कॉकरोच अब राष्ट्रीय बहस है। किसने सोचा था कि एक बात भारत का वैश्विक हल्ला बनाने वाली होगी? चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद इंस्टाग्राम और X पर ऐसा व्यंग्य अभियान चला, जो अब राजनीतिक तमाशे में समा रहा है। टीवी पर बहसें हैं, सेंसरशिप के आरोप हैं, ट्रेडमार्क आवेदन हैं, साइबर फ्रॉड की चेतावनियाँ हैं, बॉलीवुड का समर्थन है। जो बात कुछ दिनों की क्षणिक बहस बनकर खत्म हो जानी चाहिए थी, वह आश्चर्यजनक गंभीरता के साथ जनचेतना की नसों में घुल गई है।
और यह मामूली बात नहीं है। और शायद उस कारण से नहीं, जैसा अधिकांश लोग मान रहे हैं।
कॉकरोच का व्यंग्य अब मज़ाक नहीं, सामाजिक यथार्थ जैसा लगने लगा है। वह सार्वजनिक संस्कृति में भावनात्मक गंभीरता के साथ मौजूद है। जो चुटकुला सत्ता को असहज करने के लिए था, वह भीतर की ओर मुड़ गया। जनता खुद पंचलाइन बन गई।
मीम, दीवार-लेखन और प्रदर्शनकारी आक्रोश के बीच कहीं एक विचित्र बदलाव दिख रहा है। कॉकरोच को सत्ता का उपहास बनना था। लेकिन लाखों लोग — राजनेता, इन्फ्लुएंसर, शिक्षित मध्यवर्ग के हिस्से — इस पहचान को अजीब सहजता से अपनाने लगे हैं। जाहिर है, अपमान इतना गहरे सार्वजनिक भागीदारी में उतरा है कि लोगों ने रूपक का प्रतिरोध करना छोड़ दिया और उलटे उसे वैधता देने लगे हैं।
व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है, जब वह ऊपर प्रहार करे। लोकतंत्र को उसकी ज़रूरत भी होती है। लेकिन जब दस लाख से अधिक लोग उत्साह से खुद को ऐसे कीड़े से जोड़ने लगें, जो सड़ांध में रेंगकर जीवित रहता है और चप्पल के नीचे कुचला जा सकता है, तब उपहास सत्ता पर नहीं रह जाता। तब जनता भी मज़ाक बन जाती है।
चिंता की असली वजह यही है। क्योंकि लगता है कि आधुनिक भारत धीरे-धीरे हास्य और अपमान के बीच फर्क करने की क्षमता खो रहा है।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को बेरोज़गारी, आकांक्षा और आर्थिक निराशा पर गंभीर राजनीतिक बहस शुरू करनी चाहिए थी। भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादियों में से एक है, और साथ ही उन युवाओं की भी, जो डिग्रियों और गायब होती नौकरियों के बीच फँसे हैं। यह टिप्पणी देश को इतना असहज कर देनी चाहिए थी कि वह गंभीरता माँगे। सभी गंभीरता से सोचने लगें।
लेकिन उसकी बजाय सारी ऊर्जा मीम संस्कृति में घुल गई। प्रोफ़ाइल तस्वीरों, दीवार-चित्रों और इंटरनेट प्रदर्शन में बदल गई। टीवी बहसें अब साँस रोककर “कॉकरोच जनता पार्टी” को Gen Z की राजनीतिक भाषा बता रही हैं, जैसे गणराज्य ने किसी कीड़े के भीतर क्रांतिकारी चेतना खोज ली हो। वरिष्ठ पत्रकार संपादकीय लिख रहे हैं कि “कॉकरोच में उम्मीद है।”
एक समय था, जब गुस्सा सड़क खोजता था। आज भी उसकी झलक कभी-कभी दिख जाती है — पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के छोटे समूह, परीक्षा केंद्रों के बाहर युवा संगठन, भर्ती में देरी और संस्थागत विफलता पर बिखरे प्रदर्शन। लेकिन अब ये राजनीतिक वातावरण नहीं, अपवाद जैसे लगते हैं।
