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बोरों में लक्ष्मीजी!

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उफ! कारोबारी सांसद धीरज साहू की भूख और लक्ष्मी कृपा में उसका बोरों में नकदी को छुपा कर रखना! लेकिन धीरज साहू क्या अकेले हैं? क्या औसत लक्ष्मीवान हिंदू का इतिहासजन्य यही व्यवहार नहीं रहा है? गुलामी का काल हो या आजाद भारत और उसका मौजूदा कथित अमृतकाल! औसत हिंदुओं के श्रेष्ठिजन, धनिक वर्ग, शासक नेता और अफसरों ने क्या कभी भी महालक्ष्मी को उनकी स्वच्छता-सुव्यवस्था के ‘श्री’ में अपनाया है? लक्ष्मी का पर्याय कमल है, कला हैं तथा धन संपदा का सुनियोजित रीति से सदुपयोग है। लक्ष्मी कथा का सार है कि उपार्जन भले कम हो लेकिन उसके उत्तरार्ध में जरूरी है जो एक-एक पैसा सत्प्रवृत्ति में अच्छे काम याकि कला, ज्ञान, पुरुषार्थ और सद्बुद्धि की श्रीवृद्धि के लिए हो। अर्जित पैसा परिवार, धर्म और देश के लिए सौभाग्यशाली बने। लेकिन हम हिंदुओं का याकि धीरज साहू, अंबानी-अडानी जैसे जगत सेठों और कुबेर स्वरूप सरकारों का व्यवहार इस सबसे क्या उलट नहीं रहा है?

सवाल है क्यों कलियुगी भारत में लक्ष्मी की कृपा अनंत भूख में कन्वर्ट होती है? लक्ष्मीवानों का पेट कभी क्यों नहीं भरता! क्यों भारत में धनार्जन लक्ष्मीवानों को नशेड़ी, भूखा तथा मूर्ख बनाता है? वे उत्तरोत्तर कंजूस, विलासी, अहंकारी, और अनैतिक व बेईमान क्यों बनते जाते हैं?

शराब व्यापारी धीरज साहू लक्ष्मीवान हिंदुओं का प्रतीक हैं। भारत के किसी भी उस क्षेत्र, उस धंधे पर गौर करें, जिससे हालिया दशकों में अकूत पैसा पैदा हुआ है। सत्ता, जमीन, शराब, सट्टा, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, सार्वजनिक कारखानों और ठेकों आदि के तमाम क्षेत्रों में पैसा कमाने की रीति क्या रही है? लूट सके तो लूट, लक्ष्मी नाम की लूट। अंत समय पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट!

इसमें शराब व्यापार, उसके ठेके, उसकी एक्साइज रेवेन्यू के तमाम पहलूओं में व्यापारी, ठेकेदार और सरकार तीनों का रवैया क्या बना होता है? शराब कैसी भी बेचो, कितनी ही पिलाओ, सबमें मकसद लूट सके तो लूट की भूख का रिकॉर्ड है। मनुष्य अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप में भी बेइंतहां शराब पीता है लेकिन इन देशों से क्या कभी यह खबर पढ़ने को मिली कि वहां धीरज साहू, या पोंटी चड्ढा या गुटखा किंग गुप्ता, सिंघानिया, पालीवाल जैसे लक्ष्मीवान हैं जो अरबों रुपए कमाते हैं और फिर उनको बोरों में भर कर, लक्ष्मी कृपा को दो नंबर में कन्वर्ट करके नगरसेठ कहलाते हैं, सांसद बनते हैं। पार्टियां चलवाते हैं।

दुनिया में व्हिस्की, वाइन सबकी निर्माता विशाल वैश्विक कंपनियां हैं लेकिन कभी यह सुनने को नहीं मिला कि किसी का मालिक टैक्स चुराता है और उनके यहां छापे पड़ते हैं या अकूत नकदी मिलती है। जबकि भारत में धंधा ही मानों काला व्यापार! भारत के हर प्रदेश, प्रदेश की हर सरकार, सरकार के हर संबंधी विभाग में नागरिकों को घटिया या अच्छी शराब पिलवा, तंबाखू, गुटखा खिलवा कर, बीड़ी-सिगरेट का नशा करवाने का काम हर स्तर पर सफेद-काले के समानांतर सिस्टम से है। इसमें निर्माता, ठेके वाला हो या वितरक और नेता-अफसर सब काली कोठरी में काले हो कर बेइंतहां कमाई के बावजूद लगातार इस धुन में रहते हैं कि लक्ष्मीजी बोरों में जमा होती जाए। और वे समाज-देश-व्यवस्था के नियंता बने!

