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दलबदल में चुनाव आयोग की मनमानी!

ऐसा लग रहा है कि दलबदल के मामले में चुनाव आयोग को किसी नियम का पालन करने की जरुरत नहीं महसूस होती है। वह अपनी या सत्तारूढ़ दल की सुविधा के हिसाब से नियमों को लागू करती है। अगर ऐसा नहीं होता है तो लोक जनशक्ति पार्टी से लेकर शिव सेना और एनसीपी से होते हुए तृणमूल कांग्रेस तक के ऊपर अलग अलग नियम नहीं लागू किए जाते है। ताजा मामला तृणमूल कांग्रेस में हुई दलबदल का है। चार मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के थोड़े दिन के बाद ममता बनर्जी की पार्टी टूट गई। उनके करीब 60 विधायकों ने अलग गुट बना लिया, जिसे स्पीकर ने मान्यता भी दे दी। इसी तरह ममता के 20 सांसद भी टूट कर अलग हो गए। हैरानी की बात है कि विधायकों को दो तिहाई की संख्या के आधार पर मान्यता दे दी लेकिन उसी नियम के हिसाब से लोकसभा में स्पीकर ने अलग मान्यता नहीं दी। इसके उलट सांसदों ने त्रिपुरा की एक गुमनाम सी पार्टी ज्वाइन की और अब खबर है कि उन 20 में से 17 भाजपा में शामिल होने वाले हैं। सोचें, चुनाव आयोग की नाक के नीचे नियमों को तोड़मरोड़ कर एक पार्टी के सांसदों को वाया एनसीपीआई भाजपा में शामिल कराने की तैयारी है और चुनाव आयोग मूक दर्शक है।

विधायकों के मामले में भी आयोग ने कोई फैसला नहीं किया है। उसने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह और नाम दोनों फ्रीज कर दिया। अब उनकी पार्टी का नाम ममता टीएमसी होगा और अलग हुए गुट का नाम डेमोक्रेटिक टीएमसी होगा। दोनों के अलग अलग चुनाव चिन्ह होंगे। ममता का कहना है कि जब पार्टी के टूटने या किसी दूसरी पार्टी में विलय का मामला ही नहीं है तो फिर कैसे उनसे उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह छीना जा रहा है? यह सवाल बहुत सही है क्योंकि संविधान के 91वें संशोधन के बाद दलबदल कानून में से पार्टी टूटने के प्रावधान को हटा दिया गया है। अब किसी पार्टी का दूसरी पार्टी में विलय होगा और दो तिहाई बहुमत से उस विलय की मंजूरी कराई जाएगी। ममता बनर्जी की पार्टी के मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

चुनाव आयोग ने यह नियम कई साल पर बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी के मामले में लागू किया था। उस समय चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस पार्टी के छह में से पांच सांसदों को लेकर अलग हो गए थे। उस समय पारस को नीतीश कुमार का समर्थन था और नीतीश कुमार तब भाजपा के साथ थे। सो, स्पीकर से लेकर चुनाव आयोग तक का रुख अलग था। बाद में चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह जब्त कर लिया और दोनों को अलग अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए। लेकिन इसके बाद महाराष्ट्र में दो पार्टियां टूटीं। शिव सेना और एनसीपी। उनके मामले में चुनाव आयोग ने लोजपा वाला रास्ता नहीं अख्तियार किया। वहां टूट कर अलग हुई पार्टी को असली पार्टी की मान्यता दे दी। वहां दलबदल करने वाले एकनाथ शिंदे की पार्टी असली शिव सेना है। ऐसे ही दलबदल करने वाले अजित पवार की पार्टी असली एनसीपी हुई, जिसको अजित पवार के निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार संभाल रही हैं। हालांकि शिव सेना का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट मे चल रहा है। जाहिर है चुनाव आयोग दलबदल कानून के नियमों के हिसाब से काम नहीं करता है और न संसद व विधानसभा के पीठासीन अधिकारी उस हिसाब से काम करते हैं।

By NI Political Desk

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