राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

भारत होर्मुज की चौकीदारी क्यों नहीं संभालता?

पता है भारत के जनजीवन, उसकी अर्थिकी की नाड़ी क्या है? करीब 10 किलोमीटर की वह पतली नाड़ी, जिसका नाम होर्मुज की खाड़ी है। यह नाड़ी प्रत्यक्ष तौर पर भारत के सौ करोड़ लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी (गैस, पेट्रोल, उर्वरक, अर्थिकी-खेती, रसोई के ईंधन की वजह से) से जुड़ी है। हां, 145 करोड़ लोगों का भारत खाड़ी पर सर्वाधिक निर्भर है। चीन इतना इसलिए नहीं है क्योंकि वह स्वदेशी निर्भरता के साथ गैस, तेल सप्लाई में सीधे रूस, मध्य एशिया देशों की पाइपलाइनों से जुड़ा हुआ है। मतलब पृथ्वी की कुल आबादी के सर्वाधिक बड़े हिस्से में भारत की भीड़ खाड़ी-निर्भर है।

और पता है भारत से खाड़ी कितने किलोमीटर दूर है? भारत की समुद्री सीमा, गुजरात की खंभात खाड़ी से मुश्किल से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर। ध्यान रहे होर्मुज, अरब सागर भी उस हिंद महासागर का हिस्सा है, जो भारत की दादागिरी याकि प्रभाव क्षेत्र का महासागर है। इसका प्रमाण भारत की नौसेना का आकार है। खाड़ी, अरब सागर, पाकिस्तान या हिंद महासागर के सभी देश भारतीय नौसेना के आगे मामूली हैसियत के हैं। यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय से, 1947 में भारत के विभाजन तक लोथल, खंभात क्षेत्र, सूरत-अरब, ओमान, बसरा, अरब और फारस का पूरा इलाका एक सभ्यतागत गलियारा था। ईरान सटा हुआ पड़ोस था। ईरान के ही सूफियों ने भारत आकर कश्मीर घाटी से लेकर बंगाल के हुगली डेल्टा में हिंदुओं को मुसलमान बनाया।

बहरहाल, ईरान हो या खाड़ी के देश या पाकिस्तान, सभी की कुल नौसेना की ताकत भारतीय नौसेना के आगे मामूली है। भारत के पास भी अमेरिका की तरह के एयरक्राफ्ट कैरियर हैं। परमाणु पनडुब्बी है। डेढ़ सौ से अधिक युद्धपोत हैं। नौसेना लंबी दूरी के समुद्री ऑपरेशन में समर्थ है। इसके आगे ईरान की नौसेना खत्म है (जैसा ट्रंप, नेतन्याहू कह रहे हैं। उसे दोनों देश पाषाण युग में पहुंचा रहे हैं)। सऊदी अरब, कतर, दुबई, कुवैत जैसे देशों की मामूली छोटी तटीय नौसेनाएं हैं। ये बरबाद ईरान के आगे भी अपनी रक्षा में समर्थ नहीं हैं। इस हकीकत में सोचें कि भारत के लिए कैसे अवसर हैं!

एक और तथ्य। ईरान में भारत ने चाबहार बंदरगाह बनाया है। सो, वह खाड़ी के 33 किलोमीटर चौड़े मुहाने, और उसमें भी जहाजों की आवाजाही के दस किलोमीटर पतले रास्ते को अच्छी तरह जाने-बूझे और समझे हुए है। बगल की अदन की खाड़ी में भारत को एंटी-पायरेसी मिशन, मिशन “सागर” और चौकीदारी में जहाजों की आवाजाही का अनुभव है। जैसा दुश्मन पाकिस्तान से सटी गुजरात की खंभात खाड़ी की चौकसी का है!

और इस पूरी हकीकत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दो टूक आह्वान को नोट करें, “जो देश खाड़ी के तेल पर निर्भर हैं, वे खुद Strait of Hormuz की सुरक्षा संभालें”।

इस चुनौती के लिए लपकते हुए देश कौन हैं? ब्रिटेन (ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, उनकी विदेश मंत्री ने 40 देशों के विदेश मंत्रियों से वीडियो कॉन्फ्रेंस करके पहल की) है। चीन है तो इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी है और पाकिस्तान भी है!

भारत क्यों नहीं है? भला ‘धुरंधर’ भारत कहीं क्यों नहीं दिखलाई दे रहा है?

माना कि ठीक लड़ाई से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल जाकर प्रधानमंत्री नेतन्याहू को भारत का यार बताया। मतलब नेतन्याहू तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं। यदि ऐसा रिश्ता है तो मोदीजी भाई नेतन्याहू से ही कहते, तुम ईरान को पाषाण युग में पहुंचाओ और मेरे देश को, मेरे अंबानी-अडानी को होर्मुज की चौकीदारी का ठेका दे दो!

लेकिन किसी तरह की कोई बात नहीं। न बात, न कूटनीति और न भूराजनीति या ऊर्जा आवश्यकता में किसी तरह की सामरिक या शतरंजी हलचल!

