मानसून की पहली असली बारिश और राजधानी दिल्ली-एनसीआर की सबसे यादगार तस्वीर। गुरुग्राम की सबसे पॉश गोल्फ कोर्स रोड मानो नदी बन गई थी। बीसियों करोड़ रुपये की एक लेम्बोर्गिनी पानी में डूबी, जिसे एक आलीशान रिहायशी टावर के जलमग्न बेसमेंट से क्रेन के सहारे बाहर निकाला जा रहा था। कुछ ही क्षण बाद दूसरा वीडियो सामने आया। डूबी सड़क के ऊपर किसी घर की ऑटोमेटिक आवाज़ बार-बार गूँज रही थी—“पानी की टंकी भर गई है। मोटर बंद कर दीजिए।”
बस, एक ही फ्रेम में ‘विकसित भारत’ का पूरा रूपक मौजूद था। चारों ओर वही गुरुग्राम, जिसे रियल एस्टेट के चमकदार ब्रोशर भारत का भविष्य बताते हैं—कैमेलियाज़, शीशे से ढके टावर, बीस करोड़, पचास करोड़ और उससे भी महंगे अपार्टमेंट। लेकिन उन्हीं के बीच सड़क नदी बनी हुई थी और करोड़ों की लेम्बोर्गिनी क्रेन से बाहर निकाली जा रही थी। यह कोई असाधारण दृश्य नहीं था। असाधारण केवल इतना था कि उसने बिना एक शब्द बोले आज के शहरी भारत की सबसे सटीक तस्वीर खींच दी—विश्वस्तरीय निजी वैभव और जलमग्न सार्वजनिक व्यवस्था।
जैसे-जैसे ऐसे वीडियो मेरी सोशल मीडिया फ़ीड पर बढ़ते गए, मन में एक सवाल उतना ही बड़ा होता गया। सरकार जिस ‘विकसित भारत’ के निर्माण का दावा कर रही है और जिन शहरों में हम वास्तव में रह रहे हैं, उनके बीच की दूरी आखिर कितनी है?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पिछले बारह वर्षों में भारत धीरे-धीरे उद्घाटनों का गणराज्य बन गया है। इस दशक की राजनीतिक दृश्य-भाषा को यदि किसी एक प्रतीक ने सबसे अधिक परिभाषित किया है, तो वह है—उद्घाटन। फ़ीता काटना, शिलापट्ट का अनावरण, ड्रोन कैमरे से ली गई तस्वीरें, ऊपर से चमचमाती एक्सप्रेसवे की लंबी पट्टियाँ—बुनियादी ढाँचा अब केवल विकास का साधन नहीं रहा, वह विकास की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक इमेज भी बना हुआ है।
सच है कि भारत ने अभूतपूर्व गति से निर्माण किया है। नए एक्सप्रेसवे बने, हवाई अड्डे बने, रेल कॉरिडोर बने, पुल बने, कॉरिडोर बने, नए संसद भवन तक का निर्माण हुआ। निर्माण की गति पर विवाद नहीं है।
लेकिन एक दशक तक लगातार उद्घाटन देखने के बाद अब नए भारत को अपने आप से एक कम सुविधाजनक प्रश्न पूछना चाहिए। सवाल यह नहीं कि हमने कितना बनाया। असली सवाल यह है कि जो बनाया, वह टिकेगा कितने दिन?
