महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में जिस तरह गठबंधन बनाने में खेल हुआ उसी तरह का खेल बाद में भी जारी है। पहले तो चुनाव के समय किस गठबंधन की कौन सी पार्टी किसके साथ लड़ रही थी यह पता लगाना मुश्किल था। चुनाव के बाद भी वही कहानी दोहराई जा रही है। जैसे कल्याण डोंबिवली में राज ठाकर की पार्टी के पार्षदों ने एकनाथ शिंदे के मेयर उम्मीदवार का समर्थन कर दिया वैसे ही चंद्रपुर में उद्धव ठाकरे के पार्षदों ने अपने धुर विरोधी भाजपा के मेयर उम्मीदवार को समर्थन दे दिया। सोचें, महाराष्ट्र के 29 शहरी निकायों में से तीन ही निकाय में कांग्रेस बड़ी पार्टी बनी थी और अपना मेयर बनाने की तैयारी कर रही थी।
उसमें भी एक शहर चंद्रपुर में उसकी सहयोगी उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने ही उसका खेल बिगाड़ दिया। चंद्रपुर के 67 सदस्यों के निकाय में बहुमत के लिए 34 वोट की जरुरत थी। 27 सीट के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। उसे निर्दलीय और बसपा के पार्षदों का समर्थन मिला हुआ था। वह उम्मीद कर रही थी कि उद्धव की पार्टी उसका समर्थन करेगी और वह आराम से मेयर बना लेगी। लेकिन ऐन मौके पर उद्धव के पार्षदों ने 23 सदस्यों वाली भाजपा का समर्थन कर दिया। कांग्रेस की दूसरी सहयोगी वंचित बहुजन अघाड़ी के पार्षद गैरहाजिर हो गए। ओवैसी की पार्टी ने भी गैरहाजिर होकर भाजपा की मदद की। इस वजह से कांग्रेस की वैशाली महादले को भाजपा की संगीता खांडेकर ने एक वोट से हरा दिया।


