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संगठित होने की मजबूरी

यह मुद्दा चर्चा में था कि क्या कभी गिग कर्मियों को संगठित किया जा सकता है अथवा क्या वे संगठित होकर अपने हित की लड़ाई लड़ सकेंगे। ऐसे सवालों का जवाब बदलते हालात और नई उभरी परिस्थितियों ने दे दिया है।

ऐप आधारित गिग कर्मी ‘कर्मचारी’ या ‘मजदूर वर्ग’ की श्रेणी में आते हैं या नहीं, इस तरह के काम के प्रचलन में आने के बाद से यह सवाल बहस का विषय है। उनकी सेवा लेने वाली प्लैटफॉर्म कंपनियां इन श्रेणियों की जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसे कर्मियों को पार्टनर कहती हैं। गिग कर्मियों का एक हिस्सा भी अपने काम को स्व-रोजगार बताने में फ़ख्र महसूस करता रहा है। आरंभ में जब प्लैटफॉर्म कंपनियां कथित पार्टनर्स को अधिक लाभ दे रही थीं, तब गिग कर्मी उनकी शब्दावली से खासे संतुष्ट नजर आते थे। इसलिए यह मुद्दा भी चर्चा में रहा कि क्या कभी इन कर्मियों को संगठित किया जा सकता है अथवा क्या वे संगठित होकर अपने हित की लड़ाई लड़ सकेंगे। ऐसे सवालों का जवाब बदलते हालात और नई उभरी परिस्थितियों ने दे दिया है।

क्रिसमस के दिन भारत में पहली बार अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्विजी, जमैटो, ब्लिंकिट, जेप्टो आदि प्लैटफॉर्म्स से जुड़े कर्मियों ने हड़ताल आयोजित की। उनकी अगली हड़ताल 31 दिसंबर को है। इन कर्मियों के संगठन के मुताबिक 25 दिसंबर को प्लैटफॉर्म कंपनियों ने बड़ी प्रोत्साहन राशि दे कर हड़ताल को बेअसर कर दिया। उनका दावा है कि 31 दिसंबर को ऐसा नहीं हो सकेगा। हड़ताल का आह्वान इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स और तेलंगाना गिग एंड प्लैटफॉर्म वर्कर्स यूनियन ने किया है।

इसके पहले डेलीवरी राइडर्स, होम सर्विस वर्कर्स, कैब ड्राइवर्स आदि कई शहरों में अलग-अलग प्रतिरोध जता चुके हैं, लेकिन यह पहला मौका है, जब राष्ट्रीय स्तर पर संगठित संघर्ष के लिए वे आगे आए हैं। उनकी शिकायत है कि उन्हें मिलने वाली रकम घटती चली गई है, डिलीवरी का समय (कई कंपनियों ने 10 मिनट कर रखा है) घटता चला गया है, कंपनियां बिना नोटिस दिए उनके ऐप को डिसएबल कर देती हैं, और उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा हासिल नहीं है। भारत में सवा करोड़ से अधिक गिग वर्कर हैं। ऐसे काम का दायरा फैलता चला जा रहा है। मगर कार्यस्थितियां बिगड़ रही हैं। तो आखिरकार “पार्टनर्स” में खुद के श्रमिक होने का अहसास जगा है। वे श्रमिकों की तरह संघर्ष पर उतरते दिख रहे हैं।

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By NI Editorial

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