राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

बेटी बचाओ, मगर बोलने मत दो!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समझते हैं कि राजनीति केवल नीतियों से नहीं, कथाओं से भी चलती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भारत को जो सबसे प्रभावशाली कहानी सुनाई, वह बेटियों की कहानी थी। जनवरी 2015 में पानीपत से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान शुरू करते हुए वे केवल कन्या भ्रूण हत्या रोकने की बात नहीं कर रहे थे। वे भारतीय समाज की उस पुरानी सोच को चुनौती दे रहे थे, जिसमें बेटी को पराया धन माना जाता था। उनका संदेश स्पष्ट था—बेटी को बचाइए, पढ़ाइए, अवसर दीजिए और उसे बराबरी का नागरिक बनाइए।

उस समय देश निर्भया आंदोलन की स्मृतियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। महिलाओं ने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर कर केवल न्याय नहीं, बल्कि निर्भय होकर सार्वजनिक जीवन जीने का अधिकार भी मांगा था। ऐसे समय नरेंद्र मोदी एक ऐसे नेता की तरह उभरे, जिन्होंने उस भय को भी समझा और उससे आगे का सपना भी दिखाया। “बेटी बचाओ” ने सुरक्षा की चिंता को संबोधित किया, “बेटी पढ़ाओ” ने भविष्य का रास्ता खोला। बेटी केवल संरक्षण की पात्र नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की सहभागी होगी। यही उस अभियान की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति थी।

यही कारण था कि अगले वर्षों में महिलाओं का बड़ा वर्ग मोदी के साथ खड़ा दिखाई दिया। उज्ज्वला, शौचालय, जनधन और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं ने उस भरोसे को मजबूत अवश्य किया, लेकिन रिश्ता केवल योजनाओं का नहीं था। मोदी ने महिलाओं को नए भारत की कहानी का सक्रिय पात्र बनाया था, केवल लाभार्थी नहीं।

लेकिन हर कहानी का एक दूसरा अध्याय भी होता है।

बारह वर्ष बाद वही बेटियां बड़ी हो चुकी हैं। शिक्षा ने उन्हें केवल डिग्री नहीं दी; उसने उन्हें अपनी राय भी दी है। और स्वतंत्र राय किसी भी सरकार के नियंत्रण में नहीं होती। पिछले सप्ताह जब अनेक छात्राओं और युवाओं ने प्रधानमंत्री के प्रति खुलकर असहमति व्यक्त की, तब बहस केवल उनकी भाषा पर नहीं हुई। असली प्रश्न यह था कि सत्ता असहमति का सामना कैसे करती है। यहीं “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” की कहानी पहली बार अपने ही नए पात्रों से टकराती दिखाई दे रही है।

इसके केंद्र में कहानी का एक मार्मिक चेहरा आज पंद्रह वर्ष की रुचिका सिंह है। उसका पहला वीडियो इसलिए वायरल हुआ क्योंकि उसने प्रधानमंत्री के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था। भाषा निश्चित ही आलोचना, भर्त्सना के योग्य थी। उसे समझाया जा सकता था, डांटा जा सकता था। लेकिन तीन धाराओं में एफआईआर दर्ज होना बहस को भाषा से उठाकर सत्ता और भय के प्रश्न तक ले गया है।

असल दृश्य पहला वीडियो नहीं था। दूसरा था। कुछ ही दिनों बाद सामने आई वही लड़की पहचान में नहीं आती थी। हाथ जुड़े हुए। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे। निगाहें झुकी हुईं। आवाज़ बुझी हुई। जिस चेहरे पर कुछ दिन पहले किशोर उम्र की बेलौस चुनौती दिखाई देती थी, वहां अब भय साफ़ पढ़ा जा सकता था। पहले वीडियो में एक ऐसी बच्ची थी जिसे अपनी सीमा का अंदाज़ा नहीं था। दूसरे वीडियो में वही बच्ची किसी अदृश्य सीमा को पार कर देने के डर से कांपती दिखाई दी।
बच्चे को अनुशासन सिखाना और उसे भय सिखा देना, दोनों अलग बातें हैं। कैमरा कभी-कभी दोनों के बीच का अंतर छिपा देता है, लेकिन समाज को उसे पहचानना चाहिए।

रुचिका अकेली नहीं थी। श्रद्धा भी थी। उसने रैपिड एक्शन फोर्स का मज़ाक उड़ाते हुए ऐसी भाषा इस्तेमाल की, जिसने सोशल मीडिया पर उसके खिलाफ़ गालियों का तूफ़ान खड़ा कर दिया। उसने वीडियो हटा लिया। फिर माफ़ीनामा भी जारी किया। उसके चेहरे पर भी वही थकान थी, वही टूटन, जो रुचिका के दूसरे वीडियो में दिखाई दी।

लेकिन असली बात बाद में सामने आई।

बीबीसी हिंदी से बातचीत में श्रद्धा ने कहा कि जंतर-मंतर पर हजारों अनजान लोगों, लड़कों और प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर उसे एक बार भी डर नहीं लगा। वह बहस करती रही, नारे लगाती रही, रील बनाती रही। लेकिन जब उसने मोबाइल उठाया और स्क्रीन के पीछे बैठे लोगों की दुनिया देखी, तब उसका साहस टूट गया। यह कहते-कहते उसकी आवाज़ भर्रा गई कि सड़क पर मौजूद अजनबियों ने नहीं, बल्कि इंटरनेट पर बैठे लोगों ने उसे सबसे ज़्यादा डराया।
यहीं पिछले एक दशक का सबसे बड़ा सामाजिक परिवर्तन दिखाई देता है। 2012 में निर्भया महिलाओं के लिए सड़क भय का प्रतीक थी और घर अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान।

