religion

  • धर्म और भाषा के आधार पर उत्पीड़न बढ़ा

    पिछले करीब एक दशक से भारत के अलग अलग हिस्सों में धर्म के आधार पर उत्पीड़न की खबरें ज्यादा आ रही हैं। लेकिन आमतौर पर एक ही धर्म के लोगों के उत्पीड़न की खबरें आती थीं। मुस्लिम लोगों को रोक कर उन पर गौमांस रखने के आरोप लगाने या उनसे जय श्रीराम बुलवाने की घटनाओं की खबरें आती थीं। लेकिन अब इसका दायरा बढ़ गया दिख रहा है। अब मुस्लिम के साथ साथ ईसाइयों के साथ भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं और साथ ही भाषा के आधार पर उत्पीड़न भी बढ़ गया है। महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक हिंदी...

  • जाति से आगे नहीं बढ़ते हैं नेता

    भारत के नेता किसी भी घटनाक्रम को और किसी भी व्यक्ति को जाति के चश्मे से ही देखते हैं। कई मौके पर खास कर सेना से जुड़े घटनाक्रम में आम नागरिक जाति का भेद भूल जाते हैं लेकिन नेता तब भी नहीं भूलते हैं। वे तब भी जाति के हिसाब से ही काम करते हैं। आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य अभियान ऑपरेशन सिंदूर के बाद अनेक नेताओं ने जाति और धर्म के आधार पर खूब राजनीति की। बिहार के निर्दलीय सांसद हैं पप्पू यादव वे पूर्णिया में भारत के वायु सेना के एय़र मार्शल अवधेश भारती के घर गए। सोचें, एयर...

  • वक्फ बिल का मजहब से वास्ता नहीं

    सात सौ साल की गुलामी के बाद वक्फ के पास 50 हजार एकड़ जमीन थी लेकिन आजादी के बाद 75 साल में वह बढ़ कर 39 लाख एकड़ हो गई! इसका स्पष्ट अर्थ है कि कानून से मिली ताकत के दम पर सरकारी और आम लोगों की संपत्तियां वक्फ को दान दी गईं और उन पर कब्जा किया गया।  इसमें सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वक्फ की संपत्ति में दोगुने से ज्यादा की बढ़ोतरी पिछले 10-12 वर्षों में हुई, जब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2013 में वक्फ कानून में संशोधन किया। वक्फ संशोधन बिल...

  • लाउडस्पीकर धर्म की आवश्यकता नहीं

    मुंबई, भाषा। बंबई हाईकोर्ट ने गुरूवार को व्यवस्था दी कि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किसी भी धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। अदालत ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे ध्वनि प्रदूषण के मानदंडों और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें। न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति एस. सी. चांडक की पीठ ने कहा कि शोर स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है और कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि अगर उसे लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी गई तो उसके अधिकार किसी भी तरह प्रभावित होंगे। अदालत ने यह फैसला कुर्ला उपनगर के...

  • न शर्म न हया: संविधान की रोज हत्या.?

    भोपाल। भारतीय आजादी के इस हीरक वर्ष में कभी ‘विश्वगुरू’ का दर्जा प्राप्त हमारा देश अब किसी का ‘शिष्य’ बनने के काबिल भी नही रहा है, यद्यपि हमारे भाग्यविधाता सत्तारूढ़ नेता विश्वभर में जाकर अपनी खुद की प्रशंसा करते नहीं थकते, किंतु वास्तव में हमारी स्थिति उस मयूर जैसी है जो प्रगति के बादल देखकर अनवरत् नाचता है और उपलब्धि के अभाव में बाद में आंसू बहाता है। आजादी के बाद से हमारे देश में भी राजनीति के अलग-अलग दौर रहे है, जवाहरलाल के जमाने की राजनीति प्रगति की कल्पना पर आधारित थी तो इंदिरा जी के जमाने से सत्ता...