nayaindia Armenia Azerbaijan War अज़रबैजान ने मौके का फायदा उठाया
श्रुति व्यास

अज़रबैजान ने मौके का फायदा उठाया

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कत्लेआम तो टल गया लेकिन उसने बड़े पैमाने पर पलायन का स्वरुप ले लिया। पिछले हफ्ते अज़रबैजान ने अपनी ही नागोर्नो-काराबाख़ पर सैन्य आक्रमण किया जिसमें केवल एक दिन में 200 से अधिक लोग मारे गए। लेकिन अगले दिन ही युद्धविराम कायम हो गया और क्षेत्र में सक्रिय अर्मेनियाई अलगवावादी आत्समर्पण करने और अपने संगठन को भंग करने के लिए राजी हो गए। इसका मतलब हुआ अज़रबैजान की जीत। इस इलाके में तीन साल पहले तैनात की गई रूस की शांतिसेना की मध्यस्थता से हुए इस समझौते का एक अर्थ है नागोर्नो-काराबाख़ का अर्ध-स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा समाप्त हो जाना। अभी तक 13,000 लोग इस इलाके से आर्मेनिया के लिए पलायन कर चुके हैं। रास्ते में एक पेट्रोल स्टेशन पर हुए बम विस्फोट में 200 लोग घायल हो गए। आर्मेनिया की सीमा पर गाड़ियों की रेलमपेल है और देश के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान ने चेतावनी दी है कि क्षेत्र में नस्लीय सफाई जारी है। वहां के बहुत से लोग अपने जीवन में दूसरी या तीसरी बार शरणार्थी बन गए हैं।

नार्गोनो-काराबाख में आर्मेनियाई रहते हैं लेकिन यह औपचारिक रूप से अज़रबैजान का हिस्सा है और यहां पिछले तीन दशकों में खून-खराबे भरे दो बड़े युद्ध हो चुके हैं। सन् 2020 में हुए अंतिम युद्ध में अज़रबैजान ने कई ऐसे इलाकों पर कब्जा कर लिया जो सन् 1990 के दशक से आर्मेनियाई सुरक्षा बलों के नियंत्रण में थे। अज़रबैजान के हालिया हमले को भी ‘आतंकी विरोधी कार्यवाही’ कहा गया जिसका उद्धेश्य संवैधानिक व्यवस्था दुबारा स्थापित करना था। और अज़रबैजान ने एक दिन में वह हासिल कर लिया जो वह पिछले तीन दशकों में नहीं कर पाया था।

लेकिन नार्गोनो-काराबाख पर सैन्य आक्रमण और उसके नतीजे में एक मानवीय त्रासदी उत्पन्न कर अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहम एलियेव ने पश्चिम को नाराज कर लिया है। पिछले सप्ताह जर्मनी की विदेशमंत्री अन्नालेना बेयरबोक ने बाकू को “बलप्रयोग न करने के बार-बार दिए गए आश्वासन को तोड़ने, जिसके नतीजे में पहले से ही बदहाल लोगों को जबरदस्त कष्ट झेलना पड़ रहा है” का दोषी ठहराया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि अज़रबैजानी सरकार ‘निरंकुश’ है। पश्चिम में यह व्यापक मान्यता है कि शांति कायम रखने की जिम्मेदारी निभा रहे रूसियों ने अज़रबैजान की मदद की क्योंकि हाल के महीनों में आर्मेनिया का झुकाव पश्चिम की ओर बढ़ गया है। जहां तक अज़रबैजान का सवाल है, कहा जाता है कि वह कई सालों से कथित ‘कैवियार कूटनीति’ का सहारा ले रहा है अर्थात धन और उपहारों के जरिए यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

गार्जियन ने एक खबर में खुलासा किया है कि अज़रबैजान ने ब्रिटिश कंपनियों के एक गुप्त नेटवर्क के जरिए यूरोप में अपनी समर्थकों, पैरवी करने वालों और राजनीतिज्ञों को भेंट देने के लिए 2.9 अरब डालर देश से बाहर भेजे। यह पैसा लक्ज़री गुड्स और सेवाएं हासिल करने और अज़रबैजान के प्रभावशाली लोगों के लिए मनी लांडरिंग करने के लिए भी प्रयुक्त हुआ। अज़रबैजान की ‘कैवियार कूटनीति’ का नतीजा यह हुआ कि यूरोप ने 2020 के नार्गोनो-काराबाख युद्ध में बाकू द्वारा किए गए अत्याचारों को नजरअंदाज कर उससे नजदीकी कायम कर ली। सन् 2022 में रूस के अलावा पेट्रोलियम प्रदाय के नए विकल्प ढूंढ़ रहे यूरोपियन कमीशन के अध्यक्ष उरसुला वोन डेर लेयन बाकू पहुंची और उन्होंने अज़रबैजान को एक ‘महत्वपूर्ण’ एवं ‘विश्वसनीय’ ईधन सप्लायर बताते हुए उसकी प्रशंसा की और एक समझौते की घोषणा की जिसके अंतर्गत सन् 2027 तक ईयू द्वारा अज़रबैजान से खरीदी जाने वाली गैस की मात्रा दुगनी की जाएगी।

अज़रबैजान हालाँकि नार्गोनो-काराबाख के निवासियों को आश्वस्त कर रहा है कि उनका नुकसान नहीं किया जाएगा लेकिन ये लोग भयभीत हैं। अलगावादियों द्वारा युद्धविराम स्वीकारने और हथियार छोड़ने के लिए राजी होने के बाद से अब तक केवल 70 टन खाद्यान्न की राहत सामग्री की एक खेप को वहां आने की अनुमति दी गई है। आर्मेनियाई जातीय समूह के नेताओं का कहना है कि हजारों लोग छत और भोजन से महरूम हैं और तलघरों, स्कूल के भवनों और खुले में सोने पर मजबूर हैं।

जहां तक पश्चिम और अन्य देशों का सवाल है, वे कुछ खास नहीं कर रहे हैं। अज़रबैजान द्वारा नार्गोनो-काराबाख में आतंक और बल का सहारा लेने और यूक्रेन पर रूसी हमले के जारी रहने से ईयू और पश्चिम दुविधा में है। सर्दियां आ रही हैं और गैस की मांग बहुत बढ़ेगी और साथ ही ‘कैवियार’ की ज़रुरत भी। एक ओर हैं उनके अपने और अपनी जनता के हित और दूसरी ओर है इंसाफ का साथ देने का दबाव। एक न्यायपूर्ण दुनिया में – भले ही हम उसे काल्पनिक मानें – अज़रबैजान पर उसके द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के चलते तत्काल प्रतिबंध लगा दिए गए होते।‘आशावादी‘ आर्मेनियाईयों की यही मांग है कि अज़रबैजान पर सख्त प्रतिबंध लगाए जाएं जो अपनी गैस और तेल की कमाई का उपयोग अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कर रहा है। लेकिन अब तक पश्चिम अज़रबैजान पर प्रतिबंध लगाने की संभावनाओं पर ‘विचार’ ही कर रहा है। और पश्चिम के नेताओं के विचारों में डूबे होने के कारण साधी गई चुप्पी का प्रभाव दुनिया में हो रही घटनाओं पर साफ नजर आ रहा है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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