फ़ीता केवल एक बार काटा जाता है। शहर को हर दिन काम करना पड़ता है। और किसी शहर की असली परीक्षा उद्घाटन के दिन नहीं, मानसून के दिनों में होती है।
दरअसल, मानसून भारत की विकास-गाथा का सबसे निर्मम ऑडिटर बन चुका है। कुछ घंटों की बारिश बता देती है कि निर्माण कितना टिकाऊ है। कहीं नई एक्सप्रेसवे धँस जाती है। कहीं अभी-अभी बनी सड़क गड्ढे में बदल जाती है। करोड़ों रुपये की हाउसिंग सोसाइटी का बेसमेंट जलाशय बन जाता है। अंडरपास वेनिस की नहर बन जाता है। नालियाँ गंदगी उगलने लगती हैं। पहाड़ी सड़कें भूस्खलन में बह जाती हैं। और कभी-कभी तो नई संसद की छत भी बारिश की बूँदों को भीतर आने से नहीं रोक पाती।
उद्घाटन का समारोह कुछ मिनटों का होता है। लेकिन निर्माण की असली विश्वसनीयता हर बरसात में, हर मौसम में और हर दिन परखी जाती है। शायद यही वह कसौटी है, जिस पर आज का ‘विकसित भारत’ बार-बार सवालों के घेरे में खड़ा होता है।
दिल्ली में दो दिन की मूसलाधार बारिश ने राजधानी की सड़कों को फिर तालाब बना दिया। दिल्ली अग्निशमन सेवा को मकानों और दीवारों के ढहने की कई कॉल मिलीं, पेड़ गिरने की अलग। शहर के वही परिचित चौराहे फिर भूरे पानी के तालाब बन गए और ट्रैफिक रेंगने लगा। सफदरजंग अस्पताल तक बारिश का पानी पहुँच गया। ग्रेटर कैलाश मेट्रो स्टेशन के प्रवेश द्वार पर पानी भरा। फतेहपुर बेरी में स्कूल के बच्चों को प्लास्टिक की चादर से बनाई गई अस्थायी बेड़ी पर बैठाकर सड़क पार कराई गई। जगतपुर में तीन स्कूली बच्चे जलभराव के बीच उस खुले नाले में गिर पड़े, जिसे पानी ने पूरी तरह छिपा दिया था। सौभाग्य से आसपास के लोगों ने उन्हें समय रहते बाहर निकाल लिया।
यदि यह सब पहली बार हुआ होता, तो तस्वीर असाधारण लगती। लेकिन यही तो समस्या है। यह हर मानसून की कहानी है। हर साल वही तस्वीरें, वही सुर्खियाँ, वही स्पष्टीकरण और वही वादे।
शहरों से बाहर निकलकर देखिए तो बारिश एक और असहज सच सामने रखती है। पिछले महीने दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे का एक हिस्सा भारी बारिश और जलभराव के बाद धँस गया। महाराष्ट्र में लगभग 6,700 करोड़ रुपये की लागत से बना मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का चर्चित मिसिंग लिंक, जिसका उद्घाटन मुश्किल से नौ सप्ताह पहले हुआ था, भूस्खलन के कारण आंशिक रूप से बंद करना पड़ा।
यहीं ‘विकसित भारत’ का सबसे कठिन प्रश्न सामने खड़ा होता है। हमने यह सिद्ध कर दिया है कि हम तेज़ी से निर्माण कर सकते हैं। लेकिन क्या हम ऐसा निर्माण भी कर रहे हैं, जो समय, मौसम और प्रकृति की परीक्षा झेल सके?
यह चिंता केवल दिल्ली की नहीं है।
कश्मीर में जब भी तेज़ बारिश होती है, श्रीनगर की निगाह सबसे पहले झेलम नदी पर जाती है। 2014 की विनाशकारी बाढ़ की स्मृति आज भी वहाँ के लोगों के मन में ताज़ा है। उस त्रासदी के बाद नदी की ड्रेजिंग, मज़बूत तटबंधों और बेहतर फ्लड स्पिल चैनल के वादे किए गए। सैकड़ों करोड़ रुपये स्वीकृत हुए। काम भी हुआ। लेकिन बाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट ने बताया कि ड्रेजिंग के लक्ष्य पूरे नहीं हुए और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण काम अधूरे रह गए। परिणाम यह हुआ कि 2025 में जैसे ही झेलम का जलस्तर बढ़ा, लोगों ने फिर वही किया जो वे एक दशक पहले कर चुके थे—फ्रिज और सोफे ऊपरी मंज़िलों पर चढ़ाए, गाड़ियाँ ऊँची जगहों पर खड़ी कीं और बाढ़ का इंतज़ार करने लगे।
इस अगस्त वाराणसी भी गंगा के बढ़ते जलस्तर को देखता रहा। नदी खतरे के निशान से ऊपर चली गई। नमो घाट पानी में डूब गया। स्कूल बंद करने पड़े। जलभराव में पलटते एक ऑटो का वीडियो पूरे देश में वायरल हुआ।
