वैसे तो चार राज्यों में विधान परिषद के चुनाव हुए थे। लेकिन उत्तर प्रदेश को छोड़ कर बाकी राज्यों के चुनाव का कोई तात्कालिक महत्व नहीं है। उत्तर प्रदेश के चुनाव का बड़ा राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि चार महीने के भीतर राज्य में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। यह चुनाव इस लिहाज से बहुत अहम है कि 11 सीटें पूरे प्रदेश में फैली हैं। इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीट है तो अवध की भी है, बुंदेलखंड की भी और पूर्वांचल की भी है। इसलिए इसका नतीजा पूरे प्रदेश का नतीजा माना जाएगा। यह सही है कि इसमें आम मतदाता वोट नहीं करता है लेकिन इसके नतीजे का इस्तेमाल धारणा बनाने और अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए होगा। इस लिहाज से कह सकते हैं कि 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में भले भाजपा ने ज्यादा सीटें जीती हैं लेकिन धारणा के स्तर पर उसको बहुत बड़ा झटका लगा है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी की शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट हार गई।
वाराणसी के नतीजे आने के बाद से समाजवादी पार्टी इसका माहौल बनाए हुए है कि अयोध्या के बाद अब भाजपा वाराणसी भी हार गई। इतनी ही नहीं भाजपा आगरा शिक्षक की सीट भी हार गई है, जिसे लेकर सपा का कहना है कि मथुरा भी भाजपा हार गई। यानी अय़ोध्या, काशी और मथुरा तीनों जगह भाजपा हारी। हालांकि आगरा स्नातक सीट भाजपा ने जीत ली है। पिछली बार इन 11 सीटों में से भाजपा ने छह और सपा ने तीन सीटें जीती थीं। दो सीटों पर निर्दलीय जीते थे। इस बार बिल्कुल आमने सामने के मुकाबले में सपा ने अपनी सीटें बढ़ाई हैं। विधानसभा चुनाव चुनाव से पहले का यह नतीजा भाजपा के लिए निश्चित रूप से चिंता बढ़ाने वाला है।
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