दो वजह हो सकती हैं। या तो डोनाल्ड ट्रंप ने गारंटी दी है कि चिंता न करो, भारत को अमेरिका, वेनेजुएला से अबाध तेल, गैस सप्लाई होगी। पर इतनी दूर की सप्लाई कितनी महंगी पड़ेगी? वह सप्लाई क्या भारत की आर्थिक कमर तोड़ने वाली नहीं होगी? दूसरी वजह प्रधानमंत्री नेतन्याहू का मित्र मोदी को यह दिया भरोसा हो सकता है कि मित्र धैर्य रखो, मैं ईरान को पाषाण युग में पहुंचा दूं, पश्चिम एशिया का नक्शा बदल दूं तो उसके बाद ईरान के कुएं से तेल की नदियां सीधे अंबानी की जामनगर रिफाइनरी में पहुंचेंगी! खूब माल कमाओगे।

संभव है धुरंधर ऐसे ही फिल्मी कहानियों में खाड़ी को अपना होते देख रहे हों! फिर भी सवाल है कि बारह वर्षों से छप्पन इंची छाती में पाकिस्तान, चीन को हैसियत दिखला देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भला कैसे बरदाश्त कर रहे हैं कि खाड़ी की चौकीदारी के लिए चीन, पाकिस्तान, ईरान गुटरगूं करें और ट्रंप-नेतन्याहू संकेत भी नहीं दें कि खाड़ी की चौकीदारी भारत के लिए?

कभी भारत के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री निर्गुट देश होने के नाम पर विश्व राजधानियों में घूमते थे। आज बगल में भारी संकट है, राष्ट्र के जीवन की नाड़ी खतरे में है और भारत निष्क्रिय! यों भारत का इन दिनों राष्ट्रधर्म धंधे का, खरीद-फरोख्त और स्वकेंद्रित मुनाफाखोरी का है, भय-भूख-भक्ति का है तो स्वाभाविक इस मंत्र का जाप है कि हमें लड़ना नहीं, धंधा करना है।

और इस भारत सत्य को दुनिया का हर देश जान गया है। ट्रंप, नेतन्याहू जानते हैं तो चीन जानता है, खाड़ी के देश जानते हैं, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश से याकि दक्षिण एशिया, आसियान देश सभी जानते हैं। सोचें, मलेशिया ने चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर ईरान से सप्लाई की कूटनीति रची हुई है। ऐसे ही वियतनाम, फिलीपींस अपने जुगाड़ में हैं। एक अकेला भारत है जिसे दुनिया ने भी समझा हुआ है कि वह किसी काम का नहीं!

सोचें, पूरे हिंद महासागर की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति लेकिन कोई महाशक्ति, कोई देश यह सोचता हुआ नहीं कि भारत से भी बात करें! ट्रंप ने छूटते ही पाकिस्तान के जनरल मुनीर को फोन खड़खड़ाया। इस पर भारत के धुरंधर विदेश मंत्री ने ज्ञान दिया कि पाकिस्तान तो दलाली करता है! पर बाकी देशों ने भी तो पाकिस्तान को भाव दिया है। चीन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री को न्योता तो कूटनीतिक दांवपेंचों में सऊदी अरब हो या तुर्की या ईरान सभी पाकिस्तान की पंचायत को वैसे ही महत्व देते हुए हैं जैसे अमेरिका दे रहा है।

हिसाब से पाकिस्तान बतौर इस्लामी महाशक्ति (परमाणु हथियारों की वास्तविकता में) के आज दोगली कूटनीति, कौम से गद्दारी कर रहा है। उसके प्रति मुसलमानों में विश्वव्यापी नफरत होनी चाहिए। दुनिया भर के मुसलमानों में आज नेतन्याहू-ट्रंप नंबर एक के खलनायक हैं जबकि पाकिस्तान उनके लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर मददगार है।

बावजूद इसके अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, ईरान, मलेशिया, तुर्की सभी तरफ पाकिस्तान की सरपंची चली हुई है।

इस सबको भारत एक झटके में खत्म कर सकता है बशर्ते भारत की नौसेना सीधे होर्मुज  खाड़ी के मुहाने चौकीदार की तरह जाकर खड़ी हो! क्यों नहीं हो सकती? या क्यों नहीं होना चाहिए! ट्रंप ने दुनिया को ललकारा है कि “जो देश खाड़ी के तेल पर निर्भर हैं, वे खुद Strait of Hormuz की सुरक्षा संभालें”। तो भारत भला क्यों चूके? आखिर भारत ही तो सर्वाधिक खाड़ी से आने वाले तेल पर निर्भर है।

पर ऐसा नहीं होगा। भारत की अर्थिकी लगातार महंगी, बरबाद होगी। भारत या तो अमेरिका, वेनेजुएला, रूस से महंगा तेल खरीदेगा या खाड़ी के महंगे तेल, गैस पर ईरान को टोल टैक्स देकर तेल मंगवाएगा। हां, चर्चा है कि ईरान प्रति जहाज दस-बीस करोड़ रुपए की टोल वसूली करके जहाज आने-जाने दे रहा है। साथ ही वह चीन, पाकिस्तान के कहने में इतना अधिक है कि भारत की सप्लाई भी चीन की ओर मुड़ रही है! बतौर एक ग्राहक के भी ईरान की नजरों में भारत की अहमियत आखिरी देश की है!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

one + eleven =