एल मुरुगन ने सिर्फ केंद्रीय मंत्रिपरिषद से ही इस्तीफा नहीं दिया है, बल्कि अपनी राज्यसभा सीट भी छोड़ दी है। उनका राज्यसभा का कार्यकाल साढ़े तीन साल बचा हुआ था। उन्होंने पांच पन्ने की अपनी चिट्ठी में लिखा है वे तमिलनाडु में भाजपा को मजबूत करना चाहते हैं। सवाल है कि क्या पार्टी को मजबूत करने के रास्ते में उनकी राज्यसभा की सदस्यता बाधा बन रही थी? ऐसा नहीं है। उलटे उनके एक हिंदी भाषी राज्य मध्य प्रदेश से राज्यसभा में होने का ज्यादा फायदा भाजपा को तमिलनाडु में मिलता। वे मंत्री बने रह कर भी पार्टी को मजबूत कर सकते थे। लेकिन अब तमिलनाडु में चुनाव हो चुके हैं और तुरत वहां के किसी नेता की जरुरत नहीं है। ऐसे ही केरल का चुनाव हुआ और उसी समय जॉर्ज कुरियन की विदाई हो गई। उनको राज्यसभा नहीं भेजा गया। ध्यान रहे भाजपा केरल में ईसाई वोट को लुभाने की कोशिश कर रही थी, जिसमें कामयाबी नहीं मिल पाई।
बहरहाल, एल मुरुगन के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के साथ साथ राज्यसभा सीट छोड़ने का दूसरा मकसद है। उनकी राज्यसभा सीट से किसी ऐसे व्यक्ति को सांसद बनाया जाएगा, जो नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री बनेगा और अभी किसी सदन का सदस्य नहीं है। वह कोई नेता होगा या टेक्नोक्रेट यह तय नहीं है। कई लोग यह भी कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की वजह से हरदीप सिंह पुरी को वहां से नहीं भेजा गया, उनको मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेज कर मंत्री बनाए रखा जा सकता है। इसके पीछे पंजाब विधानसभा चुनाव का भी तर्क दिया जा रहा है हालांकि ज्यादा संभावना इस बात की है कि उनको मंत्री पद से हटाया जाएगा। उनको मंत्री पद से हटाए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं है। अगर पुरी नहीं जाते हैं तो नंदन नीलेकणी टाइप का कोई बहुत चौंकाने वाला नाम हो सकता है।
Leave a comment
You must be logged in to post a comment.



