तमिलनाडु में विधानसभा या लोकसभा का चुनाव बहुत महंगा होता है। चुनाव प्रबंधन करने वाले एक बड़े रणनीतिकार ने बताया था कि वहां लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार दो-दो सौ करोड़ रुपए खर्च कर देते हैं। विधानसभा चुनाव में भी 25-30 करोड़ रुपए का खर्च आम बात है। सोचें, चुनाव आयोग ने लोकसभा के लिए 80 लाख और विधानसभा चुनाव के लिए 40 लाख रुपए खर्च करने की अधिकतम सीमा लगा रखी है। जाहिर है कोई भी इस सीमा को नहीं मानता है और चुनाव आयोग कुछ नहीं कर पाता है। चुनाव आयोग की नजरों के सामने अधिकतम खर्च की सीमा का उल्लंघन होता है।
अब खबर है कि तमिलनाडु में नई पार्टी टीवीके बना कर चुनाव मैदान में उतरे फिल्म स्टार विडय को ऐसे उम्मीदवारों की तलाश है, जो कम से कम पांच करोड़ रुपया खर्च करने की हैसियत रखते हों। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट आई है कि पिछले दिनों पार्टी की एक वर्चुअल बैठक हुई थी, जिसमें इस क्राइटेरिया पर बात हुई। पार्टी में इस बात को लेकर निराशा है कि उसके पास पर्याप्त संख्या में इतने उम्मीदवार नहीं हैं, जो चुनाव में पांच करोड़ रुपए खर्च करने की हैसियत वाले हों। इसलिए टीवीके पर किसी दूसरी पार्टी या बड़े गठबंधन से तालमेल का दबाव है। लेकिन गठबंधन या तालमेल की बात सेकेंडरी हो गई। असली मामला यह है कि अगर कोई पार्टी पांच करोड़ खर्च करने वाला उम्मीदवार खोज रही है तो चुनाव आयोग को इस में कुछ करना चाहिए या नहीं?
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