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खड़गेः भरोसे का नाम!

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे न केवल कांग्रेस के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं, बल्कि विपक्ष के लिए भी भरोसे का चेहरा बने हैं। तभी अरविंद केजरीवाल से लेकर उद्धव ठाकरे सभी से सीटों के बंटवारे पर बात आगे बढ़ रही है। माना जा सकता है कि खड़गे यदि ‘इंडिया’ के अध्यक्ष बने तो विपक्ष 2024 का लोकसभा चुनाव कुछ राज्यों में कायदे से लड़ेगा। मैं विपक्ष की जीत की उम्मीद में नहीं हूं। लेकिन देश, राजनीति और लोकतंत्र से सरोकारों में मेरी चाहना है कि विपक्ष मजबूती से लड़े और उसे अच्छी संख्या में सीटें मिलें ताकि वह जिंदा रहे और लोकतंत्र सुरक्षित बने। भारत राष्ट्र-राज्य की एकता और अस्तित्व के लिए जरूरी है, जो मौजूदा सत्ता याकि नरेंद्र मोदी व भाजपा की रीति-नीति के विरोधियों का लोकतंत्र में विश्वास कायम रहे। यदि देश में पचास-पचपन प्रतिशत आबादी भाजपा के खिलाफ वोट देती है तो जरूरी है कि इन वोटों, समुदायों की आवाज, इनका प्रतिनिधित्व विधायिका में सम्मानजनक बना रहे!

उस नाते 2024 का चुनाव खत्म होते विपक्ष के लिए आर-पार का है। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल से अखिलेश यादव, मायावती, लेफ्ट फ्रंट सबके लिए यह चुनाव आखिरी है। यदि लोकसभा चुनाव में इनका पूरा सफाया (इसकी आंशका है) हुआ तो इन सभी विरोधी नेताओं का सियासी वजूद मिटेगा। भाजपा का सीट लक्ष्य चार सौ पार का है। और ऐसा होना बंगाल, पंजाब, दिल्ली, यूपी, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र में भाजपा की छप्पर फाड़ जीत से ही संभव है।

इसलिए कांग्रेस और उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का रोल अहम है। खड़गे की कमान में विपक्षी एलायंस में संजीदगी से सीट बंटवारे पर बात हो रही है। उनके कारण जहां कांग्रेस में समझदारी बनी है वही प्रदेश कांग्रेस नेताओं के किंतु-परंतु खत्म हुए हैं। उधर दूसरी पार्टियों के नेता भरोसे में हैं। कांग्रेस की सभी पार्टियों से प्रदेशवार बात हो रही है। कांग्रेस में अहमद पटेल की मृत्यु के बाद जो संकट था वह खत्म होता लगता है। हकीकत है कि अहमद पटेल के बाद राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और पार्टी मुख्यालय एआईसीसी में राजनीतिक नेटवर्किंग, मेलजोल, संपर्क-संबधों का ढर्रा बुरी तरह बिखरा। वैक्यूम बना। इसलिए भी क्योंकि राहुल गांधी अपनी धुन में अकेले और दो-तीन विश्वस्तों (जो बदलते रहे हैं) की नौकरशाही एप्रोच की राजनीति के अभ्यस्त हैं वही सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की अपनी सीमाएं हैं।

इसलिए कांग्रेसियों में यह शिकायत आम है कि अध्यक्ष के घर-दफ्तर व एआईसीसी और राहुल-प्रियंका के घर-दफ्तरों में कार्यकर्ताओं और शुभेच्छुओं के लिए एक्सेस तो मोदी-शाह के यहां से भी अधिक कठिन है। कांग्रेस का हर बड़ा नेता, प्रादेशिक क्षत्रप अपने आपको सर्वज्ञ नरेंद्र मोदी से कम सर्वज्ञ नहीं समझता है और लगातार चुनाव हारते जाने के बावजूद आलाकमान नेता अपने को राजनीति व चुनाव का ग्रैंडमास्टर समझते हैं। कांग्रेसी नेताओं का मिजाज जमीनी कार्यकताओं से मिलने, उन्हें करो-मरो की राजनीतिक लड़ाई के लिए प्रेरित करने का कतई नहीं है। सभी शिकायत करते मिलते हैं- हमें पूछता कौन है? मिलने का वक्त कौन देता है?

