पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, जिनमें से दो राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश में मतदान हो गया है। गुरुवार को असम, केरल और पुडुचेरी में वोट डाले गए। 23 और 29 अप्रैल को तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में वोटिंग हो जाएगी। उससे पहले कैसे कैसे उपाय हुए हैं, कैसे कैस घटनाक्रम हुए हैं और कैसी कैसी संस्थाएं इसमें शामिल हुईं यह देखना दिलचस्प है। हो सकता है कि संवैधानिक संस्थाएं या न्यायपालिका में जो कुछ हो रहा है वह स्वाभाविक रूप से हो रहा हो लेकिन सबकी टाइमिंग दिलचस्प है। जैसे करीब तीन साल से सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
चीफ जस्टिस रहते शरद बोबडे ने इस पर बड़ी बेंच बना कर सुनवाई का आदेश दिया था। लेकिन इतने समय के बाद अचानक केरल विधानसभा चुनाव से पहले सबरीमाला का मामला सुना जाने लगा है, जहां सबसे पहले केंद्र सरकार यानी भाजपा को अपनी बात कहने का मौका मिला है। भाजपा जोर शोर से बता रही है कि धार्मिक परंपरा सबसे अहम है और महिलाओं का अधिकार दोयम दर्जे का है। पूरी ताकत लगा कर सरकार हर उम्र की महिलाओं के मंदिर प्रवेश का विरोध कर रही है। इसका कारण यह है कि केरल में भाजपा को व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण की जरुरत है, चुनाव जीतने के लिए नहीं, खाता खोलने के लिए।
केंद्र की तो सरकार ही भाजपा की है और हर समय भाजपा के लिए ही काम करती है। सो, उसको अचानक ध्यान आया कि महिला आरक्षण 2034 से नहीं, बल्कि 2029 से ही लागू किया जाना चाहिए। इसलिए संसद के बजट सत्र को आगे बढ़ाया गया। आनन फानन में बिल तैयार किया गया। बुधवार, आठ अप्रैल को कैबिनेट ने बिल की मंजूरी दे दी और अगले दिन नौ अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लेख देश के सभी अखबारों में छपा, जिसमें उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने की जिम्मेदारी की याद सबको दिलाई। जिस समय केरल, असम और पुडुचेरी में वोटिंग शुरू हुई उस समय, जिसके हाथ में अखबार था वह महिला आरक्षण पर प्रधानमंत्री का लेख पढ़ रहा था और साथ ही यह खबर भी कि आरक्षण बिल को कैबिनेच की मंजूरी हो गई है। सोचें, एक तरफ धर्म के सामने महिला अधिकार को नकारा जा रहा है, उन्हें अछूत बताया जा रहा और दूसरी ओर महिलाओं के अधिकार पर कानून बनाया जा रहा है और लेख लिखा जा रहा है। चुनाव आयोग जो कर रहा है वह तो कमाल है ही।


