भाजपा के कई वरिष्ठ नेता संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। जिनको संगठन में या सरकार में जगह मिल गई है वे भी प्रयास कर रहे हैं। कई मुख्यमंत्री इस कोशिश में लगे हैं तो कई केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री भी प्रयास कर रहे हैं। हालांकि संसदीय बोर्ड को लेकर अब पहले वाली बात नहीं है। पहले इसका सदस्य होने का मतलब था कि आप शीर्ष नेतृत्व हैं। लेकिन पिछली बार जो बदलाव हुए थे उसमें जिन नए लोगों को शामिल किया गया था उनमें एक बीएस येदियुरप्पा को छोड़ कर कोई अपने राज्य के भी शीर्ष 10 नेताओं में होने का दावा नहीं कर सकता। संसदीय बोर्ड का सदस्य बन जाने के बाद भी उनका राजनीतिक कद जस का तस रहा था। वैसे तो अब भाजपा के पदाधिकारियों या केंद्रीय मंत्रियों की भी हैसियत पहले वाली नहीं रह गई है। लेकिन भाजपा के जो नेता अपने दम पर बड़े हैं वे जरूर अपना कद बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
तभी इस बात की बहुत चर्चा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। दोनों अपने अपने स्तर पर जोर लगा रहे हैं। सीएम रहते शिवराज सिंह चौहान संसदीय बोर्ड के सदस्य बने थे। लेकिन उसके बाद किसी सीएम को मौका नहीं मिला है। हालांकि जरूरी नहीं है कि दो सबसे मजबूत मुख्यमंत्रियों में से किसी को जगह मिले। हो सकता है कि रेखा गुप्ता शामिल हो जाएं, जिससे महिला औ मुख्यमंत्री दोनों कोटा पूरा हो जाए। वैसे शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा और नायब सिंह सैनी के नाम की भी चर्चा है। यह भी संभव है कि पर्ची के जरिए सीएम बने किसी नेता को शामिल कर लिया जाए।
बहरहाल, आदिवासी के तौर पर असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नाम की चर्चा है। संगठन महामंत्री के अलावा एक और महामंत्री इसमें शामिल हो सकता है। विनोद तावड़े सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। दलित चेहरे के तौर पर यूपी, बिहार का कोई जाटव या रविदास समाज का नेता हो सकता है। केंद्रीय मंत्रियों में शिवराज सिंह चौहान और पीयूष गोयल की चर्चा हो रही है। अल्पसंख्यक के रूप में पंजाब से किसी सिख नेता को भी जगह मिलने की चर्चा है।
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