उत्तराखंड में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री विजय शाह का मामला क्या दोनों नेताओं का निजी मामला है या भाजपा की राजनीति इससे जुड़ी हुई है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी की सभा के बाद वहां हुए शुद्धीकरण को महेंद्र भट्ट ने जस्टिफाई किया। उसके बाद ही नए सिरे से यह मामला उछला। ध्यान रहे जिस समय यह घटना हुई उस समय संसद का सत्र चल रहा था और राज्यसभा में जब खड़गे ने यह मुद्दा उठाया तो सदन के नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने भी आलोचना की और कहा कि इसकी जांच होगी। लेकिन बाद में महेंद्र भट्ट ने इसको जस्टिफाई कर दिया और फिर भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष भी उसी लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं।
तभी ऐसा लग रहा है कि महेंद्र भट्ट का बयान पार्टी की लाइन पर है। पार्टी समझ रही है कि उसे इसका लाभ मिल सकता है क्योंकि अब यह मामला सांप्रदायिक हो गया है। इसी तरह मध्य प्रदेश के मंत्री कुंवर विजय शाह का ऑपरेशन सिंदूर के बाद कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिया गया बयान है। वह न सिर्फ कर्नल कुरैशी, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए अपमानजनक था। इस मामले में कई बार सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है लेकिन विजय शाह न सिर्फ मंत्री पद पर बने हुए हैं, बल्कि राज्य सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। पिछले हफ्ते मोहन यादव की कैबिनेट बैठक में यह मुद्दा आया। तब पूरी कैबिनेट ने एक स्वर में कहा कि मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी जाएगी। जाहिर है उत्तराखंड से लेकर मध्य प्रदेश तक भाजपा की एक जैसी राजनीति है।
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