भारतीय जनता पार्टी का एकनाथ शिंदे से मोहभंग हो रहा है। पिछले करीब एक साल की राजनीति से भाजपा को अंदाजा हो गया है कि शिंदे के पास वोट नहीं है। भले चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिव सेना मान लिया है लेकिन शिव सैनिक अब भी उद्धव ठाकरे के साथ हैं और उन्हीं की पार्टी को असली शिव सेना मान रहे हैं। बृहन्नमुंबई महानगर निगम यानी बीएमसी का चुनाव इसी चिंता में टल रहा है कि शिंदे गुट भाजपा को फायदा पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। अगले साल के लोकसभा चुनाव में भी शिंदे गुट की स्थिति ऐसी नहीं है कि उसके साथ मिल कर भाजपा 41 सीटें हासिल कर सके। ध्यान रहे राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से पिछले चुनाव में भाजपा और शिव सेना ने मिल कर 41 जीती थी। भाजपा को अकेले 23 सीटें मिली थीं।
भाजपा की चिंता अपनी 23 सीटें बचाने की है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट से ज्यादा मदद मिलती नहीं दिख रही है। इस बीच यह चर्चा शुरू हो गई कि अजित पवार भाजपा के साथ आ सकते हैं। सवाल है कि अजित पवार भाजपा के साथ जाकर उसे क्या फायदा पहुंचाएंगे? जिस तरह शिव सेना में शिंदे के पास वोट नहीं है वैसे ही एनसीपी में अजित पवार के पास वोट नहीं है। एनसीपी का वोट तो शरद पवार के साथ है। सो, अजित पवार को लेकर भी भाजपा क्या करती? अजित पवार की ताकत तभी तक है, जब तक वे एनसीपी में हैं। एनसीपी छोड़ने के साथ ही उनकी ताकत बहुत कम या खत्म हो जाती है। सो, जिस तरह से भाजपा ने शिंदे की मदद से सरकार तो बना ली लेकिन वोट का फायदा नहीं हो रहा है उसी तरह अजित पवार की मदद से सरकार तो बच सकती है लेकिन वोट का फायदा नहीं होगा। वे भाजपा को लोकसभा की 23 सीटें जिताने में मददगार नहीं हो सकते हैं।
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