धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से आखिरकार इस्तीफा दिया। लेकिन उनका इस्तीफा देश के युवाओं और प्रदर्शन कर रहे लोगों को ऊपर अहसान करने के अंदाज में दिया गया। उन्होंने किसी बात की जवाबदेही नहीं ली। प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी तो सामान्य फॉर्मेट में थी, जिसमें किसी का इस्तीफा जाता है। लेकिन ‘युवा साथियों’ के नाम दो पन्नों की चिट्ठी में उन्होंने यह बताया कि शिक्षा के मामले में, युवाओं के मामले में और आंदोलन के मामले में उनका कितना बड़ा योगदान है। उन्होंने यह भी कहा कि पेपर लीक होने के बाद उन्होंने कितनी तत्परता से सारी चीजों को ठीक करने का प्रयास किया। धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देने का कारण यह बताया कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन का दुरुपयोग हो सकता है। यानी उनसे कोई गड़बड़ी नहीं हुई फिर भी इस्तीफा इसलिए दे रहे हैं क्योंकि यह आशंका है कि प्रदर्शन का बेजा इस्तेमाल किया जा सकता है और अराजक गतिविधियों को अंजाम दिया जा सकता है।
याद करें कैसे नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लिया था। उन तीन कानूनों के खिलाफ किसान एक साल से आंदोलन कर रहे थे और करीब सात सौ लोग उसमें अपनी जान गंवा चुके थे। सरकार ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया था। लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब का चुनाव नजदीक आया तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय टीवी पर आकर देश को संबोधित किया और तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया। उस समय भी उन्होंने नहीं स्वीकार किया कि कानूनों में कोई कमी है। उन्होंने कहा कि तपस्या में कोई कमी रह गई होगी कि किसान समझ नहीं पाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि तीनों कानून किसानों की मदद और भलाई के लिए थे। लेकिन किसानों को गुमराह किया जा रहा है, जिसकी वजह से वे इसका विरोध कर रहे हैं इसलिए सरकार इसे वापस ले रही है। उन्होंने नहीं माना कि कानून में कमी है।
सोचें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण और धर्मेंद्र प्रधान की चिट्ठी में क्या कोई फर्क है? कोई फर्क नहीं है। प्रधानमंत्री ने किसानों को नासमझ और लोगों के बहकावे में आ जाने वाला बताया तो धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों और युवाओं को नासमझ और लोगों के बहकावे में आने वाला बताया। समझदार सिर्फ मोदी और प्रधान हैं, जिन्होंने किसानों, छात्रों और युवाओं के हित में इतना काम किया और नासमझ बाकी सारे लोग हैं, जिनको इनका काम समझ में नहीं आया। बहरहाल, प्रधान ने तो हालात न बिगड़ें और छात्रों के आंदोलन का बेजा इस्तेमाल न हो इसलिए इस्तीफा दिया तो अब यह तय करना होगा कि पेपर लीक की जिम्मेदारी किसकी है और छात्रों की मुसीबतों का जिम्मेदार कौन है? आखिर प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते दो बार नीट यूजी का पेपर लीक हुआ और छात्रों को परेशानी उठानी पड़ी तो किसी की जिम्मेदारी तो तय होगी? छात्र, युवा आदि तो धर्मेंद्र प्रधान को ही जिम्मेदार मानते हैं, भले वे कुछ भी कहते रहें।
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