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फिर वही जो 2014 से उत्तर भारत का सत्य है। हां, 2014 से उत्तर भारत में हर हर मोदी, घर घर मोदी है सो, 2023 के मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ के मन में मोदी का प्रमाणित होना अनहोनी नहीं है। तय मानें, और मैं लिखता रहा हूं कि लोकसभा चुनाव में भी गोबर पट्टी में नरेंद्र मोदी के नाम पर ठप्पा लगेगा। ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी जहां हिंदू आस्थावानों में अवतार हैं वही चुनावी खेल के ग्रैंडमास्टर होने से दुविधा व अधर के वोटों को बहकाने और विरोधी वोटों को बंटवाने के रणनीतिकार भी। लेकिन इस हकीकत को कांग्रेस, विपक्ष न मानते हैं और न बूझते हैं या फिर भुलाए रहते हैं। तभी उत्तर भारत के चुनावी रणक्षेत्र में नरेंद्र मोदी मानो फुल स्टॉप।

सोचें, नरेंद्र मोदी ने शिवराज सिंह, वसुंधरा और रमन सिंह को दरकिनार करके तीनों प्रदेशों में क्यों अपने चेहरे पर चुनाव लड़ा? ताकि प्रादेशिक लड़ाई में प्रादेशिक प्लस-माइनस खत्म हो। प्रायोजित मीडिया नैरेटिव में नरेंद्र मोदी के आगे मोदी बनाम गहलोत, मोदी बनाम कमलनाथ, मोदी बनाम भूपेश बघेल का नैरेटिव बने। कमलनाथ, गहलोत, भूपेश बघेल ने जो कुछ कहा या जिन गारंटियों, रेवड़ियों, ओबीसी के नाम पर वोट मांग रहे हैं वे सब नरेंद्र मोदी के आगे फुस्स हो!

ऐसा 2018 के मध्य प्रदेश, राजस्थान, छतीसगढ़ चुनाव में नहीं था। तब विधानसभा चुनाव क्षत्रपों में था। उनमें तब उलटफेर हुई थी

मगर 2023 के चुनावों को नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने चार महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव की रिहर्सल बनाया। उन्होंने नतीजों से और जान लिया है कि लोकसभा चुनाव में उत्तर भारत की जमीन पर क्या तो केमेस्ट्री होगी और क्या गणित।

गणित और माइक्रो सच्चाई जाहिर है। कमलनाथ (या राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे या अखिलेश, चंद्रशेखर आजाद, मायावती, हनुमान बेनिवाल आदि) को अपने इस अहंकार का दंड मिल गया है कि ‘अखिलेश, वखिलेश को छोड़िए’! कोई न माने इस बात को लेकिन नतीजों के आंकड़े बोलते हुए है कि राजस्थान में कांग्रेस सिर्फ तीन प्रतिशत वोटों से पीछे रही और ऐसा होना अन्य पार्टियों, निर्दलियों को मिले 19 प्रतिशत वोटों से था। मतलब मोदी राज के घोर विरोधी दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने अपनी पार्टी को चुनाव में उतार कर, आदिवासियों की आदिवासी पार्टी ने, बसपा ने तथा कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों ने, सचिन पायलट के बिदके गुर्जर वोटों ने कांग्रेस की लुटिया डुबाई। लेकिन ऐसे माइक्रो बंदोबस्तों से जीत-हार का फैसला करवा सकना भी तो मोदी-शाह की वह चुनावी मास्टरी है, जिसके आगे कांग्रेस 2014 से पहले गुजरात में नरेंद्र मोदी से बतौर मुख्यमंत्री भी हारती थी और अब भी हारती है।

कांग्रेस और विपक्ष या विपक्ष के ‘इंडिया’ एलायंस की नंबर एक कमी है कि इन्हें अभी भी समझ नहीं आ रहा है कि मोदी-शाह का जमीनी प्रबंधन क्या होता है? परसेप्शन, सोशल मीडिया के हल्ले और नैरेटिव या निर्दलीय खड़े करके, वोट कटाऊ प्रबंध कर ये कैसे तो अपने को अपरिहार्य, रक्षक, भगवान बनाए हुए हैं और कैसे विरोधी वोट, उसकी ताकत को बिखरा देते हैं!

