ट्रंप की सोच शायद यह है कि जिसके पास शक्ति है, उसका सम्मान होना चाहिए। इस सोच का ही दूसरा पक्ष है कि जो कमजोर है, उससे इस बात की कीमत अवश्य वसूली जानी चाहिए!
डॉनल्ड ट्रंप की बेबाकी काबिल-ए-गौर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- ‘बीते जनवरी में मेरे निर्देश पर अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला की राजधानी के अंदर तक जाकर जबरदस्त सैन्य कार्रवाई की।… यह युद्ध था। (पराजित पक्ष) का सारा माल विजेता का हो जाता है।’ इसके पहले कह चुके थे कि पिछले महीने अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ ‘इतिहास का सबसे बड़ा तेल सौदा’ किया। विश्लेषकों ने इस बयान को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया है। वैसे ट्रंप ने अपने भाषण में ईरान और क्यूबा को लेकर भी धमकी भरी ऐसी बातें कहीं, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर की विभिन्न धाराओं की धज्जी उड़ाती मालूम पड़ीं। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जाकर इस विश्व संस्था की बेकद्री करने की ऐसी मिसाल इसके पहले शायद ही मिलेगी!
लेकिन यही ट्रंप की पहचान है। वे खुद को और अमेरिका को किसी नियम-कायदे, संधि और मर्यादा से बंधा नहीं मानते। संभवतः वे सिर्फ एक सिद्धांत जानते हैं- और वह है शक्ति। यानी जिसके पास ताकत है, वही आदरणीय है। और इसकी ताजा मिसाल उन्होंने शी जिनपिंग के स्वागत के लिए सबसे अलग किस्म की ‘लाल कालीन बिछा कर’ पेश की है। चीन के राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा (23-25 सितंबर) के दौरान ट्रंप ने प्रोटोकॉल से आगे जाकर स्वागत करने और चमकदार, भव्य आयोजनों का जो कार्यक्रम बनाया है, उसे देख कर शायद चीनी विश्लेषक भी हैरत में पड़ेंगे! जब अमेरिका और चीन की होड़ भू-राजनीति के सारे समीकरणों के केंद्र में है, ट्रंप के शी के प्रति इस झुकाव का तर्क अमेरिकियों को भी समझ में नहीं आया है।
इसकी तुलना सिर्फ चार महीने पहले ट्रंप की हुई बीजिंग यात्रा से की गई है, जब चीन ने प्रोटोकॉल के अनुरूप ही उनका स्वागत किया था। वैसे, ट्रंप- शी की द्विपक्षीय आधिकारिक वार्ता से ज्यादा कुछ हासिल होगा, इसकी संभावनाएं भी कम ही हैं। मगर ट्रंप की सोच शायद यह है कि जिसके पास शक्ति है, उसका सम्मान होना चाहिए। इस सोच का ही दूसरा पक्ष है कि जिसके पास ताकत नहीं है, उससे इस बात की कीमत अवश्य वसूली जानी चाहिए!
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