेस, राहुल गांधी को मानेंगे!

सतही तौर पर सोचना गलत नहीं। लेकिन 1947 से स्वतंत्र भारत के इस तथ्य को भी नोट रखें कि कम्युनिस्टों से लेकर तरह-तरह के समाजवादियों याकि प्रगतिशील जमात ने यह मुगालता भी खूब पाला कि बुर्जवा नेहरू, नेहरू-गांधी परिवार याकि कांग्रेस के खिलाफ लोग उठ गए हैं। न जनसंघ-संघ का कोई अर्थ है और न खानदानी कांग्रेस का।

मोटामोटी अब राहुल गांघी की टीम, क्षेत्रीय दलों के नेता, एनजीओ एक्टिविस्ट, लेफ्टजन वैसे ही ख्याल मोदी-भाजपा-संघ के राजनीतिक ग्राफ को लेकर सोचते हैं। मान बैठे हैं कि जंतर मंतर के बाद नौजवान अब राहुल को सुन रहे हैं।

सो, बड़ा-आखिरी सवाल यह भी है कि मोदी से नाराज हिंदू जाएगा कहां?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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