उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव से पहले भाजपा की नजर समाजवादी पार्टी की एक एक चाल पर है। उसको पता है कि इस बार भी अखिलेश तीन उम्मीदवार उतारेंगे। पिछली बार तो उनका तीसरा उम्मीदवार हार गए था लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हालात बदले हैं। भाजपा के कई विधायकों को पता है कि उनकी टिकट कटेगी इसलिए वे पाला बदल सकते हैं। सहयोगी पार्टियों के विधायकों की भी कोई गारंटी नहीं ले रहा है। ऐसे में अगर अखिलेश किसी अगड़ी जाति के या गैर यादव पिछड़ी जाति का उम्मीदवार देते हैं तो एनडीए के विधायकों में फूट पड़ सकती है। तभी कहा जा रहा है कि इस खेल को रोकने के लिए भाजपा नौवां उम्मीदवार उतार सकती है या संसाधन से मजबूत किसी निर्दलीय को समर्थन देकर खड़ा कर सकती है।
ध्यान रहे भाजपा के पास अपनी 256 सीटें हैं और सहयोगियों को मिला कर उसकी संख्या 294 है। सपा और कांग्रेस की संख्या 102 है और दो सीटें रघुराज प्रताप की पार्टी के पास हैं। माना जा रहा है कि उनका वोट भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में जाएगा। भाजपा को आठ सीटें जीतने के लिए ठीक 296 वोट की जरुरत है। इतने का पुख्ता इंतजाम उसके पास है। लेकिन अगर सहयोगी पार्टियों या भाजपा के अपने वोट में सेंध लगती है तो समस्या होगी। तभी भाजपा की रणनीति नौवां उम्मीदवार उतार कर सपा के कुछ वोट तोड़ने का है। जानकार सूत्रों का कहना है कि अगर सपा किसी मुस्लिम को दूसरा उम्मीदवार बनाती है तो उसके कुछ विधायक टूट सकते हैं, जिनको भाजपा अपनी टिकट पर चुनाव भी लड़ा सकती है। हालांकि मौजूदा हालात को देखते हुए यह बहुत मुश्किल लग रहा है कि सपा अपने 74 विधायकों को भी साथ नहीं रख सके। सपा से ज्यादा चुनौती भाजपा के सामने है।
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