बहरहाल, मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता से कुछ बदला लगता है। दरअसल मल्लिकार्जुन खड़गे चुनाव लड़-लड कर, उन्हें जीतते हुए नेता बने हैं। हिसाब से खड़गे का जैसा जो राजनीतिक जीवन और अनुभव है वह जहां कांग्रेस में संभावनाओं का प्रमाण है वही राजनीतिबाजों के लिए अनुकरणीय भी। फिलहाल शरद पवार (83 वर्षीय) को छोड़ खड़गे सभी पार्टियों के मौजूदा सक्रिय नेताओं में सर्वाधिक उम्रदराज (81 वर्षीय) हैं लेकिन सेहत-सक्रियता-समझ और संजीदगी में मजबूत हैं। मामूली बात नहीं है जो खड़गे 1972 से लगातार बारह दफा विधानसभा-लोकसभा चुनाव लड़े और ग्यारह बार जीते। इतना ही नहीं उनकी कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी में पकड़ धाराप्रवाह भाषण की है।

मैं इस सबका उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि नीतीश कुमार या शरद पवार आदि में किसी की जगह यदि ‘इंडिया’ के संयोजक, अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे बनते हैं तो विपक्षी एलांयस में बिखराव नहीं बनेगा। शरद पवार खुद उम्र और सेहत की वजह से महाराष्ट्र में अपने को समेटे हुए हैं। नीतीश कुमार के अरमान हैं लेकिन उन पर भरोसा अब जनता दल यू के भीतर भी नहीं रहा होगा। वे पार्टी में भाजपा के करीबी नेताओं की कठपुतली बन गए लगते हैं। सो, वे कब पाला बदल लें, क्या बोल जाएं, इसका चुनाव घोषणा तक सस्पेंस रहेगा।

यों विपक्ष को चेहरे की जरूरत नहीं है। न नरेंद्र मोदी के आगे उसे कोई चेहरा प्रोजेक्ट करना चाहिए। सन् 2024 के लोकसभा चुनाव में विरोधी पार्टियों को सिर्फ और सिर्फ वह नेता चाहिए जो विरोधी नेताओं को परस्पर जोड़े रखे और उनके दिल-दिमाग में यह सत्य पैठाए कि यह उनकी राजनीति का आखिरी चुनाव है!

सवाल है क्या मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तर भारत के विरोधी नेताओं को समझा सकेंगे? वे कांग्रेस को क्या हिंदी भाषी राज्यों में लड़ने लायक बना सकेंगे? मुश्किल है। अपना मानना है वे खुद अपनी पार्टी के उत्तर भारतीय नेताओं, क्षत्रपों को भी नहीं समझा सकते हैं कि उन्हें क्यों कर लोकसभा चुनाव में करो-मरो की मेहनत करनी है! कांग्रेस के लिए जरूरी है जो वह राज्यसभा, एआईसीसी और प्रदेशों में बैठे सभी मठाधीशों को लोकसभा चुनाव लड़ाए। जो काम भाजपा करती है और माहौल बनाती है वह कांग्रेस-विपक्ष को भी करना होगा। भाजपा ने हालिया विधानसभा चुनावों में अपने कई मठाधीश नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारा। इससे यह नैरेटिव बना कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह चुनाव जीतने के लिए सब कुछ दांव पर लगाए हुए हैं लेकिन कांग्रेस में ऐसे आइडिया पर काम करवाने की सोच और हिम्मत न राहुल, प्रियंका, सोनिया गांधी में है और न मल्लिकार्जुन खड़गे बैठकों में उत्तर भारत के कथित बड़े नेताओं को लोकसभा चुनाव में झोंकने के मूड में हैं।

