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Editorial

घोर बदहाली की कहानी

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youth unemployment
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आम जवाब यही मिला कि “भूख से मर जाने से बेहतर है कि इजराइल में नौकरी पाकर मरा जाए।” यह कथन भारत में बेरोजगारी की संगीन होती सूरत के कारण नौजवानों में बढ़ती जा रही हताशा का बयान है।

भारत से जिन मजदूरों को इजराइल भेजा जाएगा, उनके लिए भर्ती का एक केंद्र हरियाणा के रोहतक में बना है। चयन की इच्छा लिए बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे हैं। अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक उनमें कई ऐसे हैं, जिनके पास पोस्ट ग्रैजुएट डिग्री हैं। कई दावेदार एजेंटों को लाख रुपये तक का कमीशन देकर आए हैं। यह होड़ एक युद्ध प्रभावित क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए लगी है। उन जगहों को भरने के लिए इजराइल ने भारतीय मजदूरों को ले जाने की योजना बनाई है, जो वहां रहने वाले फिलस्तीनियों को काम से हटा देने के कारण खाली हुई हैं। इस कारण अंदेशा है कि जो बाहरी मजदूर वहां जाएंगे, वे एक बड़ी स्थानीय आबादी के आक्रोश का केंद्र बनेंगे। यह बात पहले ही स्पष्ट हो चुकी है कि भारतीय मजदूरों को वहां किसी तरह की बीमा, मेडिकल सुविधा या वहां के श्रम कानूनों के तहत मिलने सुविधाएं हासिल नहीं होंगी। आने-जाने का खर्च भी उन्हें खुद ही वहन करना होगा।

आकर्षण का बिंदु सिर्फ यह है कि वहां जो तनख्वाह मिलेगी, वह भारतीय मुद्रा में एक लाख 37 हजार रुपये होगी। मगर यह ध्यान में रखना चाहिए कि मजदूरों को वहां रहने, खाने आदि सबका खर्च इजराइली मुद्रा में ही करना होगा। ऐसे में वे मामूली बचत ही कर पाएंगे। इसके बावजूद वे क्यों जाना चाहते हैं? इसका जवाब तब मिला, जब एक अंग्रेजी अखबार के संवाददाता ने मजदूरों से बात की। अखबार के मुताबिक आम जवाब यही मिला कि “भूख से मर जाने से बेहतर है कि वहां नौकरी पाकर मरा जाए।” यह कथन भारत में बेरोजगारी की संगीन होती सूरत के कारण नौजवानों में बढ़ती जा रही हताशा का बयान है। अखबारी रिपोर्टों से जाहिर है कि इजराइल जाने के लिए जद्दोजहद कर रहे लोग उस जगह के खतरों से वाकिफ हैं, जहां उन्हें काम करना होगा। अगर देश का राजनीतिक नेतृत्व संवेदनशील होता, तो बदहाली की इन कहानियों से उसकी नींद उड़ जाती। तब यह हाल देश का प्रमुख राजनीतिक मुद्दा होता। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि विकट होती यह समस्या राजनीतिक विमर्श में हाशिये पर भी नहीं है।

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