वाराणसी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शायद ही कोई दूसरा शहर नरेंद्र मोदी की शहरी विकास की परिकल्पना का उतना बड़ा प्रतीक हो। घाटों का कायाकल्प हुआ। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बना। सड़कें चौड़ी हुईं। भवनों के अग्रभाग संवारे गए। नदी किनारा बदला। इस शहर पर राजनीतिक पूँजी भी भरपूर लगी और सार्वजनिक धन भी।
फिर भी पानी निकासी और जलभराव जैसी पुरानी समस्याएँ वहीं की वहीं खड़ी हैं।
शायद भारत के शहरी कायाकल्प की सबसे बड़ी भूल यही है। हम शहरों का चेहरा बदलने में तो बहुत दक्ष हो गए हैं, लेकिन उनका चरित्र नहीं बदल पाए। शहर कैसा दिखता है, इस पर हमारी पकड़ मज़बूत हुई है; शहर कैसे काम करता है, यह अब भी हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी बना हुआ है।
और फिर आती है नई संसद की कहानी, जहाँ विडंबना लगभग प्रतीक बन जाती है।
करीब एक हज़ार करोड़ रुपये की लागत से बना नया संसद भवन केवल एक इमारत नहीं था। उसे ‘नए भारत’ की स्थापत्य घोषणा कहा गया। लेकिन उद्घाटन के एक वर्ष के भीतर ही 2024 की बारिश में उसकी लॉबी की छत से पानी टपकने लगा और नीचे बाल्टी रखनी पड़ी। लोकसभा सचिवालय ने कहा कि काँच के गुंबद को पकड़ने वाला चिपकाने वाला पदार्थ अपनी जगह से हट गया था, जिसे बाद में ठीक कर दिया गया। अब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सीपीडब्ल्यूडी और वास्तुकारों से मकर द्वार पर ऐसा पोर्च बनाने को कहा है, जो सांसदों को धूप और बारिश से बचा सके।
जिस भवन को उसके वास्तुकार ने डेढ़ सौ वर्ष तक टिकने वाला बताया था, वह तीन वर्ष पूरा होने से पहले ही मौसम से अपनी पहली बड़ी परीक्षा हार चुका था। प्रकृति ने मानो उसे फिर से ड्राइंग बोर्ड पर भेज दिया।
मैं फिर उसी प्रश्न पर लौटती हूँ—क्या हम उद्घाटन के लिए निर्माण कर रहे हैं या टिकाऊपन के लिए?
एक्सप्रेसवे, नए कॉरिडोर, बदले हुए शहर, भव्य सार्वजनिक भवन—इनमें से कोई भी नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विचार से अलग नहीं है। यही उसकी ईंटें हैं, यही उसका गारा है। यही वह राजनीतिक भाषा है जिसे नरेंद्र मोदी ने पिछले बारह वर्षों में सबसे प्रभावी ढंग से गढ़ा है—बड़ा पैमाना, तेज़ गति, ऊँची महत्वाकांक्षा और समयबद्ध डिलीवरी। एक ऐसे नेता की छवि, जो लगातार निर्माण करता है और बड़ा निर्माण करता है।
इस महत्वाकांक्षा में अपने-आप में कोई दोष नहीं है। किसी भी देश को बेहतर सड़कें चाहिए, बड़े हवाई अड्डे चाहिए, तेज़ रेल चाहिए, आधुनिक शहर चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो नया संसद भवन भी चाहिए। भारत को निर्माण करना था। आज भी करना है।
लेकिन समस्या महत्वाकांक्षा में नहीं, महत्वाकांक्षा और उसके क्रियान्वयन के बीच पैदा होने वाली उस दूरी में है, जहाँ परियोजना पूरी तो हो जाती है, पर टिकाऊ नहीं बनती।
जब भी कोई सड़क धँसती है, पुल में दरार पड़ती है, इमारत टपकने लगती है या एक्सप्रेसवे बंद करना पड़ता है, तब लगभग हमेशा एक तकनीकी कारण मौजूद होता है। कहीं कहा जाता है कि बारिश असामान्य थी। कहीं पहाड़ी खिसक गई। कहीं नाले की क्षमता कम पड़ गई। कहीं रिकॉर्ड वर्षा हो गई। हर घटना का अपना एक इंजीनियरिंग सफाई मिल जाती है।
लेकिन जब वही ‘असाधारण’ घटनाएँ हर मानसून में, हर प्रदेश में और लगभग हर वर्ष दोहराई जाने लगें, तब समस्या मौसम नहीं रह जाती। तब बारिश केवल एक सुविधाजनक बहाना बन जाती है—उस योजना, उस निर्माण और उस रखरखाव की कमियों का, जिनका अनुमान पहले लगाया जाना चाहिए था। आखिर मानसून कब तक हर भूल का दोष अपने सिर लेता रहेगा?
