पिछले करीब एक दशक से भारत के अलग अलग हिस्सों में धर्म के आधार पर उत्पीड़न की खबरें ज्यादा आ रही हैं। लेकिन आमतौर पर एक ही धर्म के लोगों के उत्पीड़न की खबरें आती थीं। मुस्लिम लोगों को रोक कर उन पर गौमांस रखने के आरोप लगाने या उनसे जय श्रीराम बुलवाने की घटनाओं की खबरें आती थीं। लेकिन अब इसका दायरा बढ़ गया दिख रहा है। अब मुस्लिम के साथ साथ ईसाइयों के साथ भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं और साथ ही भाषा के आधार पर उत्पीड़न भी बढ़ गया है। महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक हिंदी बोलने वाले लोग निशाने पर हैं। रेस्तरां चलाने वाले से लेकर बैंक में काम करने वालों को मराठी या कन्नड़ बोलने को कहा जा रहा है और नहीं बोलने पर उनके साथ मारपीट की जा रही है।
इसी तरह बांग्ला बोलने वालों की पहचान करके उनको बांग्लादेशी बताया जा रहा है कि अपने इलाके से बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है। दिल्ली और एनसीआर के कुछ इलाकों में तो पुलिस यह काम कर रही है। पश्चिम बंगाल के मालदा की रहने वाली महिला ने इस उत्पीड़न की पुष्टि की है। उसने बताया कि वैध दस्तावेज होने के बावजूद उसको बांग्लादेशी बता कर प्रताड़ित किया गया। इस बीच छत्तीसगढ़ में दो ईसाई महिलाओं को गिरफ्तार किए जाने की खबर से अलग विवाद मचा है। केरल की रहने वाली दो ईसाई महिलाए तीन अदिवासी महिलाओं के साथ किसी कार्यक्रम में जा रही थीं और उनको गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप लगाया गया कि तीन आदिवासी महिलाओं को धर्म परिवर्तन के लिए ले जाया जा रहा है। सोचें, अब इस देश में दो अलग अलग धर्म के लोग का एक साथ होना भी अपराध हो गया है! ईसाई महिलाओं को छोड़ने के लिए पुलिस और छत्तीसगढ़ सरकार पर चौतरफा दबाव बन रहा है।