दरअसल विपक्ष ने, खासकर कांग्रेस, उसके नेता और मुख्यमंत्री हमेशा मोदी-शाह को कमतर आंकते हैं। बार-बार हारने के लगातार अनुभव के बावजूद उत्तर भारत का विपक्ष यह समझ नहीं पा रहा है कि मोदी अपने भक्त हिंदुओं के साथ मध्य के अनिश्चित मतदाताओं के वोट भी कैसे मतदान से पहले अपने पक्ष में करवा लेते हैं? हकीकत है राजस्थान और छतीसगढ़ में आंचलिक स्तर पर हिंदू-मुस्लिम था। अलवर हो या जयपुर या सीमा का पोखरण, भीलवाड़ा या नाथद्वार सभी ओर हिंदू-मुस्लिम पॉकेट बने हुए थे तो मेवाड़ की प्रतिष्ठा के चेहरे पर भी चुनाव था। ऐसे नैरेटिव में छतीसगढ़ के रायपुर में लोग एक मुस्लिम मेयर से कांग्रेस के मुस्लिम पार्टी होने की बातें करते हुए थे तो आदिवासी इलाके में ओबीसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आदिवासी विरोधी का परस्पेशन था या शहरी इलाकों में यह हल्ला था कि वे तो गैर-छतीसगढ़ियों के विरोधी।

मेरा मानना है भूपेश बघेल ने अपना ओबीसी, किसानपरस्त आधार कायदे से बनाया। लेकिन उन्हें ध्यान नहीं रहा कि बतौर ओबीसी वे नरेंद्र मोदी के ओबीसी होने के परसेप्शन से बड़े अपने ओबीसी होने का हल्ला लोगों में नहीं पैठा सकते हैं। तभी मेरा यह कहा नोट रखें कि बिहार में नीतीश कुमार, लालू-तेजस्वी का लोकसभा चुनावों में जातीय जनगणना तथा आरक्षण का दांव बुरी तरह फ्लॉप होगा। और नीतीश के मुद्दे में कांग्रेस और राहुल गांधी उत्तर भारत में और दम तोड़ेगे।

मैंने कई दफा लिखा है कि ब्राह्मण-बनिया-राजपूत याकि उत्तर भारत की फॉरवर्ड जातियां भाजपा-संघ परिवार और नरेंद्र मोदी की हवा-आभा के नंबर एक संवाहक-प्रचारक हैं। इसलिए उत्तर भारत में कांग्रेस जब तक फॉरवर्ड में सेंध नहीं लगाएगी, उसका भरोसा नहीं पाएगी तब तक घर-घर की यह चिंता, यह नैरेटिव खत्म नहीं होगा कि मोदी, योगी हैं तभी मुसलमानों से रक्षा है। इस मामले में इस चुनाव में रायपुर का अनुभव मेरे लिए बहुत विचारणीय रहा। सबसे मैंने सुना कि फलां मुस्लिम मेयर को देखो, इसने क्या गदर मचाई है। उसके मुख्यमंत्री के खास बने होने, ज्यादती, मनमानी, वसूली का इतना हल्ला सुना कि लगा मानो पूरा छतीसगढ़ त्रस्त हो। जाहिर है राजधानी शहर के ब्राह्मण-बनियों द्वारा एक तरफ चुपचाप धारणाएं बनवाना वहीं दूसरी और कथावाचकों, पंडितों और पुजारियों से धर्म रक्षा की स्वयंस्फूर्त भावनाएं। कहीं सनातन को खतरा तो कहीं ओबीसी की दादागिरी की चिंता।

याद करें मध्य प्रदेश की रिकॉर्ड जीत के पीछे के साल-डेढ़ सालों पर। कथावाचकों, बाबाओं व साधु-संतों से चुनावी जमीन क्या पकी हुई नहीं थी? मध्य प्रदेश के मन में मोदी के आने से पहले क्या बागेश्वरधाम के प्रमुख, कथावाचकों और बाबा लोग मध्य प्रदेश का मन नहीं बनाए हुए थे? मोदी-शाह की क्या इसमें प्लानिंग नहीं रही होगी? कमलनाथ ने इसे कुछ समझा लेकिन यह नहीं माना कि उन्हें नरेंद्र मोदी से मैदान से मुकाबला करना है!

कांग्रेस को यह बात तब भी समझनी थी जब चुनाव घोषणा से पहले ही भाजपा ने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की। कांग्रेस की मजबूत सीटों पर सांसदों को चुनाव लड़ाने के ऐलान से ही कमलनाथ, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, एआईसीसी को बूझना था कि इसका अर्थ तो मोदी-शाह पूरा दम लगाने वाले हैं। मगर कमलनाथ-दिग्विजय सिंह इस विश्वास में थे कि उन्होंने सर्वेयर टीमों से ठोक-बजा कर उम्मीदवार चुने हैं। शिवराज सिंह के खिलाफ माहौल है, लोग बदलाव चाहते हैं। हम ज्यादा रेवड़ियों का घोषणापत्र बनाएंगे तो चुनाव जीत जाएंगे और पहली लिस्ट से प्रदेश भाजपा में कंफ्यूजन बना है तो इससे भी कांग्रेस को फायदा!

