दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ यानी डूसू के चुनाव में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पदों पर जाट जीते हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के यश डबास अध्यक्ष तो निर्दलीय दीपांशु शौकीन उपाध्यक्ष बने हैं। आमतौर पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जाति का गणित ज्यादा देखा जाता है। लेकिन दिल्ली छात्र संघ के चुनाव में जाति और क्षेत्र का गणित किस तरह से काम करता है इसका उदाहरण है इस बार का चुनाव। दीपांशु शौकीन इसलिए अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़े क्योंकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने यश डबास को उम्मीदवार बना दिया। दोनों एक जाति और एक गोत्र के हैं। दीपांशु नहीं लड़े तो जाट वोट एबीवीपी के पक्ष में एकजुट हुआ और फिर उपाध्यक्ष के लिए वह पूरा वोट दीपांशु के पक्ष में शिफ्ट हो गया।
यह पूरी राजनीति इतने कोऑर्डिनेटेड तरीके से हुई, जिसकी मिसाल बड़े चुनावों में नहीं मिलेगी। दोनों सीटों पर जाट जीतें, यह सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस के सबसे बड़े जाट नेता यानी भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा ने चुनाव से दूरी रखी। दीपेंद्र आमतौर पर डूसू के चुनाव में प्रचार के लिए जाते हैं। लेकिन इस बार नहीं गए। कहा जा रहा है कि उनके हिसाब से टिकट नहीं दी गई। लेकिन असल कारण अध्यक्ष पर जाट बनाम आदिवासी का मुकाबला होना है। जाट के मुकाबले आदिवासी को जिताने की अपील करने दीपेंद्र हुड्डा नहीं जा सकते थे। हालांकि कांग्रेस के इस प्रयोग को काफी हद तक कामयाब माना जा रहा है। पहली बार कोई आदिवासी छात्र नेता डूसू के अध्यक्ष पद के इतने करीब पहुंचा था। इसके बाद कांग्रेस बहुजन राजनीति और आगे बढ़ाएगी।
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