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दबाव की राजनीति में सीधे अखिलेश शामिल

विपक्षी गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक के भविष्य को लेकर एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है और साथ ही यह भी सवाल खड़ा हो गया है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच जो तनातनी चल रही है उसका अंत नतीजा क्या होगा? अभी तक उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच जो तनाव था उसमें प्रदेश स्तर के नेता शामिल थे। कांग्रेस के प्रदेश नेताओं की ओर से बयान दिया जाता था तो उसका जवाब भी सपा के प्रदेश के नेता देते थे। पार्टी के बड़े नेता खामोश थे। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा तो नहीं ही बोल रहे थे प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे ने भी चुप्पी साधी थी। कभी अजय राय तो कभी इमरान मसूद जैसे नेता बयान दे रहे थे। लेकिन अब सीधे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव दबाव की इस राजनीति में शामिल हो गए हैं। सो, अब मामला दिलचस्प हो गया है।

अखिलेश यादव मंगलवार, 27 जनवरी को कोलकाता गए और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिले। उसके बाद उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। अखिलेश ने बहुत साफ शब्दों में कहा कि भाजपा से सिर्फ ममता बनर्जी लड़ सकती है। उन्होंने भाजपा के खिलाफ ममता बनर्जी के तेवरों की प्रशंसा की और समाजवादी पार्टी का पूरा समर्थन देने का ऐलान किया। इससे पहले दोनों नेताओं के बीच करीब 40 मिनट बंद कमरे में वार्ता हुई थी। उसमें ममता और अखिलेश दोनों के करीबी रहे किरणमय नंदा भी मौजूद थे। बैठक के बाद अखिलेश ने ममता बनर्जी के नेतृत्व की जम कर तारीफ की और साथ ही यह भी कहा कि इस बार फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस जीतेगी।

ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के प्रति इस तरह के समर्थन की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी। वे किसी अन्य कार्यक्रम में हिस्सा लेने नहीं गए थे। वे सिर्फ ममता बनर्जी से मिलने गए थे। तभी उन्होंने जो कहा उसके गहरे मायने हैं। एक तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी के ऊपर दबाव बनाया कि वह अगर ज्यादा सीटों की मांग को लेकर कोई दबाव बनाती है तो उसे ममता बनर्जी के जरिए न्यूट्रालाइज किया जा सके। ध्यान रहे लोकसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी के कहने पर उनकी पार्टी के ललितेश पति त्रिपाठी को टिकट दिया था। हालांकि वे जीत नहीं पाए। गौरतलब है कि कांग्रेस के नेता बार बार दावा कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस गठबंधन को मिली जीत राहुल गांधी की मेहनत का नतीजा है। इस आधार पर वे विधानसभा में ज्यादा सीट मांग रहे हैं। अखिलेश ने विपक्षी गठबंधन में लीडरशिप का मुद्दा उठा कर कांग्रेस और राहुल गांधी को दबाव में ला दिया है। कांग्रेस हर साल में चाहेगी कि तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल का चेहरा हो। इसके लिए पार्टी के नेता कोई भी समझौता करने को तैयार होंगे। इसलिए अखिलेश ने जो कहा वह दबाव का बड़ा दांव है। ममता बनर्जी दो कारणों से इस सवाल पर चुप हैं। एक तो नेता बनने की महत्वाकांक्षा उनकी भी है। अगर इस बार बंगाल में उनकी पार्टी जीतती है तो वे निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ नेतृत्व करना चाहेंगी। दूसरे, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों के लिए चल रही ओवैसी, नौशाद सिद्दीकी, हुमायूं कबीर, बदरूद्दीन अजमल की राजनीति में अखिलेश का समर्थन ममता को फायदा पहुंचाएगा।

By NI Political Desk

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