शायद ‘विकसित भारत’ की रूपरेखा बनाते समय एक नज़र उन एशियाई देशों पर भी डालनी चाहिए थी, जहाँ बारिश भारत से कम चुनौती नहीं है।
मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर ने साढ़े नौ किलोमीटर लंबी ऐसी सुरंग बनाई, जो सामान्य दिनों में वाहनों के लिए सड़क का काम करती है और भारी वर्षा के समय बाढ़ का पानी अपने भीतर समेट लेती है।
वियतनाम के कैन थो शहर ने उन बस्तियों में बाढ़-रोधी ढाँचे खड़े किए, जो हर साल ज्वार और बारिश से डूब जाती थीं।
दक्षिण कोरिया ने बाढ़ नियंत्रण का कोई स्मारक नहीं बनाया। उसने एक ऐसी मास्टर प्लानिंग विकसित की, जो कैमरे में नहीं दिखती। भूमिगत जल-संग्रह क्षेत्र, अतिरिक्त जलाशय, डिजिटल निगरानी प्रणाली और ऐसा नेटवर्क, जो नालों के भरने से पहले ही उन्हें एक-दूसरे से मैसेज करा देता है।
इनमें से किसी देश भी ने ‘हैशटैग’ से विकास नहीं किया। किसी ने भी हर प्रोजेक्ट को राजनीतिक आयोजन नहीं बनाया। उन्होंने उस उबाऊ, अनाकर्षक और कैमरे से दूर रहने वाले बुनियादी ढाँचे में निवेश किया, जो वास्तव में किसी शहर को चलाता है। क्योंकि शासन का असली काम वही है—जो दिखाई कम देता है, लेकिन रोज़ काम आता है।
एक समय था जब मानसून केवल बारिश लेकर आता था। बूंदों की टप-टप में सुकून सुनाई देता था। काले बादल डर नहीं, राहत का वादा करते थे। भीगी मिट्टी की खुशबू, धुले हुए पेड़, भरती नदियाँ और तपती गर्मी के बाद ठंडी हवा—बारिश नए आरंभ का एहसास कराती थी।
अब बादल घिरते हैं तो सबसे पहले मन में चाय या मिट्टी की सौंधी गंध नहीं आती। पहला सवाल आता है—इस बार कौन-सी सड़क डूबेगी? कौन-सा अंडरपास गायब होगा? क्या पानी बेसमेंट तक पहुँचेगा? घर तक? दफ़्तर जाने के रास्ते तक? या पूरे दिन को निगल जाएगा?
बारिश का स्वभाव नहीं बदला है। उसका रोमांस आज भी वैसा ही है।
बदले हैं हमारे शहर, हमारा विकास। और उन्होंने ही बारिश का अर्थ बदल दिया है।
इसीलिए अब बरसते बादल केवल सुंदर नहीं लगते। वे आशंका भी साथ लेकर आते हैं। यही शायद आज के ‘विकसित भारत’ की सबसे बड़ी विडंबना है—हमने विकास की तस्वीरें बनाना सीख लिया है, लेकिन ऐसा शहर अभी तक नहीं बना पाए हैं, जो बारिश से, मौसम से डरना, घबराना छोड़ दे।
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