‘श्रमिक निर्यात’ की नीति दरअसल देश में रोजगार सृजन की विफलता को ढकने की कोशिश रही है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आव्रजक विरोधी मुद्दों के प्रमुखता पाने से इस मॉडल के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं।
एक मशहूर ब्रिटिश अखबार ने आगाह किया है कि भारत श्रमिकों के निर्यात के जिस मॉडल को आगे बढ़ा रहा था, उसकी सीमा अब आ गई है। फाइनेंशियल टाइम्स ने इस मॉडल की तुलना चीन के कारखाना उत्पादों की आक्रामक निर्यात नीति से की है, जिसे अब पश्चिम में ‘चाइना शॉक 2.0’ कहा जा रहा है, और जिसको लेकर पश्चिमी देश अब जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं। अखबार ने कहा है कि उसी तर्ज पर ‘इंडिया शॉक’ को राजनीतिक एवं आर्थिक चुनौतियां मिलनी शुरू हो गई हैं। इस आकलन के मुताबिक ‘इंडिया शॉक’ जल्द ही ‘वैश्विक प्रतिरोध की दीवार’ से टकरा सकता है।
आरंभ में “श्रम निर्यात” को भारत की विकास रणनीति के रूप में देखा गया। देश के अंदर बेरोजगारी का दबाव घटाने, विदेशी मुद्रा हासिल करने, और यहां तक कि कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिहाज से अल्पकाल में यह नीति मददगार रही। यह निर्विवाद है कि भारत में युवा श्रमशक्ति की अधिकता है। उन तकाजों के मुताबिक रोजगार पैदा नहीं हुए हैं। इस पृष्ठभूमि में भारतीय कर्मियों को जर्मनी, जापान, इजराइल, खाड़ी देशों आदि में रोजगार दिलाने की सरकारी नीति का औचित्य समझा जा सकता है। बाहर से कमा कर भेजी गई रकम से ना सिर्फ संबंधित व्यक्ति के परिवार की माली हालत सुधरती है, बल्कि देश के लिए विदेशी मुद्रा का वह प्रमुख स्रोत भी है।
बहरहाल, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि यह नीति असल में देश में रोजगार सृजन की विफलता को ढकने की कोशिश रही है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आव्रजक विरोधी मुद्दों के प्रमुखता पाने से इस मॉडल के लिए चुनौतियां बढ़ी हैं। यूरोप, अमेरिका, और यहां तक कि खाड़ी देशों में भी आव्रजक- विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं। ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया में नया संकट खड़ा किया है। इसलिए अब इस नीति पर पुनर्विचार का वक्त आ गया है। यह समझने की जरूरत है कि अपनी अर्थव्यवस्था का आधार व्यापक किए बिना देश और यहां के आवाम की खुशहाली का कोई ठोस एवं स्थायी विकल्प नहीं है। जब विदेशी दरवाजे संकुचित हो रहे हों, तब तो यही एकमात्र रास्ता रह जाता है।
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