एक तो वित्तीय मामलों की शब्दावली इतनी जटिल होती है कि कई बार जो होता है उसका उलटा कहा जाता है। जैसे यूपीआई के जरिए लेनदेन पर शुल्क लगाने वाले फैसले में यूपीआई की तरह ही बार बार एमडीआर शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। इसका अर्थ है मर्चेंट डिस्काउंट रेट। सोचें, इसमें डिस्काउंट यानी छूट शब्द है लेकिन असल में इसी छूट पर शुल्क लगाने का फैसला हुआ है। अब खबर है कि सरकार एमडीआर के ऊपर जीएसटी भी लगाएगी। सोचें, इसी को हिंदी मुहावरे में कोढ़ में खुजली कहा गया है। पहले सरकार लेनेदेन पर शुल्क लगाएगी और उस शुल्क के ऊपर जीएसटी वसूलेगी।
वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यूपीआई एक पेमेंट सेटलमेंट सर्विस है इसलिए इस पर लगने वाला शुल्क जीएसटी के दायरे में आएगा। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि शुल्क की तरह जीएसटी भी ग्राहकों को नहीं देना है, बल्कि दुकानदार देगा। हालांकि सबको पता है कि दुकानदार न तो शुल्क अपनी जेब से देगा और न जीएसटी। बहरहाल, कहा जा रहा है कि जीएसटी रजिस्टर्ड दुकानदार जो शुल्क वसूलेगा उस पर जीएसटी चुकाएगा और बाद में वह रिफंड ले सकता है। उसे इनपुट टैक्स क्रेडिट के रूप में रिफंड मिल जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि दुकानदार इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते हैं। उनको पता है कि आज वे जीएसटी भरेंगे तो कितने दिन के बाद रिफंड मिलेगा। उनकी पूंजी फंस रही है, जीएसटी में।
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