हाल के चुनाव में मैंने छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश में शराब और शराब की कमाई से जैसा राजनीतिक भ्रष्टाचार, वोटरों को खरीदने, शराब बांटने के जिस पैमाने के किस्से सुने तो लगा मानों भारत सचमुच अब शराब का कुंआ है। हर प्रदेश रिकॉर्ड तोड़ कमाई कर रहा है। उत्तर प्रदेश नंबर एक बना है तो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा से लेकर केरल सभी और लोग मूर्ख बन कर नशे में झूमते हुए हैं।

सवाल है धीरज साहू को जब बेइंतहां कमाई है तो उसने टैक्स दे कर कमाई को व्हाइट क्यों नहीं रखा? दो ही कारण हो सकते हैं? या तो वह शराब के ठेकों से एक नंबर के साथ दो नंबर (मतलब फैक्टरियों से अनअकाउंटेड शराब या नकली शराब) बेच कर नकदी बटोर रहा था या फैक्टरी-अफसर-वितरक-विक्रेता सबकी रजामंदी से बिक्री कम दिखा कर काले धन की समानांतर व्यवस्था बनाए हुए था। इसलिए ताकि अपनी, अपने धंधे और परिवार की सुरक्षा पर जब भी तलवार लटके तो गोदामों में भरी नकदी काम आए। निःसंदेह धीरज साहू भी सिस्टम से बना हुआ अरबपति है और वह जानता-समझता है कि सरकार, उसके विभागों या अफसरों या नेताओं को मैनेज करने के लिए दो नंबर का खजाना बनाए रखना भारत में जीने की अनिवार्यता है। जब सदियों से सत्ता, नेता, अफसरों के आगे हरजाने, शुक्राने, नजराने से देश चला आ रहा है तो अब भी जरूरी है कि लक्ष्मीवान बोरों में भर कर नकदी का गुप्त रिजर्व रखें ताकि आफत आए तो पैसा बांट कर बला टालें!

मैं असंख्य दफा लिख चुका हूं कि सैकड़ों सालों की गुलामी ने हम लोगों के अवचेतन में कूट-कूट कर असुरक्षा भरी है। विदेशियों की गुलामी के दौरान नगरसेठ और व्यापारी पैसा जमीन में गाड़ कर रखते थे या दो नंबर की हुंडियों व सोने-चांदी से छुपा कर रखते थे। ताकि दरबारों, बादशाहों, कोतवालों, लुटेरों, डाकुओं से वे सुरक्षित रहें। 1947 में आजादी के बाद पंडित नेहरू के समाजवाद के ख्याल में बनी व्यवस्था सभी के लिए लूट का कल्पवृक्ष बनी। निजी कारखानों का सरकारीकरण हुआ। धनवानों को शक की नजरों से देखा जाने लगा। कोटा-परमिट, लाइसेंस, कंट्रोल और कोतवालों-छापामारों की एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था बनी, जिससे ब्लैक इकोनॉमी का काला पैसा उमड़ पड़ा। विदेशी बैंकों तक में भारतीयों के काले धन का अंबार लगा। तभी सन् 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने विदेशी बैंकों से काला धन निकलवा कर लोगों के खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपए जमा करवाने का वादा किया तो सभी ने माना कि ऐसा संभव है क्योंकि है हमारा इतना काला धन!

कितना त्रासद है यह सोचना कि हम हिंदुओं ने लक्ष्मी और लक्ष्मीवानों के साथ काली अर्थव्यवस्था को इतनी सहजता से स्वीकारा हुआ है कि ऐसा ही भारत में होता है!

बहरहाल, धीरज साहू पर लौटें। क्या धंधे को चलाए रखने के लिए इतना बड़ा गुप्त खजाना जरूरी था? क्या वह पैसे को किसी क्रिएटिव, संस्कारी पुरुषार्थ, सत्कर्म में नहीं खपा सकता था? संभव नहीं है। इसलिए क्योंकि भारत के परिवेश में लक्ष्मीवानों के मनोभाव का यह बेसिक इंस्टिक्ट, डीएनए है कि पैसा सर्वोपरि है। पैसा है तो सत्ता है, ख्याति है, सुरक्षा है और धर्म, समाज, राजनीति में अपना वैभव है। सो, धन चिड़िया की वह आंख है, जिस पर लक्ष्मीवान चौबीसों घंटे निशाना साधे रहता है। तभी भारत का लक्ष्मीवान अंधा होता है। उल्लू (मूर्खता) पर सवार रहता है। धीरज साहू को पैसे की बाढ़ के आगे भला फुरसत और यह समझ कहां रही होगी कि इतना पैसा कमा रहे हैं तो चलो विश्वस्तरीय एक वाइन उद्यम ही बनाएं। लक्ष्मी की कृपा के धन से रियल पुरुषार्थ, इनोवेशन, नई रिसर्च-आविष्कार जैसा कुछ हो! लेकिन मिशन तो एक ही- लूट सके तो लूट…।