भारत का बड़ा असंतोष अब ऑनलाइन पैदा होता है। मीम से संचालित, दृश्यात्मक विद्रोह से भरा, भावनात्मक थकान से लदा, हैशटैग और विडंबनापूर्ण निराशा से बना हुआ। गुस्सा असली हो सकता है। थकान भी वास्तविक हो सकती है। लेकिन विद्रोह अजीब तरह से आरामदेह हो गया है। उसे प्रतिरोध का सौंदर्य चाहिए, प्रतिरोध की असुविधा नहीं।
और यही भारत की त्रासदी है।
सस्ता डेटा, स्थायी इंटरनेट और सोशल मीडिया की बाढ़ ने भारत में निराशा की अभिव्यक्ति ही बदल दी है। आज का बेरोज़गार युवा केवल बेरोज़गार नहीं है। वह doomscrolling कर रहा है, प्रदर्शन कर रहा है, ऑनलाइन पहचान गढ़ रहा है, ऐसे संसार में जहाँ ध्यान मिल जाना ही उपलब्धि जैसा लगता है। पूरे दिन कंटेंट देखने और बनाने में निकल जाते हैं। खाना बनाना प्रदर्शन है। उदासी भी प्रदर्शन है। असहमति भी अब engagement के हिसाब से तैयार होकर आती है।
इसलिए जब कोई अपमानजनक रूपक सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, इंटरनेट पहले उसे सौंदर्य में बदलता है, फिर प्रतिरोध में।
इसीलिए यह मानना कठिन है कि कॉकरोच आंदोलन युवा विद्रोह या उम्मीद का प्रतीक है। यदि भारतीय युवा वास्तव में सोशल मीडिया जितना राजनीतिक रूप से क्रोधित होते, तो सड़कें इंस्टाग्राम से अधिक साफ़ दिखातीं। चुनाव हैशटैग से अधिक स्पष्ट संकेत देते।
लेकिन सच्चाई, वास्तविकता असुविधाजनक है। भारत के बड़े हिस्से का युवा मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को उतनी तीव्रता से खारिज नहीं कर रहा, जितना इंटरनेट बताता है। वह उससे भावनात्मक, सांस्कृतिक और दृश्यात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। नरेंद्र मोदी और भाजपा की लोकप्रियता इसी विरोधाभास को समझाती है। इसलिए चिंता नहीं होती।
युवा बेरोज़गारी, ठहरी हुई आय और घटते अवसरों की शिकायत कर सकते हैं, लेकिन वे शक्ति के तमाशे से भी आकर्षित हैं। उन्हें आक्रामक राष्ट्रवाद पसंद है। भू-राजनीतिक ठसक पसंद है। नेता-केंद्रित राजनीति पसंद है। उन्हें प्रधानमंत्री का पुतिन और ट्रंप को गले लगाना, जॉर्जिया मेलोनी को Melody टॉफ़ी देना, वैश्विक मंचों पर छा जाना और सैन्य अभियानों को सिनेमाई नाम देना आकर्षित करता है।
क्योंकि राजनीति आज वैचारिक या प्रशासनिक नहीं रह गई। वह बॉलीवुड जैसी सिनेमाई हो चुकी है। और यह पीढ़ी उसी भाषा में बड़ी हुई है।
भारत की राजनीतिक अभिव्यक्ति अब विचारधारा से कम, विडंबना से अधिक चलती है। संगठन से कम, एल्गोरिद्म से अधिक। क्रांतिकारी स्पष्टता से कम, मीम संस्कृति से अधिक। यही कारण है कि कॉकरोच आंदोलन इतनी तेजी से फैला। इसलिए नहीं कि भारत ने क्रांतिकारी ऊर्जा खोज ली, बल्कि इसलिए कि विडंबना राजनीतिक रूप से थकी हुई पीढ़ी की सबसे सुरक्षित भाषा बन चुकी है।
