दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ यानी डूसू के चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के बुरी तरह से हारने और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के चार में से तीन सीटों पर जीत जाने के बाद ऐसी व्याख्या की जा रही है, जैसे जंतर मंतर पर हुआ छात्रों का आंदोलन बेअसर रहा और देश का ‘जेन जी’ भाजपा और संघ के साथ है। लेकिन यह असली तस्वीर नहीं है। जंतर मंतर का आंदोलन बेअसर नहीं हुआ है और न छात्रों का गुस्सा शांत हुआ है। उन्होंने अलग तरह से अपने गुस्से को जाहिर किया है। यह साफ दिख रहा है कि एबीवीपी के लिए कोई लहर नहीं थी। वह प्रबंधन और विपक्ष के वोटों के बंटवारे की वजह से जीत गई। यह कोई निर्णायक जीत नहीं है। अगर कोई लहर होती तो ऐसा नहीं होता कि उपाध्यक्ष के पद पर उसका उम्मीदवार 16 हजार वोट से हारता। एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव का चुनाव भी गिर पड़ के जैसे तैसे ही जीता है।
तभी इस पूरे मामले में कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की बड़ी जिम्मेदारी बनती है। अगर विपक्ष ने तालमेल कर लिया होता और एक होकर लड़ते तो डूसू की सभी चार सीटों पर विपक्ष की जीत होती। सोचें, कांग्रेस के सुप्रीम लीडर राहुल गांधी इन दिनों ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कर रहे हैं लेकिन देश की छात्र राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव में दिलचस्पी नहीं ली। उन्होंने सीपीआई माले के छात्र संगठन आईसा की नेहा बोरा के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनसे तालमेल की बात वे कर सकते थे। वे सीधे दीपांकर भट्टाचार्य से भी बात कर सकते थे। लेकिन लेफ्ट को गठबंधन बना कर अलग लड़ने दिया गया। तभी खराब माहौल के बावजूद एबीवीपी जीती।
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो अध्यक्ष पद पर यश डबास को 24,576 और विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। यश 2,053 वोट से जीते, जबकि लेफ्ट की अनन्या रतूड़ी को 5,377 वोट मिले। सचिव पद पर एबीवीपी की जीत सात हजार के करीब वोट से हुई है, जबकि लेफ्ट को 87 सौ वोट मिला। ऐसे ही संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी ने सपा के विशेष यादव को 837 वोट से हराया। एबीवीपी उम्मीदवार को 16,615 वोट मिले, जबकि कांग्रेस, सपा और लेफ्ट को मिला कर इसके दोगुने से ज्यादा करीब 37 हजार वोट मिले।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



