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नमस्कार, मैं हरिशंकर व्यास, हमारे प्रधानमंत्री और उनकी अंध भक्ति में लीन भारतीय चाहे जितना भी स्वदेशी का राग अलापे। लेकिन भारत सिर्फ बाजार है। यहां मेहनत, ईमानदारी और पुरुषार्थ की बजाय सभ्यता-संस्कृति से लेकर राजनीति तक हर जगह धंधे यानी पैसे और फायदे वाली ही सोच। इसीलिए कॉलम अपन तो कहेंगे में इस बार मेरे विचार का शीर्षक है…भारत अब सिर्फ बाजार!
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