पश्चिम बंगाल में भाजपा को इतना बड़ा जनादेश मिला कि उसकी चर्चा में बाकी बातें ढक गईं। मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने या तार्किक विसंगति के आधार पर 27 लाख से ज्यादा लोगों को वोट डालने से रोक देने के मामले की चर्चा कम हो गई। इसका एक कारण यह भी है कि बंगाल में 49 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत हार का अंतर एसआईआर के तहत कटे वोट से कम का है। ऐसी सीटों में से 26 सीटें भाजपा ने जीती हैं तो 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस के खाते में गई हैं। कांग्रेस को दो सीटें मिली हैं। इसलिए नाम कटने के असर की ज्यादा बात नहीं हो रही है। फिर भी कहा जा रहा है कि कई नेता निजी तौर पर सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहे हैं। तृणमूल के नेता चाहते हैं कि पार्टी इसकी पहल करे लेकिन अभी वहां कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही है।
इस बीच एक खबर आई कि तार्किक विसंगति के आधार पर जिन मतदाताओं के नाम रोके गए थे उनकी सुनवाई करने के लिए बनाए गए न्यायाधिकरण के एक जज ने इस्तीफा दिया है। जज हैं टीएस शिवगननम, जो पहले कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। उन्होंने इस्तीफा देते हुए कहा कि वे निजी कारणों से इस्तीफा दे रहे हैं। लेकिन असली कारण कुछ और लगता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक उनकी शिकायत यह है कि उन्होंने दस्तावेज देखने के बाद जितने मतदाताओं के नामों को मंजूरी दी, चुनाव आयोग ने उन सभी के नाम मतदाता सूची में नहीं शामिल किए। सोचें, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का बहुत साफ निर्देश था कि न्यायाधिकरण के जज जैसे जैसे नामों को मंजूरी देंगे, चुनाव आयोग उन्हें मतदाता सूची में शामिल करेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसा नहीं किया। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचेगा।
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