बहुत आदर्श स्थितियों के बावजूद दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन यानी डूसू का चुनाव कांग्रेस हार गई। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को सेंट्रल पैनल की चार में से एक भी सीट नहीं मिली। पिछले साल के चुनाव में एनएसयूआई ने एक सीट जीती थी और उससे पहले दो सीटें मिली थीं। यानी दो से एक पर और फिर शून्य पर आ गई। उपाध्यक्ष के पद पर कांग्रेस से बागी होकर निर्दलीय लड़े दीपांशु शौकीन सबसे ज्यादा वोट पाकर सबसे ज्यादा वोट से जीते। उनको 30 हजार से ज्यादा वोट आए, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार वीर चतरथ को चार हजार से कुछ ज्यादा वोट आया, जो नोटा से भी कम है।
सबसे ज्यादा चर्चा इसी सीट की हो रही है। मीडिया से लेकर राजनीतिक बिरादरी में सब कांग्रेस की और खास कर एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया कुमार की धुनाई कर रहे हैं कि इतने मजबूत उम्मीदवार दीपांशु शौकीन को उन्होंने टिकट नहीं दी, जो निर्दलीय लड़ कर 30 हजार वोट लाया और जिसको टिकट दी उसे चार हजार वोट मिले। सवाल है कि क्या कन्हैया ने वीर चतरथ को टिकट दी? वीर के पिता मनीष चतरथ हैं, जो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव हैं और कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी हैं। उनके बेटे की टिकट भला कौन रोक सकता था! उपाध्यक्ष की टिकट पहले से तय थी। तभी जब दीपांशु ने उपाध्यक्ष की टिकट मांगी तो कांग्रेस को मना करना पड़ा।
अब सवाल है कि दीपांशु ने उपाध्यक्ष की टिकट क्यों मांगी? यह सचमुच हैरान करने वाली बात है। इतना लोकप्रिय छात्र नेता, जो सत्य निकेतन की बिल्डिंग गिरने के बाद छात्रों की सुरक्षा की गारंटी होने तक खाली पैर घूम रहा हो और अपार समर्थन हासिल कर रहा हो वह उपाध्यक्ष की टिकट क्यों मांगेगा? उसे तो अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहिए! हकीकत यह है कि कांग्रेस ने दीपांशु का अध्यक्ष की ही टिकट ऑफर की थी। लेकिन चूंकि अध्यक्ष पद के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी ने यश डबास को टिकट दे दी थी इसलिए बताया जा रहा है कि दीपांशु ने यह कहते हुए अध्यक्ष की टिकट से इनकार किया कि यश डबास उसी की गोत्र का जाट है। जाट के खिलाफ जाट कैसे लड़े इसी सोच में दीपांशु ने उपाध्यक्ष की टिकट मांगी और नहीं मिली तो निर्दलीय लड़ा।
दीपांशु के इनकार के बाद कांग्रेस ने विजय शंकर मीणा को अध्यक्ष की टिकट दी। अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार को अध्यक्ष की टिकट देना बड़ा फैसला था। विजय शंकर ने एबीवीपी के यश डबास को कड़ी टक्कर दी और अंतिम फैसला सिर्फ दो हजार वोट से हुआ। कांग्रेस इकोसिस्टम के लोग प्रचार कर रहे हैं कि एनएसयूआई के अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने मीणा को टिकट दिलाई। यानी उसमें एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया का रोल नहीं है। सोचें, क्या चुनिंदा व्याख्या है! अध्यक्ष का उम्मीदवार अच्छा लड़ा तो टिकट विनोद जाखड़ ने दिलाई और उपाध्यक्ष का उम्मीदवार, जो कांग्रेस के एक बड़े नेता का बेटा है वह खराब लड़ा तो उसकी टिकट कन्हैया ने कराई! असल में यह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की समस्या है, जहां नेताओं के बच्चे लायक हों या नहीं उनको टिकट देने का चलन है। इसलिए वीर चतरथ को टिकट मिली। दूसरे, दिल्ली यूनिवर्सिटी की जाट राजनीति के कारण एनएसयूआई के मजबूत जाट नेता ने टिकट से इनकार किया। अगर कांग्रेस को चतरथ को टिकट देने की मजबूरी नहीं होती और दीपांशु को टिकट देती तो हो सकता है कि वह अध्यक्ष औऱ उपाध्यक्ष दोनों पद जीत जाती।
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