यहीं मामला बेचैनी पैदा करने वाला और गहरा है।
व्यंग्य का काम सत्ता को बेनकाब करना है, अपमान को सामान्य बनाना नहीं। सत्ता पर हँसना एक बात है। लेकिन जब कोई पीढ़ी सड़ांध और जीवित बचने के मीमों के माध्यम से अपनी ही बेबसी का रोमानीकरण करने लगे, तब मामला बदल जाता है।
कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ने वाले 18 लाख लोग मानते हैं कि वे मुख्य न्यायाधीश और व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रहे हैं। लेकिन व्यंग्य भीतर की ओर मुड़ चुका है। सत्ता की ओर उठी उँगली घूमकर उसी जनता की ओर लौट आई है, जिसने उसे उठाया था।
यह विद्रोह नहीं है। यह विडंबना के वेश में आत्मसमर्पण है। बेबसी है।
यहाँ भारत की सामूहिक आत्म-छवि का भी विचित्र विरोधाभास खुलता है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को “hellhole” बताता पोस्ट रिपोस्ट किया था, तब लोग आक्रोशित थे। जब किसी नॉर्वेजियन अख़बार ने नरेंद्र मोदी और भारत का चित्रण पुराने औपनिवेशिक “साँप सपेरे” रूपक से किया, तब उसे नस्लवादी, ओरिएंटलिस्ट और अपमानजनक कहा गया था। कई लोगों की यह आवाज़ थी कि वह भारत को अव्यवस्था और तमाशे के कैरिकेचर में बदलना बंद करे। और वह माँग सही थी।
लेकिन जब हम स्वयं भारतीयों की छवि कॉकरोच के रूप में उत्सव की तरह मनाने लगें, तब हम क्या कर रहे होते हैं?
किस क्षण व्यंग्य सत्ता का अपमान करना छोड़कर गणराज्य का अपमान करने लगता है?
त्रासदी यह नहीं कि मुख्य न्यायाधीश ने अविवेकी टिप्पणी कर दी। लोकतंत्र ऐसी टिप्पणियाँ झेल लेते हैं। दुनिया भी शायद खुलकर नहीं हँस रही कि भारत ने एक अजीब मीम पैदा कर लिया। हर लोकतंत्र अपनी हास्यास्पद चीज़ें पैदा करता है। अमेरिका के पास षड्यंत्र पंथ हैं। ब्रिटेन के पास राजनीतिक रंगमंच है।
त्रासदी यह है कि आज का भारत शायद यह तय नहीं कर पा रहा कि वह अपमान का मज़ाक उड़ा रहा है या धीरे-धीरे उसे अपनी पहचान के रूप में स्वीकार कर रहा है।
और यह बात हमें बेचैन करनी चाहिए।
राष्ट्र वल इस आधार पर नहीं आँके जाते कि उनके नेता विदेशों में कैसी छवि बनाते हैं या उनकी अर्थव्यवस्था कैसी चलती है। वे इस आधार पर भी आँके जाते हैं कि उनके नागरिक सामूहिक रूप से कैसी मानसिक छवि प्रस्तुत करते हैं।
भारत पहले ही एक असुविधाजनक विरोधाभास के साथ जी रहा है। एक ओर उभरती महाशक्ति का प्रदर्शन, दूसरी ओर दुनिया भर के इमिग्रेशन काउंटरों और दूतावासों से सामना होता कठोर यथार्थ। कॉकरोच क्षण इसमें तीसरी परत जोड़ता है — ऐसी नागरिकता, जो यह तय नहीं कर पा रही कि वह अपमान का प्रतिरोध कर रही है या उसे सौंदर्य में बदल रही है।
कॉकरोच जनता पार्टी के हास्य के नीचे छिपा वास्तविक प्रश्न यही है। और यह कहीं अधिक गंभीर उत्तर माँगता है। इस देश के कॉकरोच को विद्रोह का राष्ट्रीय शुभंकर बनाने से पहले शायद यह पूछ लेना चाहिए कि आखिर वह मना क्या रहा है।
सत्ता का उपहास या स्वयं का?