मैं भारत राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था के ठेकेदारों, अफसरों, नेताओं और उनके क्रोनी धनपतियों, लक्ष्मीवानों की भूख के किस्से सुन अक्सर सोचता हूं कि इतना पैसा इकठ्ठा करके ये करते क्या हैं? और अंत में इनका होता क्या है? चार दशक पहले सबसे पहले वीर बहादुर सिंह के किस्सों से शुरू हुए सिलसिले से सुब्रत राय, धीरूभाई अंबानी, पोंटी चढ्डा, ओमप्रकाश चौटाला, मायावती के किस्से सुन-सुन कर मैं हमेशा विचारता रहा हूं कि भूख की विकरालता हम भारतीयों का वह वैशिष्टय है, जिससे अंत में न तो कुछ बचता है और न बनता है। पिछले बीस वर्षों पर गौर करें। हर शहर में भूमाफियाओं व बिल्डरों की काले धन की नई व्यवस्था बनी है। उससे और प्रमाणित है कि भारत का हर कथित विकास काले धन के संग्रहण का बाईप्रोडक्ट है और वह काले धन को ही बढ़ाता जाता है। सो, जो कुछ होता है वह लक्ष्मीजी को बोरों में भरकर, उन बोरों के अहंकार का नशा है। किसी भी स्तर पर लक्ष्मीजी की प्रकृति अनुसार न हमारे यहां धन से पुण्यता है और न रियल विकास और न सद्बुद्धि विकास है। धीरज साहू ने लक्ष्मीवान बन कर लक्ष्मी की चंचलता को बोरों में बंद किया। ऐसा होना किसी भी सूरत में लक्ष्मी के वरदान का सदुपयोग नहीं है। और यह सत्य हर लक्ष्मीवान पर लागू है। भारत की सरकारों पर भी।

सोचें, भारत को विकसित बनाने की बातें करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले नौ वर्षों से क्या किया है? 140 करोड़ लोगों से जीएसटी, पेट्रोल-डीजल को महंगा बना, राज्य सरकारों से बेइंतहां शराब बिकवा कर रिकॉर्ड तोड पैसा एकत्र किया। आए दिन खबर आती है कि जीएसटी कलेक्शन ने रिकॉर्ड तोड़ा! लेकिन बारीकी से सोचें, पैसों का इतना भारी कलेक्शन किससे? उन गरीब लोगों से जो पचास रुपए का फोन रिचार्ज कराएं या सिलेंडर खरीदें या मोटरसाइकिल में पेट्रोल भराएं या खाद-बीज खरीदें या पांच रुपए का बिस्किट का पैकेट खरीदें सब अपनी खाली जेब से भी जीएसटी देते है, सरकार की बेइंतहां भूख की पूर्ति के लिए।

और बदले में लक्ष्मीवान बनी सरकार क्या कर रही है या क्या करना चाहिए?  लक्ष्मी कथा अनुसार संग्रहित कोष का सत्प्रवृत्ति में सदुपयोग होना था। लोगों को सक्षम बनाना था। उनमें ज्ञान, पुरुषार्थ और सद्बुद्धि बनानी थी। अवसर बनाने थे ताकि हमेशा के लिए लोग दरिद्रता से बाहर निकलें। समाज-देश की श्रीवृद्धि हो। ठोस विकास हो। लेकिन हुआ क्या?  गरीब से ही एकत्र हुआ पैसा, उसके बहुत थोड़े से हिस्से को छोटी-छोटी रेवड़ियों में बांट कर उन्हें ठगा जा रहा है। ताकि सत्ता सुरक्षित रहे। पक्ष-विपक्ष की सभी सरकारें, सभी पार्टियां अरबों रुपए कलेक्शन करके उसका उपयोग निज सत्ता की चिंता, अपनी सुरक्षा और अपने अहंकार में कर रही हैं।

हां, काल समाजवाद का हो, उदारवाद का हो या अमृतकाल का, भारत के हम लोग स्थायी तौर पर उस व्याधि में बंधे हुए हैं, जिसमें असुरक्षा अमिट है तो भूख अनंत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा 140 करोड़ लोगों की सत्ता के एवरेस्ट पर हैं। लेकिन बावजूद इसके चौबीसों घंटे असुरक्षा में जीना। हर दिन, हर पल चिंता और अधिकाधिक सत्ता की भूख में जीना। कभी तमाम पार्टियां नकदी से चुनाव खजाना बनाए रहती थीं। अब इलेक्टोरल बांड्स की व्यवस्था है तो अरबों रुपए के सफेद चंदे के कलेक्शन के बावजूद पार्टियां दो नंबर का नकदी खजाना बनाने के भी तमाम तरीके अपनाए हुए हैं। क्या कोई अनुमान लगा सकता है कि हालिया विधानसभा चुनावों में कितना काला धन खर्च हुआ? तो व्यवस्था सुधरी या और बिगड़ी?

ऐसा भारत में धनार्जन के हर मामले में है। शराब के ठेकों में भी व्यवस्था सुधार की दर्जनों बातें गिनाई जाती हैं। लेकिन सत्ता, अफसर, धनपति, व्यापारी, निर्माता, ठेकों के मालिक का वह सब उसी रूप में है, जिसकी ताजा झांकी आज धीरज साहू हैं। तो क्यों न मानें कि हम हिंदुओं को लक्ष्मीजी का कोई कलियुगी श्राप मिला हुआ है!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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