डेटा सेंटर उन क्षेत्रों में बन रहे हैं, जो पानी की किल्लत से ग्रस्त हैं। भारत डेटा सेंटरों में जल उपयोग को लेकर फिलहाल अनिवार्य पर्यावरण मानक या अनिवार्य रिपोर्टिंग के नियम मौजूद नहीं हैं।
हर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस डेटा सेंटर की स्थापना की खबर को भारत में एक बड़ी उपलब्धि समझा जाता है। इनसे विदेशी निवेश के रूप में आने वाले डॉलर की खबर उस समय और महत्त्वपूर्ण हो गई है, जब देश के सामने भुगतान संतुलन की चुनौती बढ़ रही है। मगर डेटा सेंटर्स के साथ एक अन्य बड़ी समस्या भारत आ रही है। ये वो समस्या है, जिसके कारण डेटा सेंटर्स विभिन्न अमेरिकी राज्यों में बेहद अलोकप्रिय हो गए हैं। इन सेंटर्स के लिए पानी और बिजली की इतनी ज्यादा जरूरत पड़ती है कि उससे भविष्य बिगड़ने की आशंका से कई अमेरिकी राज्यों में ये सेंटर्स बड़े जन प्रतिरोध का कारण बने हुए हैँ।
मगर भारत में इनको लेकर जागरूकता की अभी कमी है। जबकि गैर-सरकारी संस्था- काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में भारत के डेटा सेंटरों ने सालाना 150 अरब लीटर पानी की खपत की। इन सेंटर्स की बढ़ती संख्या के कारण 2030 तक यह आंकड़ा 358 अरब लीटर पहुंचने का अनुमान है। डेटा सेंटर्स का कई उन जिलों में विस्तार हो रहा है, जो पहले से पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में फिलहाल डेटा सेंटरों में पानी और बिजली के उपयोग को लेकर अनिवार्य पर्यावरण संरक्षण मानक या अनिवार्य रिपोर्टिंग संबंधी नियम मौजूद नहीं हैं।
अमेजन, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि जैसी अमेरिकी और रिलायंस एवं अडानी ग्रुप जैसी भारतीय कंपनियां डेटा सेंटर्स के निर्माण से जुड़ी हुई हैं। आशंका है कि इनके रसूख को देखते हुए पानी और बिजली से संबंधित सख्त नियम बनाने को लेकर सरकार कतराएगी, जिसका भविष्य पर बहुत खराब असर होगा। गौरतलब है कि क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग, इमर्सन कूलिंग और 45 डिग्री सेल्सियस लिक्विड कूलिंग जैसे सिस्टम आज मौजूद हैं, जिनसे डेटा सेंटर्स में पानी की जरूरत घट सकती है। अतः डेटा सेंटर्स में इनका इस्तेमाल अनिवार्य करने के नियम सरकार को बनाने चाहिए। पानी के दोबारा इस्तेमाल की अनिवार्यता भी लागू की जानी चाहिए। किसी नए डेटा सेंटर को मंजूरी पानी के वैकल्पिक इंतजाम और जल ऑडिट की शर्त के साथ ही दी जानी चाहिए।


