रैपर से राजनेता बने बालेंद्र शाह ने अपने चंद दिनों के शासनकाल में नेपाल को अशांत कर दिया है। पूर्व सरकारों के खिलाफ भड़के असंतोष के कारण उल्का की तरह उगे शाह स्वच्छ छवि वाली सरकार भी नहीं दे पाए हैं।
बालेंद्र शाह को नेपाल का प्रधानमंत्री बने, अभी एक महीना नहीं हुआ है। लेकिन इसी बीच उनकी सरकार ने अलग- अलग जन समूहों में विरोध भड़का दिया है। बुधवार को वित्तीय गड़बड़ी के इल्जाम के कारण गृह मंत्री सुधन गुरुंग को इस्तीफा देना पड़ा। गुरुंग पिछले सितंबर में हुए हुए कथित जेन-जेड विद्रोह के प्रमुख संचालकों में थे। उनकी इसी भूमिका के कारण तजुर्बा ना होने के बावजूद उन्हें गृह मंत्रालय जैसा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय मिला। मगर सिर्फ 26 दिन बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। 27 मार्च को शपथ ग्रहण के बाद शाह सरकार से हटने वाले वे दूसरे मंत्री हैं। इसके पहले श्रम मंत्री दीपक शाह को भी वित्तीय गड़बड़ी के इल्जाम के कारण ही पद छोड़ना पड़ा था।
इस बीच शाह सरकार के कई फैसलों से नेपाल की सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों की कड़ी लग गई है। शाह ने अपने आरंभिक कदमों में सियासी पार्टियों से जुड़े छात्र संघों को भंग कर दिया। इससे छात्र नाराज हो गए। फिर फैसला लिया कि भारत से 100 नेपाली रुपये से अधिक का सामान लाने पर सीमा शुल्क चुकाना होगा। इससे भारतीय सीमा से जुड़े मधेस इलाके में विरोध भड़क उठा। शाह ने जो कदम सबसे पहले उठाया, वह पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी था। मगर सरकार उनके खिलाफ साक्ष्य पेश नहीं कर पाई, जिस कारण कोर्ट ने दोनों को रिहा कर दिया।
इससे ओली समर्थकों को सड़कों पर उतरने का मौका मिला। फिर शाह ने सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, राष्ट्रपतियों और यहां तक कि पूर्व राजा की संपत्ति की जांच कराने का फैसला भी किया है। इससे आरोप लगा है कि बुनियादी समस्याओं का हल तलाशने के बजाय शाह बदले की भावना से काम कर रहे हैं। तो कुल मिला कर रैपर से राजनेता बने शाह ने अपने चंद दिनों के शासनकाल में नेपाल को अशांत एवं अस्थिर कर रखा है। पूर्व सरकारों की अकुशलता, कथित भ्रष्टाचार, और भाई-भतीजावाद से भड़के असंतोष के कारण उल्का की तरह उगे शाह स्वच्छ छवि वाली सरकार भी नहीं दे पाए। नतीजा, तेजी से उनकी चमक का उड़ जाना है।