सचमुच यदि यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़, उत्तराखंड, बिहार, गुजरात मतलब भाजपा के गढ़ों में कांग्रेस सभी आला नेताओं को चुनाव लड़ाने का इरादा बनाए तो चालीस-पचास उम्मीदवारों की उसकी ऐसी लिस्ट बनेगी, जिससे अपने आप कांग्रेस के करो-मरो मोड में चुनाव लगने की हवा बनेगी।  कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, चरणदास महंत, सीपी जोशी, सचिन पायलट, प्रमोद तिवारी, हरीश रावत, राज बब्बर, पीएल पुनिया, आनंद शर्मा, अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली, भूपेंदर सिंह हुड्डा, दीपेंदर सिंह हुड्डा, अजय राय, गोविंद सिंह डोटासरा, जीतू पटवारी, या राज्यसभा के तमाम कांग्रेसी सांसदों, विधायक नेताओं, प्रदेश अध्यक्षों, दिग्गज विधायकों को लोकसभा चुनाव लड़वाना चाहिए ताकि हिंदी भाषी प्रदेशों में तीन-चार दर्जन सीटों पर कांग्रेस के कड़े मुकाबले का मनोविज्ञान बने।

पर इस तरह की किसी आक्रामक एप्रोच में एआईसीसी और मल्लिकार्जुन खड़गे फिलहाल दिखलाई नहीं दे रहे हैं। जबकि हिसाब से कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा से सीधे मुकाबले का है। ये प्रदेश भाजपा को शत-प्रतिशत नतीजा देने वाले हैं। इसलिए राजस्थान में सचिन पायलट या अशोक गहलोत व मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसों के चुनाव में उतरने से कांग्रेस को एक-दो सीट भी मिली तो वह भाजपा को झटका होगा।

पर कांग्रेस के उत्तर भारतीय आला नेताओं में निज प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर चुनाव लड़ने का अब हौसला नहीं है। ऐसा संकट लगभग सभी विरोधी पार्टियों का है। कहने को उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती, जयंत चौधरी अपने बूते लोकसभा चुनाव में जीतने का इलहाम पाले हुए हैं लेकिन ये और इनके राज्यसभा सांसद शायद ही लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत करें।

सो, इस मामले में भी मल्लिकार्जुन खड़गे और उनकी टीम को पहल करनी चाहिए। कांग्रेस और आप में, खड़गे और केजरीवाल में सीट बंटवारे की बातचीत के जो संकेत हैं तो सीट समझौता तो होता लगता है। मगर हर सीट पर प्रत्याशी को लेकर भी एलायंस में आपसी सलाह-मशविरा होना चाहिए। जैसे दिल्ली में सात सीटें हैं। कांग्रेस व आप में इनका बंटवारा हुआ तब भी जरूरी है दोनों पार्टियों के प्रदेश नेताओं में, चुनाव क्षेत्र विशेष के नेताओं में बिगड़े हुए संबंधों की केमिस्ट्री दुरूस्त हो। दोनों पार्टियों की लोकल यूनिट से कॉमन फीडबैक से उम्मीदवार के नाम पर फैसला हो। ताकि चुनाव के वक्त विपक्षी एकता की केमिस्ट्री जमीन पर भी बनी हुई दिखलाई दे।

जो हो, खड़गे और केजरीवाल, कांग्रेस और आप के नेताओं में बातचीत और सहमति की कोशिश भी सामान्य बात नहीं है। ऐसे ही ममता बनर्जी और शरद पवार व दक्षिण के क्षत्रपों का मल्लिकार्जुन खड़गे पर विश्वास होना भी विपक्ष के लिए अच्छी खबर है। उस नाते सर्वाधिक गड़बड़ रोल में लेफ्ट फ्रंट, सीपीएम-सीपीआई जैसी पार्टियां दिख रही हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों का रूख विपक्षी वोटों में बिखराव का है। उधर बिहार में लेफ्ट पार्टियों की सीटों की मांग चौंकाने वाली है। सो, लेफ्ट ‘इंडिया’ एलायंस में मन से नहीं जुड़ा और लचीला नहीं बना तो तय मानें केरल और बंगाल दोनों में भाजपा को कुछ नई, अप्रत्याशित अतिरिक्त सीटें मिलेंगी!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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