2026 में तस्वीर उलट गई। जंतर-मंतर की सड़क पर युवतियां देर रात तक बैठीं, हंसीं, बहस की, गीत गाए और उन्हें अपने आसपास बैठे हजारों लोगों के बीच लगभग सुरक्षा का एहसास हुआ। वहां शोर था, संगीत था, मीम थे, हंसी थी, कभी फूहड़पन भी था, लेकिन उसके भीतर अपनी आवाज़ खोजने का उत्साह भी था। जीवन के पहले आंदोलन में कोई तैयार राजनीतिक दर्शन लेकर नहीं आता। लोग देखते हैं, सुनते हैं, बहस करते हैं और धीरे-धीरे समझते हैं कि लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि बोलने का अधिकार भी है।

लेकिन घर लौटने के बाद, अपने कमरे में, अपने मोबाइल के सामने वे अकेली पड़ गईं।
वहीं से बलात्कार की धमकियां आईं। वहीं से हत्या की धमकियां आईं। वहीं से माता-पिता को निशाना बनाने वाले संदेश आने लगे। यह केवल सोशल मीडिया की गंदगी नहीं है। यह लोकतंत्र की नई चुनौती है।

जिस राजनीति ने कभी महिलाओं की सुरक्षा को अपना सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न बनाया था, उसी दौर में आज राजनीतिक असहमति रखने वाली युवतियों को चुप कराने के लिए यौन हिंसा की धमकी सबसे प्रभावी हथियार बनती जा रही है। यह केवल कुछ ट्रोल अकाउंट्स का मामला नहीं है। यह उस सार्वजनिक संस्कृति का आईना है, जिसमें असहमति का जवाब तर्क से कम और डर से अधिक दिया जाने लगा है।

आज इंटरनेट सड़क से अलग कोई दुनिया नहीं है। आधी रात को मोबाइल पर मिला बलात्कार का संदेश अगले दिन किसी लड़की के कदमों का आत्मविश्वास बदल देता है। माता-पिता के खिलाफ़ आई धमकी तय करती है कि वह अगली रैली में जाएगी या नहीं। हजारों गालियां मिलकर वह काम कर देती हैं, जो पुलिस की लाठियां या बैरिकेड भी नहीं कर पाते। इंसान स्वयं अपनी आवाज़ पर पहरा लगाने लगता है।
यही सबसे गहरी चोट है।

आज भारत की एक नई पीढ़ी सामने है। वह पढ़ी-लिखी है, इंटरनेट के साथ बड़ी हुई है, राजनीति पर राय रखती है और सत्ता से सहज भयभीत नहीं होती। वह रील बनाती है, मीम बनाती है, व्यंग्य करती है। कभी उसकी भाषा मर्यादित होती है, कभी नहीं; कभी वह सही होती है, कभी गलत। लेकिन उससे पहले की पीढ़ियों की तरह उसके भीतर केवल पद के कारण पैदा होने वाली सहज श्रद्धा नहीं है।

रुचिका की कहानी है तो उर्वशी पलांदुरकर की भी कहानी है। जब भाजपा छत्तीसगढ़ ने उसका नृत्य वाला वीडियो साझा कर जेन-ज़ी की मानसिकता पर सवाल उठाने की कोशिश की, तब उर्वशी ने शर्मिंदा होने से इनकार कर दिया। उसने व्यंग्य का जवाब व्यंग्य से दिया। पहली नज़र में रुचिका और उर्वशी अलग दिखती हैं—एक डर गई, दूसरी नहीं। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से दोनों एक ही परिवर्तन की अभिव्यक्तियां हैं।

दोनों “बेटी पढ़ाओ” की विफलता नहीं, उसकी सबसे स्वाभाविक सफलता हैं। क्योंकि जिस दिन आप किसी बेटी को शिक्षा देते हैं, उसी दिन यह अधिकार भी छोड़ देते हैं कि वह आगे चलकर क्या सोचेगी? उसे सपने देखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, लेकिन उसके सपनों और उसकी राय की सीमा तय नहीं की जा सकती। उसकी निर्भीकता का उत्सव तब तक ही नहीं मनाया जा सकता, जब तक वह आपकी प्रशंसा करे; उसकी असहमति भी उसी निर्भीकता का हिस्सा है।

इक्कीसवीं सदी की बेटी तैयार करके उससे अठारहवीं सदी जैसी आज्ञाकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती।

शायद हर सफल कहानीकार की नियति यही होती है। एक दिन उसके पात्र बड़े हो जाते हैं। वे उसकी कहानी को दोहराते नहीं, उसमें अपने अध्याय जोड़ते हैं। सरकारें नागरिकों को शिक्षित कर सकती हैं, अवसर दे सकती हैं और आत्मविश्वास जगा सकती हैं, लेकिन वही आत्मविश्वास एक दिन स्वतंत्र राजनीतिक चेतना में बदल जाता है।

इसलिए पंद्रह वर्ष की किसी लड़की की अभद्र भाषा प्रधानमंत्री को अप्रिय लग सकती है। उसकी आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन उससे कहीं अधिक चिंता उस भय की होनी चाहिए, जो कुछ दिनों बाद उसी लड़की की आंखों में उतर आया।

आख़िर कहानी “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” की थी। उसमें कहीं यह वादा नहीं था कि पढ़ी-लिखी बेटी हमेशा कहानीकार से सहमत ही रहेगी। उलटे शायद उसकी सबसे बड़ी सफलता यही है कि अब वह अपनी कहानी स्वयं लिखना चाहती है।

Tags :

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

Leave a comment