व्यापार वार्ता में शामिल भारतीय अधिकारियों ने अमेरिका के सामने अब तक यह स्पष्ट क्यों नहीं किया है कि हर रियायत झटकने के बाद नया दबाव बना देने की ट्रंप प्रशासन की नीति भारत को मंजूर नहीं है?
भारत की दलीलों को डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने स्वीकार नहीं किया। उसने अमेरिका की 2026 की विशेष 301 रिपोर्ट की निगरानी सूची में भारत को बनाए रखा है। इसका मतलब है कि बौद्धिक संपदा संबंधी नियमों में ढील देने के लिए अमेरिका भारत पर दबाव बनाए रखेगा। वह चाहता है कि भारत अपने दवा क्षेत्र को संरक्षण देने वाले कानून बदल दे, ताकि अमेरिकी कंपनियां यहां ज्यादा मुनाफा कमा सकें। धारा 301 अमेरिका का अपना कानून है। इसके बावजूद इसके तहत हुई जांच में भारत ने हिस्सा लिया। सुनवाई के दौरान दलील दी भारत के बौद्धिक संपदा संबंधी नियम विश्व व्यापार संगठन के कायदों के अनुरूप हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में और आम जन को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए भारतीय दवा कंपनियों को वैधानिक संरक्षण दिया गया है। साथ ही भारत ने अपने पेटेंट कानून में जरूरी सुधार किए हैं, ताकि आविष्कार भावना और जन हित दोनों के हित सध सकें। लेकिन ट्रंप प्रशासन के कदम से जाहिर है कि उसने इन तर्कों को ठुकरा दिया। उसने भारत पर तलवार लटकाए रखने का फैसला किया है। इसका संकेत है कि आगे चल कर इसके तहत वह प्रतिबंध या ऊंचा शुल्क लगाने जैसी कार्रवाइयां कर सकता है। उसने ये नजरिया तब अपनाया है, जब बताया गया है कि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते की वार्ता में अच्छी प्रगति हुई है।
मुद्दा यह है कि क्या भारत ये वार्ता अपने ऊपर लटक रही ऐसी तलवारों के साये में कर रहा है? अपेक्षित यह है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते में तमाम क्षेत्रों में कारोबार से जुड़ी पेचीदगियों को हल कर लिया जाए। यह तो नहीं हो सकता कि कुछ वस्तुओं के आयात- निर्यात पर सहमति बने, जबकि कुछ मामलों में अमेरिका दबाव बनाए रखे। अमेरिका के ताजा कदम से यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारतीय वार्ताकार सौदेबाजी कर रहे हैं या वे सिर्फ अमेरिकी वार्ताकारों से डिक्टेशन ले रहे हैं? उन्होंने अब तक यह स्पष्ट क्यों नहीं किया है कि हर रियायत झटकने के बाद नया दबाव बना देने की ट्रंप प्रशासन की नीति भारत को मंजूर नहीं है?
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