जाहिर है कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों और दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने और पार्टी ने रूटिन में, एक ही अंदाज में चुनाव लड़ा। भाजपा की नकल करते हुए, कर्नाटक से प्रेरित हो कर इन्होंने चुनाव प्रबंधन और सर्वे की प्राइवेट कंपनियों को हायर किया। ब्लॉक, जिला, प्रदेश संगठन की बजाय इन सर्वे रिपोर्टों से अपने उम्मीदवार तय किए या कैंपेन बनवाया। मतलब कांग्रेस में कोई यह अंतर नहीं कर पाया कि मोदी-शाह टीम आर-पार की लड़ाई बना रही है तो पहले तो विपक्ष की अन्य पार्टियों को साथ ले कर मोर्चा बनाएं। नैरेटिव को, कैंपेन थीम को रेवड़ियों की जगह उन राष्ट्रीय-आर्थिक मुद्दों पर ले जाएं जिनसे मोदी सरकार घिरती है। मोदी-शाह की प्रचार में कॉरपेट बमबारी होगी तो उस पर हमारा क्या जवाब होगा? उनका बूथ स्तर पर प्रबंधन जबरदस्त होगा तो हमारा ब्लॉक-बूथ संगठन है या नहीं?

कोई न माने इस बात को लेकिन सत्य है भाजपा ने केंद्रीय संगठन, मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा जबकि कांग्रेस ने चुनाव न तो एआईसीसी लेवल पर लड़ा और न उसकी प्रदेश या जिला कमेटियों ने लड़ा। राजस्थान और छतीसगढ़ में खुद कांग्रेस, संभवतया मुख्यमंत्रियों को भी यह मालूम था कि उनके मंत्री अपने-अपने इलाकों में अपनी मनमानी से न केवल लोगों में नाराजगी बनाए हुए हैं, बल्कि जिला कांग्रेस के बाकी नेता-कार्यकर्ता भी इनके खिलाफ गुस्से में हैं। इसलिए गहलोत-बघेल और एआईसीसी को मंत्रियों के टिकट काटने थे लेकिन इसलिए नहीं काटे क्योंकि पैसे इन्होंने कमाए हुए हैं तो ये खर्च में, लड़ने में समर्थ थे इसलिए इन्हीं को टिकट। और दोनों राज्यों में कांग्रेस के कथित दिग्गज उम्मीदवार भी कांग्रेस के ही लोगों के भितरघात के मारे थे। उस नाते छतीसगढ़ में टीएस सिहंदेव का हारना या सचिन पायलट के लोगों का भी हारना कांग्रेसियों के लिए बड़ा सबक होना चाहिए।

ध्यान रहे तेलंगाना का मामला अलग है। इसलिए क्योंकि उत्तर भारत और खासकर गोबर पट्टी बनाम विन्ध्य पार की राजनीति की सियासी तासीर अलग-अलग है। आजाद भारत के इतिहास में नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी के राज तक में गोबर पट्टी बनाम दक्षिण भारत के चुनावी नतीजों में भिन्नता रही है। तभी तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी-शाह को लेकर दक्षिण में वह आस्था नहीं है जो उत्तर भारत में स्थापित है।

सवाल है मोदी-शाह की इस विधानसभा रिहर्सल से विपक्ष और खासकर राहुल, अखिलेश, नीतीश कुमार को क्या लोकसभा चुनाव की तैयारियों में कुछ समझ आएगा? कांग्रेस की दुर्दशा से अखिलेश, नीतीश, केजरीवाल, चंद्रशेखर आजाद, मायावती का अहंकार क्या बढ़ेगा या ये समझेंगे कि बिना एकजुटता के लोकसभा चुनाव में सभी का सूपड़ा साफ गारंटीशुदा है। अहम सवाल यह भी है कि खड़गे, राहुल, प्रियंका से लेकर एआईसीसी के तमाम कथित प्रबंधक या कन्हैया जैसे सलाहकार पिछड़ों की राजनीति, भारत यात्रा से भारत क्रांति के फलसफों को छोड़ कर जमीनी हकीकत को समझेंगे भी या नहीं?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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